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Monday, 1 April 2019

पृथ्वी के उपग्रह और उनकी कक्षायें(Earth Satellite Orbits)

पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

जब भी अंतरिक्ष और उपग्रहो की चर्चा होती है तब बहुत सी कक्षाओं की भी चर्चा होती है जैसे भूस्थानिक कक्षा, ध्रुविय कक्षा। क्या होती है ये कक्षायें ? इनकी आवश्यकता क्या है ?

जब आप किसी थियेटर मे को ड्रामा देखने जाते है तो अलग अलग सीट से आपको एक ही मंचन के अलग अलग पहलू दिखायी देते है, उसी तरह से पृथ्वी की विभिन्न कक्षायें उपग्रह को पृथ्वी को अलग अलग परिप्रेक्ष्य से निरीक्षण का अवसर देते है। हर कक्षा का अलग अलग कारण से अपना महत्व होता है। कुछ कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के किसी एक बिंदु पर टिका हुआ दिखाई देता है, कुछ अन्य कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के कई स्थानो के उपर से सतत यात्रा करता रहता है।

मूल रूप से पृथ्वी पर उपग्रहों की तीन कक्षायें है, उच्च पृथ्वी कक्षा, मध्यम पृथ्वी कक्षा तथा निम्न पृथ्वी कक्षा। अधिकतर मौसम उपग्रह और कुछ संचार उपग्रह उच्च पृथ्वी कक्षा मे रहते है, अर्थात पृथ्वी की सतह से अधिक दूरी पर। मध्य पृथ्वी कक्षा मे रहने वाले उपग्रह नेविगेशन तथा जासूसी उपग्रह होते है जो किसी एक विशेष क्षेत्र पर नजर रखने के लिये बनाये गये होते है। वैज्ञानिक उपग्रह पृथ्वी की निम्न कक्षा मे होते है जिसमे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, नासा के पृथ्वी के निरीक्षण उपग्रहों के बेड़े का समावेश है।

 

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

किसी भी कक्षा की उंचाई या पृथ्वी की सतह से उपग्रह की दूरी से उपग्रह की गति निर्धारित होती है। पृथ्वी की परिक्रमा करते उपग्रह की गति का नियंत्रण मुख्य रूप से पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल करता है। जब उपग्रह पृथ्वी के समीप होता है, गुरुत्वाकर्षण बल का खिंचाव अधिक होता है और जिससे उपग्रह की गति अधिक होती है। नासा का एक्वा उपग्रह पृथ्वी की सतह से 705 किमी उंचाई पर है और वह पृथ्वी की एक परिक्रमा 99मिनट मे कर लेता है, जबकी एक मौसमी उपग्रह 36,000 किमी की उंचाई से पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकंड लेता है। पृथ्वी के केंद्र से 384,403 किमी की दूरी पर से चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 28 दिन लगते है।

किसी भी उपग्रह की उंचाई मे परिवर्तन करने पर उसकी कक्षीय गति मे भी परिवर्तन होता है। इससे एक विचित्र विरोधाभाष का भी निर्माण होता हओ। मान लिजिये कि किसी उपग्रह के संचालक को उपग्रह की कक्षीय गति बढ़ानी है, वह उपग्रह के प्रणोदक को जलाकर उपग्रह की गति नही बढ़ा सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो उपग्रह की उंचाई बढ़ जायेगी और उससे उपग्रह की कक्षीय गति कम हो जायेगी। उपग्रह की गति बढ़ाने के लिये उपग्रह के प्रणोदक राकेट को उपग्रह की गति की उल्टी दिशा मे चलाना होगा, इसे हम पृथ्वी के सतह पर ब्रेक लगाना कह सकते है। इससे उपग्रह अपनी कक्षा मे पृथ्वी के निकट आयेगा और उसकी गति बढ़ जायेगी।

 किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।


किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।

उंचाई के अतिरिक्त विकेन्द्रता(eccentricity) और कक्षीय झुकाव(inclination) भी उपग्रह की कक्षा को आकार देते है। विकेन्द्रता से कक्षा का आकार निर्धारित होता है। कम विकेन्द्रता वाला उपग्रह वृत्त के जैसी कक्षा रखता है। अधिक विकेन्द्रता वाला उपग्रह दिर्घवृत्त के जैसी कक्षा मे पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इस कक्षा मे पृथ्वी से उपग्रह की दूरी निरंतर परिवर्तित होते रहती है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा और पृथ्वी के विषुवत के मध्य के कोण को कहते है। विषुवत के ठीक उपर गति करने वाले उपग्रह का कक्षीय झुकाव शून्य होता है। यदि कोई उपग्रह पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की कक्षा मे गति करता है तो उसका कक्षीय झुकाव 90 डीग्री होगा।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

उपग्रह की उंचाई, विक्रेंद्रता और झुकाव किसी उपग्रह के पथ और पृथ्वी के दृश्य भाग को परिभाषित करते है।

उपग्रह कक्षा के तीन वर्ग

उच्च पृथ्वी कक्षा (High Earth Orbit)

जब उपग्रह पृथ्वी के केंद्र से 42,164 किमी (सतह से 36,000 किमी) की उंचाई पर पहुंचता है तो वह एक ऐसे बिंदु पर होता है जिसमे उसकी कक्षीय गति और पृथ्वी की घूर्णन(rotation) गति एक समान होती है। अब उपग्रह की गति और पृथ्वी की घूर्णन गति समान होने से, उपग्रह पृथ्वी के उपर एक ही देशांतर रेखा(longitude) पर स्थिर प्रतित होता है। यह संभव है कि उपग्रह की स्तिथि मे उत्तर दक्षिण दिशा मे विचलन हो। इस विशेष कक्षा को भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा कहते है।

वृत्ताकार भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा यदि विषुवत के उपर हो अर्थात उसकी विकेंद्रता शून्य तथा कक्षीय झुकाव शून्य हो तो उसे भूस्थानिक(geostationary) कक्षा कहते है क्योंकि इस कक्षा मे वह पृथ्वी के किसी बिंदु के सापेक्ष स्थिर रहेगा। वह हमेशा पृथ्वी के सतह के एक बिंदु के उपर ही रहेगा।

भूस्थानिक(geostationary) कक्षा मौसम उपग्रहों के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इस कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के एक भाग पर लगातार निरीक्षण कर सकता है। जब भी आप मौसम की जानकारी देनेवाली किसी वेबसाइट पर अपने शहर के मौसम की जानकारी देनेवाली पृथ्वी का चित्र देखते है तब वह चित्र भूस्थानिक कक्षा के किसी उपग्रह द्वारा लिया गया चित्र होता है। हर कुछ मिनट मे भारत के INSAT शृंखला के उपग्रह के जैसे मौसम उपग्रह बादलो, जल बाष्प, वायु दिशा जैसी जानकारी पृथ्वी के मौसम केंद्र तक भेजती है, इस जानकारी के विश्लेषण के द्वारा मौसम का अनुमान लगाया जाता है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्थानिक उपग्रह हमेशा एक ही स्थान के उपर रहते है जिससे वे संचार माध्यम(फोन, टीवी और रेडीयो) के लिये प्रयोग किये जाते है। नासा द्वारा बनाये गये और अमरीकी नेशनल ओशेनिक एन्ड एटमासफ़ियिरीक एडमिनिस्ट्रेशन (National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA)) द्वारा संचालित जिओस्टेशनरी आपरेशनल एन्विरोन्मेंटल सेटेलाइट( Geostationary Operational Environmental Satellite (GOES)) जहाज और विमानो की आपदा स्तिथि मे खोज, राहत और बचाव मे मदद करते है।

बहुत से उच्च पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह सौर गतिविधियों की भी निगरानी भी करते है। GOES उपग्रहों के पास अंतरिक्ष मौसम की निगरानी के लिये उपकरण है जो सूर्य के चित्र लेते है और अपने आसपास चुंबकीय क्षेत्र और सौर वायु की जांच करते रहते है।

उच्च पृथ्वी कक्षा से आगे कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु है जिन्हे लाग्रांज(Lagrange)बिंदु कहते है। इन बिंदुओं पर सूर्य तथा पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण समान होता है। इन बिंदुओ पर स्थित कोई भी वस्तु या पिंड पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है क्योंकि वह पृथ्वी और सूर्य दोनो द्वारा समान रूप से बंधा होता है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

कुल पांच लाग्रांज बिंदु है जिनमे से दो L4 और L5 बिंदु ही संतुलित या स्थाई है। अन्य तीन बिंदुओं पर उपग्रह किसी पहाड़ की चोटी पर गेंद के जैसे है, इन बिंदुओं पर हल्के से क्षोभ से उपग्रह अपने स्थान से पहाड़ी से लुढकती गेंद के जैसे हट जाता है। इन तीनो बिंदुओ पर उपग्रह को स्थिर, संतुलित रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है। अंतिम दो बिंदुओ पर स्थित उपग्रह किसी कटोरे मे गेंद की तरह होते है, किसी वजह से इन बिंदुओ से हटजाने पर भी वापिस अपनी वास्तविक स्थिति पर आ जाते है।

प्रथम लाग्रांज बिंदु पृथ्वी और सूर्य के बीच मे स्तिथ है जिससे इस बिंदु से सूर्य पर लगातार नजर रखी जा सकती है। नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष संस्थान (ESA) की सोलर एन्ड हिलिओस्फेरिक ओब्जर्वेटरी(Solar and Heliospheric Observatory (SOHO)) पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर इसी बिंदु पर स्थित है।

द्वितिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी से इतनी ही दूरी पर है लेकिन पृथ्वी के पीछे है, पृथ्वी हमेशा सूर्य और द्वितिय लाग्रांज बिंदु के मध्य होती है। इस स्तिथि मे पृथ्वी, सूर्य और उपग्रह एक ही रेखा मे होते है, जिससे इस बिंदु पर स्तिथ उपग्रहो को सूर्य और पृथ्वी की उष्मा से बचने के लिये केवल एक ही ओर उष्मा शील्ड चाहीये होती है। यह अंतरिक्ष दूरबीनो के लिये सर्वोत्तम जगह है जिसमे भविष्य की जेम्स वेब दूरबीन तथा वर्तमान विल्किंसन माइक्रोवेव अनिसोट्रोपी प्रोब( Wilkinson Microwave Anisotropy Probe-WMAP) शामिल है जिसका प्रयोग ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने के लिये माइक्रोवेव विकिरण के अध्ययन के लिये हो रहा है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

तृतिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी के विपरीत सूर्य की दूसरी ओर इस तरह से है कि सूर्य हमेशा इस बिंदु और पृथ्वी के मध्य होता है। इस स्तिथि मे उपग्रह पृथ्वी से कभी संपर्क नही कर पाता है। अत्याधिक रूप से स्थिर लाग्रांज बिंदु L4 तथा L5 है जो की पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा कक्षा मे पृथ्वी के सामने और पीछे 60 डीग्री दूरी पर है। इन बिंदुओ पर जुड़वा सोलर टेरेस्टेरीयल रीलेशनस ओब्सरवेटरी (Solar Terrestrial Relations Observatory (STEREO)) परिक्रमा कर रहे है और सूर्य का त्रिआयामी चित्र बना रहे है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा

पृथ्वी के समीप मध्यम पृथ्वी कक्षा मे उपग्रह तेजी से गति करते है। इनमे से दो कक्षाये विशिष्ट है, अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) तथा मोलनिया कक्षा(Molniya)।

अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) कक्षा लगभग वृत्ताकार अर्थात कम विकेन्द्रता लिये हुये होती है और पृथ्वी केंद्र से 25,560 किमी(सतह से 20,200 किमी) उंचाई पर है। इस स्तिथि मे पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये उपग्रह को 12 घंटे लगते है। जैसे ही उपग्रह गति करता है, पृथ्वी भी नीचे घूर्णन करती है। 24 घंटो मे उपग्रह एक स्थान पर से दो बार गुजरता है। यह कक्षा सुसंगत और स्थिर होती है, जिससे यह कक्षा नेविगेशन उपग्रहो, ग्लोबल पोजिशनिगं सीस्टम के उपग्रहो के लिये उपयुक्त होती है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा मे दूसरी महत्वपूर्ण कक्षा मोलनिया कक्षा है। यह कक्षा रूसी वैज्ञानिको ने खोजी थी। यह कक्षा उच्च अक्षांशो के लिये प्रयुक्त होती है। भूस्थानिक कक्षा के उपग्रहों से पृथ्वी का स्थिर परिदृश्य मिलता है लेकिन ये उपग्रह विषुवत रेखा पर होते है और इस स्तिथि मे वे उत्तरी ध्रुव या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो के निरीक्षण के लिये अनुपयुक्त होते है क्योंकि वे इन उपग्रहो की परिदृश्य की सीमा पर होते है। इस स्तिथि मे मोलनिया कक्षा एक अच्छा विकल्प होती है।

मोलनिया कक्षा अत्याधिक विकेन्द्रित होती है। उपग्रह अत्याधिक दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे गति करता है जिसके एक भाग मे पृथ्वी निकट होती है। पृथ्वी की निकटतम स्तिथि मे उपग्रह की गति सर्वाधिक होती है क्योंकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उसे गति देता है। जैसे ही वह पृथ्वी से दूर जाता है उसकी गति कम होते जाती है और वह कक्षा मे अधिकतम समय उपर पृथ्वी से दूर व्यतित करता है। मोलनिया कक्षा मे उपग्रह 12 घंटे मे पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है लेकिन इसका दो तिहाई समय वह केवल एक ही गोलार्ध के उपर रहता है। अर्धसमकालिक कक्षा के जैसे यह भी 24 घंटे मे एक स्थान पर दो बार पहुंचता है। यह कक्षा उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो पर संचार के लिये उपयुक्त होती है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit)

अधिकतर वैज्ञानिक उपग्रह और मौसमी उपग्रह लगभग वृत्ताकार निम्न पृथ्वी कक्षा मे होते है। उपग्रह का झुकाव उसके प्रयोग पर निर्भर करता है। ट्रापीकल रेनफ़ाल मेजरींग मिशन(Tropical Rainfall Measuring Mission (TRMM)) उपग्रह उष्णकटिबंध प्रदेश मे वर्षा के मापन के लिये है। इसलिये इस उपग्रह का झुकाव कम अर्थात 35 डीग्री है जिससे वह उष्णकटिबंध प्रदेश के उपर अधिकतर समय रहे।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

नासा और इसरो के अधिकतर उपग्रह ध्रुविय कक्षा मे है। इस अत्याधिक झुकाव वाली कक्षा मे उपग्रह ध्रुव से ध्रुव गति करते है और एक परिक्रमा पूरी करने मे 99 मिनट लेते है। एक परिक्रमा मे उपग्रह आधे समय दिन वाले भाग मे और आधे समय रात वाले भाग मे होता है। उपग्रह दिनवाले भाग से रात वाले भाग मे प्रवेश ध्रुव के उपर से करता है।

जब उपग्रह अपनी कक्षा मे गति करता है नीचे पृथ्वी भी घूर्णन करती है। जैसे ही उपग्रह दिन वाले भाग मे दोबारा आता है वह पिछली कक्षा वाले स्थान से बाजु वाले स्थान से गुजरता है। 24 घंटे मे ध्रुविय उपग्रह हर स्थान से दोबारा गुजरता है, एक बार दिन वाले समय मे दूसरी बार रात वाले समय मे।

भूसमकालिक उपग्रहों द्वारा जिस तरह से विषुवत के उपर रह कर पृथ्वी के एक स्थान की निगरानी की जा सकती है उसी तरह से ध्रुविय उपग्रहो द्वारा एक स्थान पर स्थिर समय पर नजर रखी जा सकती है। इस कक्षा को सूर्यसमकालिक (Sun-synchronous)कहते है, इसका अर्थ यह है कि जब भी उपग्रह विषुवत रेखा को पार करेगा, पृथ्वी पर उस स्थल का स्थानिक समय हमेशा समान रहेगा। उदाहरण के लिये टेरा(Terra) उपग्रह सुबह 10:30 बजे ब्राजील के उपर से जब विषुवत रेखा को पार करता है, 99 मिनट बाद अपनी अगली परिक्रमा मे वह जब इक्वाडोर या कोलंबीया के उपर से विषुवत को पार करता है तब इक्वाडोर या कोलंबीया मे स्थानिय समय 10:30 सुबह होता है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

विज्ञान मे सूर्य समकालिक कक्षाये महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इन कक्षाओं मे पृथ्वी की सतह पर सूर्य किरणो का कोण हमेशा समान रखने का प्रयास होता है।(हालांकि सूर्य की किरणो का कोण पृथ्वी की सतह पर मौसम के अनुसार बदलते रहता है।) इससे यह होता है कि वैज्ञानिक एक ही मौसम की भिन्न वर्षो मे ली गई तस्वीरो की सूर्य के कोण, प्रकाश और छाया की चिंता किये बगैर तुलना कर सकते है। सूर्य समकालिक कक्षा के बिना इस तरह की तुलना कष्टसाध्य होगी। मौसमी बदलाव या क्लाईमेट चेंज का अध्ययन इस तरह की तुलना के बगैर असंभव होगा।

सूर्य समकालिक कक्षा मे उपग्रह का पथ काफ़ी संकरा होता है। यदि उपग्रह की उंचाई 100 किमी है तो सूर्य समकालिक कक्षा मे बने रहने उसका कक्षीय झुकाव 96 डीग्री होना चाहिये। इन दोनो मे कोई भी बदलाव उस उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा से बाहर कर देगा। वातावरण द्वारा घर्षण से उत्पन्न खिंचाव और सूर्य, चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण इन उपग्रहो की कक्षा मे बदलाव करते है, जिससे इन उपग्रहो को सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है।

उपग्रह द्वारा कक्षा प्राप्त करना और उसमे बने रहना

प्रक्षेपण

किसी उपग्रह के प्रक्षेपण मे लगने वाली ऊर्जा प्रक्षेपण स्थल, कक्षा की उंचाई और कक्षीय झुकाव पर निर्भर करती है। उच्च पृथ्वी कक्षा मे पहुंचने उपग्रहों को सर्वाधिक ऊर्जा चाहिये होती है। अत्याधिक कक्षिय झुकाव जैसे ध्रुविय कक्षा के लिये लगने वाली ऊर्जा कम अक्षीय झुकाव वाले उपग्रह जैसे विषुवत के उपर गति करने वाले उपग्रह से अधिक होती है। कम अक्षिय झुकाव वाला उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन का प्रयोग कर अपनी कक्षा मे पहुंच सकता है। अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र 51.6397 डीग्री के झुकाव वाली कक्षा मे है जिससे नासा के स्पेस शटल और रूसी सोयुज द्वारा उस तक पहुंचना आसान है। जबकि ध्रुव की परिक्रमा करने वाले उपग्रह को पृथ्वी के संवेग से कोई मदद नही मिलने से उसी उंचाई तक पहुंचने मे अधिक ऊर्जा चाहिये होती है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कक्षा मे स्थिर रहना

एक बार उपग्रह अपनी कक्षा मे पहुंच गया तब भी उसे अपनी कक्षा मे बने रहने कुछ कार्य करते रहना होता है। पृथ्वी पूर्ण रूप से गोल नही है, उसका गुरुत्वाकर्षण कुछ जगह पर अन्य स्थानो की तुलना मे अधिक है। गुरुत्वाकर्षण मे यह अनियमितता और सूर्य, चंद्रमा , बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न खिंचाव से मिलकर उपग्रह के कक्षीय झुकाव मे परिवर्तन आ जाता है। अपने जीवनकाल मे GOES उपग्रहो को अपनी कक्षा मे बने रहने तीन से चार बार बदलाव करने होते है। नासा के निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने अपने कक्षीय झुकाव मे वर्ष मे एक बार या दो वर्ष मे एक बार बदलाव करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह पृथ्वी के वातावरण के घर्षण से उत्पन्न खिंचाव से अपनी कक्षा से हट जाते है। ये उपग्रह पृथ्वी के वातावरण की उपरी पतली तह से गुजरते है लेकिन उस उंचाई पर वायु का प्रतिरोध फ़िर भी इतना होता है कि वह उन उपग्रहो को खींच कर पृथ्वी की ओर ले आता है। अब पृथ्वी का गुरुत्चाकर्षण उन्हे कम उंचाई पर आने से अधिक गति देता है। अधिक गति अधिक घर्षण। समय के साथ उपग्रह गति बढ़ने और उंचाई कम होने से पृथ्वी के वातावरण मे स्पाईरल पथ मे प्रवेश कर जल सकता है।

वातावरण का यह खिंचाव सौर सक्रियता मे अधिक मजबूत होता है क्योंकि सौर सक्रियता मे सूर्य के द्वारा अतिरिक्त ऊर्जा के देने से वायुमंडल किसी गुब्बारे के जैसे फ़ूलता है। वातावरण की बाह्य पतली परत उपर उठती है और उसकी जगह नीचे से घनी परत ले लेती है। अब उपग्रह वातावरण मे घनी परत से गुजर रहा है जबकि वह सूर्य के सक्रिय ना होने पर अपेक्षाकृत रूप से पतली परत से गुजर रहा था। सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह अधिक घनी परत से गुजरने से उसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना होता है। सूर्य के असक्रिय काल मे निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रहों को अपनी कक्षा मे परिवर्तन वर्ष मे चार बार करना होता है। लेकिन सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह को अपनी कक्षा मे बदलाव हर दो तीन सप्ताह मे करना होता है।

उपग्रह की कक्षा मे बदलाव का तीसरा कारण अंतरिक्ष कबाड़ है जोकि उस उपग्रह के पथ मे हो सकता है। 11 फ़रवरी 2009 को अमरीकी उपग्रह कंपनी इरीडीयम का एक संचार उपग्रह रूस के निष्क्रिय उपग्रह से टकरा गया था। दोनो उपग्रह टूट गये और दोनो ने मिलकर 2,500 टूकड़ो का एक अंतरिक्ष मलबा बना दिया। इन 2500 टूकड़ो को पृथ्वी की कक्षा मे गति कर रहे 18,000 मानवनिर्मित पिंडो के डेटाबेस मे जोड़ दिया गया जिन पर अमरीकी अंतरिक्ष निगरानी नेटवर्क (U.S. Space Surveillance Network.)नजर रखता है।

 अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।


अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।

नासा उपग्रह अभियान संचालक अपने उपग्रह मे पथ मे आनेवाली हर वस्तु पर नजर रखते है। हर वर्ष कम से कम चार पांच बार उपग्रहो को रास्ते मे आ रहे इन मलबो से टकराने से बचने के लिये पथ बदलना होता है।

उपग्रह संचालन टीम अंतरिक्ष के इन मलबो तथा अन्य उपग्रहो पर नजर रखती है, और उसके अनुसार इन उपग्रहो के कक्षा मे मार्ग, उंचाई बदलने की योजना बनाती है।



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Thursday, 27 December 2018

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

अल्बर्ट आइंस्टीन ! यह नाम आज किसी परिचय का मोहताज नही है। आइंस्टीन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षवाद सिद्धान्त आज आधुनिक भौतिकी का आधार स्तंभ माना जाता है। आज यह सिद्धान्त हमलोग भलीभांति समझते है और दूसरों को भी समझा सकते है लेकिन क्या यह सिद्धान्त को समझना शुरुआती दिनों में भी इतना ही सरल था ? जवाब है – नही !

शुरुआती दिनों में सापेक्षवाद सिद्धान्त को समझना सामान्य मनुष्यों को तो छोड़िए वैज्ञानिको के लिए भी बड़ा कठिन कार्य था।

एक प्रसिद्ध भौतिकविज्ञानी और विज्ञान प्रस्तोता का कथन है

“वो महान है जो जटिल यंत्र बनाये, जटिल सिद्धान्त दे परन्तु उससे भी ज्यादा महान वो है जो जटिल को सरल बना दे।”

हम उस महान व्यक्ति को तो हमेशा याद करते है जिन्होंने सापेक्षवाद सिद्धान्त हमे दिया लेकिन उस व्यक्ति को याद नही करते जिसने सापेक्षवाद सिद्धान्त को सामान्य लोगो से लेकर वैज्ञानिको के लिए भी सरलतम रूप में प्रस्तुत किया।

वह महान व्यक्ति था सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington). एक प्रतिभाशाली खगोलविज्ञानी, भौतिकविज्ञानी और एक बेहतरीन गणितज्ञ। आइंस्टीन इस बात को जानते थे इसलिए उन्होंने कहा भी है

“जो सिद्धान्त को पुर्णतः समझता है वही अच्छी तरह सिद्धान्त को समझा सकता है।”

28 दिसम्बर को आर्थर एडींगटन का जन्मदिन है। उनका जन्म 28 दिसंबर 1882 तथा मृत्यु 22 नवंबर 1944 को हुई थी।

इस सिद्धांत की गूढ़ता के बारे में एक घटना विख्यात है। सापेक्षता सिद्धांत को पूरी तरह समझने वाले शुरुआती व्यक्तियों में सर आर्थर एंडिग्टन का नाम विशिष्ट माना जाता है। उनके बारे में एक भौतिक-विज्ञानी ने तो यहाँ तक कह दिया था-

‘‘सर आर्थर! आप संसार के उन तीन महानतम व्यक्तियों में से एक हैं जो सापेक्षता सिद्धांत को समझते हैं।’’ यह बात सुनकर सर आर्थर कुछ परेशान हो गये। तब उस भौतिक-विज्ञानी ने कहा- ‘‘इतना संकोच करने की क्या आवश्यकता है सर ?’’ इस पर सर आर्थर ने कहा-‘‘संकोच की बात तो नही है किन्तु मैं स्वयं सोच रहा था कि तीसरा व्यक्ति कौन हो सकता है ?’’

आर्थर एडिंगटन से सापेक्षवाद सिद्धान्त को सामान्य लोगो को उनकी भाषा मे समझाया और सापेक्षवाद पर सरल भाषा मे कई लेख लिखे। सरल रूप में उन्होंने ही सापेक्षवाद को इतना लोकप्रिय सिद्धान्त बनाया उनकी लिखी पुस्तक “Space, Time and Gravitation: An Outline of the General Relativity Theory” आज भी सापेक्षवाद की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में गिनी जाती है।

29 मई 1919 में एक पूर्ण सूर्यग्रहण लगा था उस समय आइंस्टीन की उम्र लगभग 40 साल थी। आइंस्टीन ने सूर्यग्रहण की उस घटना को धन्यवाद दिया साथ मे आर्थर एडिंगटन को भी क्योंकि उस व्यक्ति और उस घटना ने आइंस्टीन को रातों रात सेलेब्रिटी बना दिया था। वह व्यक्ति था आर्थर एडिंगटन। आर्थर एडिंगटन द्वारा सूर्यग्रहण के समय किये एक प्रयोग से यह पता चला कि दूर की सितारों से आनेवाली प्रकाश किरणों को सूर्य की गुरुत्वाकर्षण द्वारा वक्रीत किया जाता है। यह वक्रता उतनी ही है जितनी सामान्य सापेक्षवाद के अनुसार अनुमानित हैं। उस घटना ने सामान्य सापेक्षवाद सिद्धान्त को गुरुत्वाकर्षण का सबसे प्रमुख सिद्धान्त बना दिया।

आर्थर एडिंगटन ने सूर्य ग्रहण के दौरान तारों की स्थिति में विचलन देखा था यह विचलन सामान्य सापेक्षवाद सिद्धान्त को प्रमाणित करता था।
एडिंगटन को विश्वास था की अब आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार सापेक्षवाद सिद्धान्त के लिए मिलने वाला है। लेकिन नोबेल कमेटी ने सापेक्षवाद सिद्धान्त को प्रमाणित होने पर भी नोबेल पुरस्कार देना जरूरी नही समझा। बहुतों को और स्वयं आइंस्टीन को यह लगा जैसे कमेटी ने उनका तिरस्कार किया है। क्या वाकई आइंस्टीन के सिद्धांत प्रामाणिक नहीं थे? समस्या यह थी कि एडिंगटन द्वारा किए गए प्रेक्षण परिष्कृत नहीं थे और उन्होंने बहुत सारे डेटा को अनुपयोगी मानकर अपने निष्कर्षों में शामिल नहीं किया था।

लेकिन अन्ततः 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। जब नोबल कमेटी की पुरस्कार घोषणा में यह लिखा गया था कि आइंस्टीन को यह पुरस्कार

“सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान तथा विशेषकर प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए दिया जा रहा है”।

माना जाता है कि “सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान” लिखकर कमेटी ने एक तरह से उनकी सापेक्षता की खोज के गौरव को स्वीकार कर लिया था। लेकिन कमेटी ने एक स्थान पर यह भी लिख दिया कि “यह पुरस्कार सापेक्षता और गुरुत्व संबंधी आपकी स्थापनाओं को ध्यान में रखकर नहीं दिया जा रहा है क्योंकि उनकी पुष्टि होनी बाकी है”।

आर्थर एडींगटन की शिक्षा मैनचेस्टर विश्वविदयालय तथा कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कालेज मे हुई थी।

उन्हे निम्नलिखित खोजो के लिये भी जाना जाता है।

  • एडींगटन सीमा( Eddington limit)
  • एडींगटन संख्या( Eddington number)
  • एडींगटन -डिरैक संख्या(Eddington–Dirac number)
  • एडींगटन -फ़िंकेल्स्टाइन निर्देशांक(Eddington–Finkelstein coordinates)

सम्मान

  • रायल सोसाइटी का रायल पदक (Royal Society Royal Medal) (1928)
  • स्मिथ पुरस्कार (Smith’s Prize) (1907)
  • RAS स्वर्ण पदक(Gold Medal) (1924)
  • हेनरी ड्रेपर पदक(Henry Draper Medal) (1924)
  • ब्रुस पदक(Bruce Medal) (1924)
  • नाइट्स बैचलर(Knights Bachelor) (1930)
  • आर्डर आफ़ मेरीट(Order of Merit) (1938)


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Thursday, 29 November 2018

नकली चाँद की चाँदनी से रौशन होगा चीन!

धरती-चांद की सृष्टि होने के समय से ही सूरज की प्रचंड किरणों को सोखकर चांद उसे शीतलता में बदलकर दूधिया चांदनी पूरी धरती पर बिखेरता रहा है। रात के टिमटिमाते तारों भरे अनंत आकाश में चाद से सुंदर कुछ नहीं होता। इसलिए चांद सभ्यता के उदय काल से ही मानव की कल्पना को हमेशा से रोमांचित करता रहा है। दुनिया के लगभग सभी भाषाओं के कवियों ने चंद्रमा की पूर्णिमा की चांदनी वाले मनोहरी रूप पर अपनी-अपनी तरह से काव्य-सृष्टि की है। तब भला आम आदमी चांद और उसकी चांदनी का मुरीद क्यों न हो ! मगर नकली चांद, यह तो हैरान करने वाली बात है। भले यह बात अजीब लग रही हो, मगर सच है। अगर चीन की आर्टिफिशियल मून यानी मानव निर्मित कृत्रिम चांद बनाने की योजना सफल हो जाती है तो चीन के आसमान में 2020 तक अपना चांद चमकने लगेगा। यह नकली चांद चीन के चेंगडू शहर के सड़कों पर अपनी रोशनी फैलाएगा और तब वहां स्ट्रीटलैंप की जरूरत नहीं होगी।


चीन अपने इस अभिनव अंतरिक्ष योजना के जरिये अंतरिक्ष विज्ञान में एक बड़ी छलांग की तैयारी में जुटा हुआ है। उसकी इस प्रोजेक्ट को 2020 तक लांच करने का कार्यक्रम निर्धारित है। इस प्रोजेक्ट पर चेंगडू एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम रिसर्च इंस्टीट्यूट कारपोरेशन नामक निजी संस्थान कुछ वर्षों से काम कर रहा है। चीन के अखबार पीपुल्स डेली के अनुसार, यह प्रोजेक्ट अपने अंतिम चरण में है। चाइना डेली अखबार ने चेंगड़ू एयरोस्पेस कार्पोरेशन के निदेशक वु चेन्फुंग के हवाले से लिखा है कि सड़कों और गलियों में रोशनी करने पर होने वाले वर्तमान बिजली-खर्च को चीन घटाना चाहता है। नकली चांद से 50 वर्ग किलोमीटर के इलाके में रोशनी होगी, जिससे हर साल बिजली में आने वाला 17.3 करोड़ डॉलर का खर्च बचाया जा सकता है। आर्टिफिशियल मून आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्लैक आउट की स्थिति में भी बड़ा सहायक होगा।

चीन अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में अमेरिका और रूस की बराबरी करना चाहता है। इसके लिए उसने कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं बनाई हैं। हालांकि चीन नकली चांद बनाने की कोशिश में पूरी गंभीरता से जुटा हुआ है, मगर नकली चांद को स्थापित करने की राह इतनी आसान नहीं है। पृथ्वी के आकाश के एक ख़ास हिस्से में रोशनी करने के लिए मानव निर्मित चांद को बिलकुल निश्चित जगह पर बनाए रखना काफी कठिन काम है। नब्बे के दशक में रूस और अमेरिका भी कृत्रिम चांद बनाने की असफल कोशिश कर चुके हैं। चीन के इस प्रोजेक्ट पर पर्यावरणविदों ने सवाल भी उठाना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। दिन को सूरज और फिर रात में भी अधिक रोशनी फैलाने वाले कृत्रिम चांद के कारण वन्यप्राणियों का जीना दूभर हो जाएगा। उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। पेड़-पौधों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा प्रकाश-प्रदूषण भी बढ़ेगा।

अगर चीन का पहला प्रोजेक्ट सफल हुआ तो साल 2022 तक चीन ऐसे तीन चांद अपने आकाश में स्थापित कर सकता है। सवाल है कि नकली चांद काम कैसे करेगा? चेंगडू एयरोस्पेस के अधिकारियों के मुताबिक, नकली चांद एक शीशे की तरह काम करेगा, जो सूर्य की रोशनी को परावर्तित कर पृथ्वी पर भेजेगा। यह कृत्रिम चांद हू-ब-हू पूर्णिमा के चांद जैसा ही होगा, मगर इसकी रोशनी असली प्राकृतिक चांद से आठ गुना अधिक होगी। नकली चाद की रोशनी को नियंत्रित भी किया जा सकेगा। यह पृथ्वी से महज 500 किलोमीटर की दूरी पर आकाश में स्थपित होगा। जबकि असली चांद तो पृथ्वी से तीन लाख 80 हजार किलोमीटर दूर है। भविष्य के कवियों को भी ऐसे चांद से परेशानी हो सकती है, जो प्रेयसी के मुखमंडल की तुलना हजारों सालों से शीतल चांदनी वाले चौदहवीं के चांद से करते आए हैं। तब पाठकों-दर्शकों का मन इस बात से आशंकित बना रहेगा और सवाल यह भी उठेगा कि असली चांद की जगह कहीं नकली से तो तुलना नहीं की जा रही है! (pk110043@gmail.com)



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परग्रही जीवन भाग 6 : जल – जीवन का विलायक

जल

जल

वर्तमान मे जीवन के विलायक के रूप मे केवल जल ही ज्ञात है। अब हम देखते है जल की ऐसी कौनसी विशेषताये है जो उसे जीवन का विलायक बनाये हुये है, कैसे वह आदर्श जैव विलायक के रूप मे सभी आवश्यक शर्तो को पूरा करता है। यह हमे अन्य विलायको के आदर्श जीवन के विलायक के रूप मे  तुलना करने के लिये बेंचमार्क का कार्य भी करेगा।

सर्वत्र व्याप्त जल : जल समस्त ब्रह्मांड मे सबसे अधिक उपलब्ध अणु है। इसकी उपलब्धता इतनी है कि अधिकतर ग्रहो मे यह बड़ी मात्रा मे पाया जाना चाहिये, विरोधाभाष यह है कि यह द्रव रूप मे दुर्लभ है। पृथ्वी पर अकाबनिक द्रवो मे केवल जल ही प्राकृतिक रूप से द्रव अवस्था मे  प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध है।

जल एक सार्वत्रिक विलायक : जल सबसे अधिक प्रभावी विलायक है। इसे इसी गुण के कारण सार्वत्रिक विलायक ही कहते है। एक विलायक के रूप मे इसकी सफ़लता का कारण इसके अणु का अत्याधिक द्विध्रुवी(polarized) होना है, जिससे इसमे अन्य ध्रुविकृत अणु तथा लवण (Salt)भी घुल जाते है। अध्रुविकृत  कार्बनिक अणु जैसे तैलीय अणु ऐसे विशिष्ट वर्ह के अणु है जो साधारणत: जल मे नही घुलते है। लेकिन जल की इस सीमा के भी लाभ है जोकि हायड्रोफ़ोबिक प्रभाव उत्पन्न करता है। इस गूण की चर्चा हम आगे करेंगे।

जल एक सार्वत्रिक विलायक

जल एक सार्वत्रिक विलायक

एक बड़ी सीमा मे द्रव अवस्था : साधारण अवस्थाओं मे शुद्ध जल एक बड़ी सीमा मे द्रव अवस्था मे होता है 0-100°C/32-212°F। यदि इसमे साधारण लवण मिला दे तो उसका हिंमांक बिंदु कम होकर -23°C/-10°F तक पहुंच जाता है। यदि हम दबाव को वायुमंडलीय दबाव का 215 गुणा कर दे तो इसका बाष्पीकरण बिंदु 374°C/706°F पहुंच जाता है। इसका अर्थ है कि जल के द्रव अवस्था मे रहने की संभवत तापमान सीमा 397°C/716°F है।

जल का सबसे अधिक जलविरोधी(hydrophobic) प्रभाव है: जल का सबसे अधिक जलविरोधी प्रभाव होने से वह पृथ्वी पर जीवन मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह प्रभाव कोशीकाओं के मजबूत मेम्ब्रेन के निर्माण और रखरखाव के लिये अत्यावश्यक है। इस प्रभाव की भूमिका प्रोटीन की तहों के निर्माण के भी आवश्यक है, इन तहो के निर्माण से प्रोटीन त्रीआयामी आकार बना पाता है जिससे प्रोटीन एक निश्चित आकार मे रहकर अपने कार्य ठीक तरह से कर पाता है। प्रोटीन के तैलीय अमिनो अम्ल पानी से बचाव के लिये प्राकृतिक रूप से मध्य से मुड़ जाते है जबकि अन्य अमिनो अम्ल बाहर की ओर मुड़ते है।

जल के अन्य बहुत से विशिष्ट गुणधर्म है : जल के सबसे महत्वपूर्ण गुणो मे से एक यह है कि उससे कई विशिष्ट गुण साधारण सीमा से इस तरह बाहर है कि वे जीवन के लिये लाभदायी हो जाते है। जल का पारद्युतिक स्थिरांक(dielectric constant) अत्याधिक उच्च है जो कि जीवन के लिये उपयुक्त विलायको के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण होता है; इसके अतिरिक्त बहुत कम विलायक ही जल की उष्मीय गुणो के आसपास पहुंच पाते है, ये  गुण तापमान और उष्मा के प्रभाव को नियंत्रित करते है। जल की अत्याधिक उच्च उष्माधारिता(Hear Capacity),  द्रवण की गुप्त उष्मा(heat of fusion) , वाष्पन की गुप्त ऊष्मा(heat of vaporization) तथा उष्मा संवहन क्षमता  है। साथ ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण गुणो मे अत्याधिक पृष्ठ तनाव, कम श्यानता तथा उच्च विसरण है।

जल कार्बनिक रसायन के लिये आदर्श है। हम देख चुके है कि कार्बन अकेला तत्व है जो जैव रसायन के लिये आदर्श है। कार्बनिक रसायन प्रक्रियाओं के लिये जल सबसे अधिक उपयुक्त विलायक है। यह दो महत्वपूर्ण कारणो से होता है, कार्बन  जल के दोनो तरह के परमाणुओं आक्सीजन और हायड्रोजन दोनो से मजबूत रासायनिक बंधन बनाता है। कार्बन और हायड्रोजन के मध्य का बंधन साधारण पदार्थो मे पाया जाने  वाला सबसे अधिक मजबूत बंधन है। दूसरा साधारण दबाव मे जल के द्रव अवस्था मे रहने वाली तापमान सीमा ( (0-100°C or 32-212°F)इतनी है कि कार्बन रसायन प्रक्रियाये आसानी से हो जाती है। कार्बन प्रक्रियाये इससे कम तापमान मे अन्य विलायको मे भी संभव है लेकिन वे धीमी होती है और उससे जैविक विकास बहुत धीमा हो जायेगा। इसके विपरीत उच्च तापमान पर यह प्रक्रिया संभव नही होंगी क्योंकि कार्बनिक यौगिक 200°C/392°F तापमान पर टूटने लगते है। जल के द्रव अवस्था मे रहने वाली सीमा कार्बनिक रसायन के लिये आदर्श है।

 

सारांश मे जल विलक्षण द्रव है। विलायक के रूप मे उसकी बराबरी मे कोई नही है। एक तरह से यह मानकर चल सकते हैं कि जल जीवन के लिये ही बना है।

 

अब तक हमने देखा है कि जल के गुणधर्म किस तरह जीवन के लिये आवश्यक है। लेकिन यह गुण ही जीवन के लिये महत्वपूर्ण नही है। जल की भूमिका समस्त ग्रह के पर्यावरण नियंत्रण मे भी महत्वपूर्ण भूमिका है जिससे जीवन संभव होता है। इसमे से कुछ महत्वपूर्ण गुण है

  1. झील, नदीयों और ध्रुविय क्षेत्रो को हीमीकृत होने से बचाना
  2. वैश्विक तापमान का नियंत्रण तथा तीव्र मौसमी बदलाव से बचाव
  3. भूगर्भीय संरचनाओं मे भूकटाव, नदी, घाटी निर्माण और मिट्टी के स्थानांतरण मे सहायता
  4. लवण और खनीजो के वैश्विक स्थानांतरण मे सहायता
  5. भूप्लेटो के स्थानांतरण मे सहायता
  6. जलीय जीवन को सहायता
  7. प्राणी और मानव के शारीरीक तापमान पसीने के द्वारा शीतलन और नियंत्रण

यह सभी कारक महत्वपूर्ण है क्योंकि सभी जीवित प्राणी अपने वातावरण पर अत्याधिक निर्भर होते है। इसके स्थानापन्न विलायक पर चर्चा की जा सकती है, उसकी तुलना जल से करनी होगी। पृथ्वी पर जीवन के लिये जल की भूमिका चंहुओर है जिसमे जीवन के लिये अनुकुल वातावरण, मौसम का निर्माण और नियंत्रण का भी समावेश होता है। अन्य कोई द्रव इन गुणो मे जल के आसपास भी नही पहुंचता है।

 

जल की कमीयाँ

जल एक आदर्श विलायक है और उसमे कई अद्भुत गुण है लेकिन कुछ वैज्ञानिको के अनुसार वह पृथ्वी पर भी हर परिस्थिति मे आदर्श नही है। अब हम जल की इन कमीयों की चर्चा करेंगे।

  • जल हिमीकृत होने पर कोशीकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। जल का एक विचित्र गुण है, जब वह हिमीकृत होता है तो वह फ़ैलता है। यह झीलो, नदीयो तथा आर्कटीक सागर को हिमीकृत होने पर ठोस होने से बचाता है लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि जल कोशिका के अंदर हिमीकृत होने पर कोशीकाओं की मेम्ब्रेन को तोड़ देता है और कोशिका मृत हो जाती है। यह अन्य विलायकों पर आधारित जीवन पर लागु नही होगा क्योंकि वे हिमीकृत होने पर संकुचित होते है, जल के जैसे फ़ैलते नही है। सामान्यत: जल के हिमीकरण से होने वाली हानि अधिक नही होती है क्योंकि बहुत से पौधो और प्राणीयों ने जल के हिमीकरण के दौरान होनेवाले फ़ैलाव से बचने के उपाय खोज लिये है। उदाहरण के कुछ प्राणी प्राकृतिक हिमीकरण रोधी रसायन उत्पन्न करते है जो तापमान के जल के हिमीकरण बिंदु से नीचे जाने के बावजूद उनके शरीर के अंदर जल के हिमीकरण को रोक देते है।
  • जल प्रतिक्रियाशील है और मुख्य जैव अणुओं को क्षति पहुंचा सकता है। सामान्यत: जल को अक्रियाशील माना जाता है और उसे घरो मे, व्यवसायिक तथा औद्योगिक स्थानो मे धड़्ल्ले से प्रयोग किया जाता है। अपेक्षाकृत रूप से जल उदासीन है लेकिन कुछ साधारण सामान्य पदार्थो जैसे तैलिय हाइड्रोकार्बन के साथ वह अधिक क्रियाशील है। इसी वजह से कार्बनिक रसायनज्ञ अपने 80 प्रतिशत से अधिक कार्यो मे  जल की बजाय अन्य विलायको का प्रयोग करते है जिससे कि जल के अन्य प्रक्रियाओं को प्रभावित करने से बच सके। सबसे प्रमुख मुद्दा जल के द्वारा कुछ मुख्य जैविक अणु जैसे डी एन ए का धीमे धीमे क्षरण है, इससे बचाव के लिये डी एन ए के पास एक जटिल क्षतिपूर्ती प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। लेकिन यह पूरी कहानी नही है। पानी के पूर्णत उदासीन नही होने के कुछ लाभ भी है क्योंकि उसकी कुछ महत्वपूर्ण जैवरासायनिक प्रक्रियाओं मे आवश्यकता होती है।
  • जल कार्बनडाय आक्साईड के साथ संगत नही है। कार्बन डाई आक्साईड  पौधो मे प्रकाश संशलेषण के लिये एक प्रमुख घटक है। पृथ्वी पर पौधे वर्ष मे लगभग 258  अरब टन CO2 की खपत करते है। गैस के रूप मे समस्त वातावरण मे आसानी से समांगी रूप से फ़ैल जाती है जिससे वह समस्त जमीनी पौधो के लिये आसानी से उपलब्ध होती है। लेकिन जल मे CO2 आसानी से घुलनशील नही है, उसकी बजाय वह CO2 से प्रतिक्रिया कर घूलनशील बायोकार्बोनेट (HCO3) आयन बनाती है। यह जलीय वातावरण जैसे झीलो और सागरो मे जलीय वनस्पति के लिये CO2 की उपलब्धता के लिये अत्यावश्यक है। लेकिन गोरखधंधा यह है कि बायोकार्बोनेट (HCO3) आयन अधिक प्रक्रियाशील नही है लेकिन घुलनशील है, CO2 प्रक्रियाशील है लेकिन घुलनशील नही है। इस समस्या के कारण जलीय और स्थलीय पौधो के सामने एक चुनौति उत्पन्न होती है। पौधो के पास इस समस्या से निपटने का एक उपाय बायोटीन (biotin)एन्जाईम है। बायोटीन चयापचय प्रक्रिया के लिये अधिक ऊर्जा लेता है साथ ही CO2 की अधिक मात्रा प्रयोग नही कर पाता है। अधिकतर कार्बन यौगिकीकरण  एक दूसरे एंजाईम रुबिस्को(rubisco ribulose-1,5-bisphosphate carboxylase oxygenase) से किया जाता है। लेकिन रुबिस्को की छवि अपव्ययी तथा अक्षम एंजाईम होने ही है। यह जिन प्रक्रियाओं के लिये उत्प्रेरक का काम करता है वह धीमी तो होती है और वह O2 और CO2 मे अंतर नही कर पाता है। जब वह आक्सीजन को लेता है तब बहुत से अवांछित यौगिक बनते है जिसका अर्थ और अधिक मात्रा मे रुबिस्को की आवश्यकता होती है।  लेकिन यह समस्या जल या रुबिस्को की कमी ना होकर CO2 तथा O2 की आंतरिक रसायनिक समानता के कारण है।

 

सारांश यह है कि जल मे कुछ कमीयाँ है लेकिन वह उसके लाभो के सामने कुछ नही है। जल का निर्माण ही जीवन के लिये हुआ है। जीवन के लिये जल की तुलना मे कोई भी अन्य विलायक आदर्श ना होने से नासा जीवन की खोज के लिये अंतरिक्ष मे ग्रहों के पास द्रव जल की खोज करता है। लेकिन सभी खगोल जैव वैज्ञानिक ऐसा नही मानते है कि केवल जल ही जीवन के लिये आवश्यक संभव विलायक है, वे अमोनिया और उसके जैसे कुछ अन्य द्रवों  को जीवन के लिये संभव विलायक होने की संभावना पर विचार कर रहे है।

अगले लेख मे हम चर्चा करेंगे जल के विकल्पो की

लेख शृंखला

परग्रही जीवन भाग 1 : क्या जीवन के लिये कार्बन और जल आवश्यक है ?

परग्रही जीवन भाग 4 :बोरान आधारित जीवन

परग्रही जीवन भाग 5 : जीवन अमृत – जल एक महान विलायक



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Tuesday, 27 November 2018

नासा का मंगलयान ’इनसाइट ’ मंगल पर उतरा

इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस

इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस

नासा का रोबोटिक मंगलयान (मार्स लैंडर) “इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस” 26 नवंबर 2018 सोमवार रात 1:24 बजे मंगल ग्रह पर सफलता पूर्वक उतर गया। नासा के अनुसार पहली बार प्रायोगिक उपग्रहो ने किसी अंतरिक्ष यान का पीछा करते हुए उस पर नजर रखी। इस पूरे अभियान पर 99.3 करोड़ डॉलर (करीब 7044 करोड़ रुपए) का खर्च आया। ये दोनों उपग्रह मंगल पर पहुंच रहे अंतरिक्ष यान से छह हजार मील पीछे चल रहे थे। नासा ने इसी साल 5 मई को कैलिफोर्निया के वंडेनबर्ग एयरफोर्स स्टेशन से एटलस वी रॉकेट के जरिए मार्स लैंडर लॉन्च किया था।

इनसाइट (InSight या Interior Exploration using Seismic Investigations, Geodesy and Heat Transport) एक रोबोट मंगल ग्रह लैंडर है। जो मूल रूप से मार्च 2016 में प्रक्षेपण के लिए योजना बनाई थी। इसके उपकरण की विफलता के कारण लांच करने से पहले दिसंबर 2015 में नासा ने मिशन स्थगित की घोषणा की। और मार्च 2016 में, लांच 5 मई 2018 के लिए पुनर्निर्धारित किया गया।

मंगल के बारे में विस्तृत अध्ययन के लिए नासा ने क़रीब सात महीने पहले (इसी साल पांच मई को) इस खोजी अभियान को धरती से रवाना किया था।

30 करोड़ मील यानी 45.8 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय कर इनसाइट ने सोमवार को मंगल की ज़मीन पर एलिसियम प्लानिशिया नामक एक सपाट मैदान में लैंडिंग की। ये जगह इस लाल ग्रह की भूमध्य रेखा के नज़दीक है और लावा से बनी चादर के जैसी है।

इनसाइट का उद्देश्य मंगल की ज़मीन के भीतर छिपे राज़ की पड़ताल कर अधिक जानकारी जुटाना है।

मंगल ग्रह से इनसाइट ने धरती पर संकेत भेजा है कि वो काम शुरु करने के लिए तैयार है। उसने सूरज की रोशनी पाने के लिए अपने सोलर पैनल फैला लिए हैं और ख़ुद को चार्ज कर रहा है।

नासा के इनसाइट प्रोजेक्ट मैनेजर टॉम हॉफ़मैन ने कहा है,

“अब इनसाइट आराम से काम कर सकता है, वो अपनी बैटरी रीचार्ज कर रहा है।”

संक्षेप मे

  1. छह महीने पहले लॉन्च किया गया था इनसाइट अंतरिक्ष यान
  2. 7044 करोड़ रुपए अभियान की लागत, इसमेमं 10 देशों के वैज्ञानिक शामिल
  3. इनसाइट अंतरिक्ष यान पता लगाएगा कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने

अभियान

इनसाइट InSight

इनसाइट
InSight

इनसाइट के लिए लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजरें इनसाइट पर रहीं। डिज़्नी के किरदारों के नाम वाले ये सैटेलाइट्स ‘वॉल-ई’ और ‘ईव’ ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे अभियान का सीधा प्रसारण किया।

यह ग्रह की सतह पर उतरने के दौरान 19,800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से छह मिनट के भीतर शून्य की रफ्तार पर आ गया। इसके बाद यह पैराशूट से बाहर आया और अपने तीन पैरों पर लैंड किया। नासा ने इस यान को मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए और इस ग्रह से जुड़े नए तथ्यों का पता लगाने के लिए तैयार किया है। नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। नासा के इस यान में 1 बिलियन डॉलर यानी 70 अरब रुपए का खर्च आया है। सौर ऊर्जा और बैटरी से ऊर्जा पाने वाले लैंडर को 26 महीने तक संचालित होने के लिए डिजाइन किया गया है। हालांकि नासा को उम्मीद है कि यह इससे अधिक समय तक चलेगा।

पांच मई को लांच किया गया मार्स ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सीस्मिक इंवेस्टिगेशंस, जियोडेसी एंड हीट ट्रांसपोर्ट’ (इनसाइट) लेंडर 2012 में ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ के बाद मंगल पर उतरने वाला नासा का पहला अंतरिक्ष यान है।

दो साल का मिशन

यान के मंगल की धरती पर उतरते ही दो वर्षीय मिशन शुरू हो जाएगा। इसके साथ ही इनसाइट पहला अंतरिक्ष यान हो जाएगा जो मंगल की गहरी आंतरिक संरचना का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को हमारी अपनी पृथ्वी सहित पत्थर से बने सभी ग्रहों के निर्माण को समझने में मदद मिलेगी।

इनसाईट मंगल ग्रह के बारे में ऐसी जानकारियां दे सकता है, जो अरबों सालों से नहीं मिली हैं।

अपने अभियान के दौरान यह यान मंगल पर एक साइज़्मोमीटर रखेगा जो इसके अंदर की हलचलें रिकॉर्ड कर सकेगा। यह पता लगाएगा कि मंगल के अंदर कोई भूकंप जैसी हलचल होती भी है या नहीं।

यह पहला यान है जो मंगल की खुदाई करके उसकी रहस्यमय जानकारियां जुटाएगा। साथ ही एक जर्मन उपकरण भी मंगल की ज़मीन के पांच मीटर नीचे जाकर उसके तापमान का पता लगाएगा।

ग्रह के इस तापमान से यह पता चल सकेगा कि मंगल ग्रह अभी भी कितना सक्रिय है।

इसके तीसरे प्रयोग में रेडियो ट्रांसमिशन का इस्तेमाल होगा जिससे यह बता चलेगा कि यह ग्रह अपनी धुरी पर डगमगाते हुए कैसे घूमता है।

इस अभियान से जुड़ी एक वैज्ञानिक सुज़ैन स्म्रेकर कहती हैं,

“आप एक कच्चा अंडा लें और एक पक्का अंडा, दोनों को घुमाने पर वह अलग-अलग तरीक़े से घूमेगा क्योंकि उसके अंदर तरल पदार्थ अलग-अलग है। आज हम यह नहीं जानते हैं कि मंगल के अंदर तरल चीज़ है या ठोस चीज़। साथ ही इसका भीतरी भाग कितना बड़ा है यह नहीं मालूम। इनसाईट हमें इसकी जानकारियां देगा।”

इनसाइट से जुड़ी खास बातें

  1. इनसाइट द्वारा लिया प्रथम चित्र

    इनसाइट द्वारा लिया प्रथम चित्र

    358 किलो के इनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’ है। सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यह यान 26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया है।

  2. 7000 करोड़ के इस अभियान में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं।
  3. इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट ने कहा कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।
  4. इसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा। दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।
  5. नासा ने इनसाइट को लैंड कराने के लिए इलीशियम प्लैनिशिया नाम की लैंडिंग साइट चुनी। इस जगह सतह सपाट थी। इससे सीस्मोमीटर लगाने और सतह को ड्रिल करना आसान हुआ।
  6. इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।
  7. भूकंप से पैदा होने वाली सिस्मिक वेव से बनाया जाएगा मंगल का आंतरिक नक्शा
  8. मंगल पर भूकंप से पैदा होने वाली सिस्मिक वेव से मंगल के आंतरिक नक्शे बनेंगे। पहले भेजे गए क्यूरोसिटी अंतरिक्ष यान का लक्ष्य पानी पर था, लेकिन यह यान मंगल की संरचना का अध्ययन करेगा।
  9. मंगल ग्रह कई मामलों में पृथ्वी के समान है। दोनों ग्रहों पर पहाड़ हैं। हालांकि, पृथ्वी की तुलना में इसकी चौड़ाई आधी, भार एक तिहाई और घनत्व 30% से कम है।

मंगल ग्रह के बारे में 10 तथ्य

1- सौर मंडल  मंगल सूरज से 227,900,000 कि.मी. की दूरी पर है। सौर मंडल में धरती तीसरे क्रमांक पर है जिसके बाद चौथे क्रमांक पर मंगल है। धरती सूरज से 149,600,000 कि.मी. की दूरी पर है।

2- धरती की तुलना में मंगल ग्रह लगभग इसका आधा है। जहां धरती का व्यास 12,742 कि.मी. है, मंगल का व्यास 6,779 कि.मी. है। लेकिन वजन की बात की जाए को मंगल धरती के दसवें हिस्से के बराबर है।

3- मंगल सूरज का पूरा चक्कर 687 दिनों में लगाता है। इस आधार पर धरती की तुलना में मंगल सूरज का चक्कर लगाने में दोगुना वक़्त लेता है और यहां एक साल 687 दिनों का होता है।

4- मंगल पर एक दिन (जिसे सौर दिवस कहा जाता है) 24 घंटे 37 मिनट का होता है।

5- कँपकँपा देने वाली ठंड, धूल भरी आँधी का ग़ुबार और फिर बवंडर-पृथ्वी के मुक़ाबले ये सब मंगल पर कहीं ज़्यादा है। माना जाता है कि जीवन के लिए मंगल की भौगोलिक स्थिति काफ़ी अच्छी है।

गर्मियों में यहाँ सबसे ज़्यादा तापमान होता है 30 डिग्री सेल्सियस और जाड़े में यह शून्य से घटकर 140 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है।

6- धरती की तरह मंगल में भी साल में चार मौसम आते हैं- पतझड़, ग्रीष्म, शरद और शीत। धरती की तुलना में मंगल में हर मौसम लगभग दोगुना वक्त तक रहता है।

7- धरती और मंगल पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति अलग होने के कारण धरती पर 100 किग्रा वज़न वाला व्यक्ति मंगल पर 38 किग्रा वज़न का होगा।

8- मंगल के पास दो चांद हैं- फ़ोबोस जिसका व्यास 23 कि. मी. है और डेमियोस जिसका व्यास 12 कि.मी. है।

9- मंगल और धरती दोनों ही चार परतों से बने हैं। पहली पर्पटी यानी क्रस्ट जो लौह वाले बसाल्टिक पत्थरों से बना है। दूसरा मैंटल जो सिलिकेट पत्थरों से बना है।

तीसरे और चौथे हैं बाहरी कोर और आंतरिक कोर। माना जाता है कि ये धरती के कोर की तरह लोहे और निकल से बने हो सकते हैं। लेकिन ये कोर ठोस धातु की शक्ल में है या फिर ये तरल पदार्थ से भरा है अभी इसके बारे में पुख़्ता जानकारी मौजूद नहीं है।

10- मंगल के वातारण में 96 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड है, 1.93 प्रतिशत आर्गन, 0.14 प्रतिशत ऑक्सीजन और 2 प्रतिशत नाइट्रोजन है।

साथ ही यहां के वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड के निशान भी पाए गए हैं।



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Sunday, 18 November 2018

1875 के पश्चात SI ईकाईयों मे सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन

पेरीस मे रखा किलोग्राम का बांट

पेरीस मे रखा किलोग्राम का बांट

लेखक : अनमोल

मापन ईकाईयो मे 1875 के पश्चात सबसे बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन के लिये अंतराष्ट्रीय स्तर पर मतदान हुआ और इस बदलाव के फ़लस्वरूप चार मूलभूत ईकाईयों की परिभाषाये पुननिर्धारित की गई, ये ईकाईयाँ है – एम्पीयर, किलोग्राम, केल्विन और मोल।

अंतराष्ट्रीय ईकाईयो की प्रणाली जिसे संक्षेप मे SI भी कहा जाता है, मे अब सभी ईकाईयाँ प्रकृति के विभिन्न मूलभूत स्थिरांको पर आधारित होंगी। यह नये मानक पुरानी वस्तुओं पर आधारित ईकाईयों के वर्तमान मूल्यों को मूलभूत स्थिरांको के रूप मे विभिन्न प्रयोगो द्वारा परिवर्तन कर निर्धारित किये गये है। वर्तमान मे प्रचलित मापन ईकाई किसी भौतिक वस्तु या अनियमित संदर्भ पर आधारित है।

अंतर्राष्ट्रीय भार तथा मापन ब्युरो(International Bureau of Weights and Measures (BIPM)) के पूर्व प्रमुख टेरी क्यिन(Terry Quinn) के अनुसार

“मेसोपोटामीया सभ्यता के बाद, शायद 5000 वर्ष पहले से किसी वस्तु के द्रव्यमान के मापन के लिये एक वस्तु और दूसरी ओर स्थानिय द्रव्यमान मापन का वजन बाट ही रहा है लेकिन अगले वर्ष की 20 मई से ऐसा नही रहेगा। यह अभूतपूर्व और असाधारण घटना है।

NIST के भौतिक वैज्ञानिक डेविड नेविल यह कहते है कि मापन ईकाईयों मे इस परिवर्तन से SI मापन प्रणाली परिपूर्ण नही हो जायेगी। वैज्ञानिको का अगला कार्य सेकंड की परिभाषा को बेहतर करना और अन्य ईकाईयों का इसमे समावेश करना है। यह हैरी पोर्टर की श्रृंखला के समापन के जैसा है कि अच्छाई की जीत हुई है लेकिन सब बर्बाद हो चुका है। SI प्रणाली मे अब भी बहुत कुछ साफ़ करना बचा है।

यह परिवर्तन क्यों आवश्यक था ?

किसी भी चीज़ को अनन्त शुद्धता से मापन संभव नही है। आपका एक मीटर वाला स्केल 1.00 मीटर का जरूर होगा मग़र अगर उस स्केल को और अच्छे यन्त्र से मापें तो 1.0025 मीटर हो सकता है। और उसे और भी अच्छे यंत्र से मापेंगे तो हो सकता है वह 1.002523 मीटर निकले। इसमें यह मापन बेहतर उपकरण से करते जाएँगे और स्केल की लंबाई का पता उतनी ही शुद्धता से लगता जाएगा मग़र लंबाई की जानकारी में कुछ न कुछ अशुद्धता हमेशा ही बनी रहेगी। इसी तरह मापने वाली आप किसी भी चीज़ को ले लें जैसे समय या द्रव्यमान; यह बात सबके लिये सत्य है।

किलोग्राम बाट के द्रव्यमान मे समय के साथ आया विचलन

किलोग्राम बाट के द्रव्यमान मे समय के साथ आया विचलन

वर्तमान मे इसमें एक अपवाद है। वो अपवाद है फ़्रान्स में 90% प्लेटिनम और 10% इरेडिम के सम्मिश्रण से बनी और निहायत ही कड़ी सुरक्षा में रखी एक चीज़ जिसे IPK या ‘इंटर्नैशनल प्रोटोटाइप ऑफ़ दि किलोग्राम’ कहते हैं। इसका द्रव्यमान एक किलोग्राम है। और वो इसलिए नहीं क्योंकि इसे बड़ी ही सावधानीपूर्वक तौलकर बनाया गया है बल्कि वो इसलिए क्योंकि उसी के द्रव्यमान से एक किलोग्राम को परिभाषित किया गया है। यानी उसका जो द्रव्यमान है उसको ही “एक किलोग्राम” कहते हैं। 1889 में GCPM या ‘जनरल कॉन्फ्रेंस ऑन वेट्स एंड मेज़र्स’ का पहला सम्मेलन हुआ था और उसी में किलोग्राम के इस प्रोटोटाइप को स्वीकार किया गया था और तब से आजतक पूरे विश्व में किलोग्राम का जो मानक है वो वही है।

1889 में जब इस प्रोटोटाइप को स्वीकार किया गया तब इसकी कई प्रतिकृतियाँ भी बनवायी गयीं। मुख्य IPK और उसकी 6 मुख्य प्रतिकृति फ्रांस में ही BPIM या ‘इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ़ वेट्स एंड मेज़र्स’ में शान्ति से कड़ी सुरक्षा में रखी हैं। फ़्रांस में ही इसकी दस प्रतिकृति और हैं और वो ही काम में लायी जाती हैं। इसके साथ ही BPIM ने हर सदस्य देश को भी एक एक प्रतिकृति मुहैया करवाई है। हर देश के अंदर किलोग्राम का जो मानक होता है वो उसके देश को मिली प्रतिकृति पर ही निर्भर करता है। भारत तो उस समय था नहीं इसलिए भारत को अपनी प्रतिकृति 1958 में मिली और ये प्रतिकृति दिल्ली स्थित नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी में रखी है। भारत वाली प्रतिकृति का नंबर K57 है। (रोचक तथ्य, एक प्रतिकृति पाकिस्तान के पास भी है K93)
इतना सब तो ठीक है मगर IPK की ये जो इतनी प्रतिकृति हैं तो इनका वजन भी एक किलोग्राम है?

नहीं!

केल्विन के मूल्य की निर्धारण विधि

केल्विन के मूल्य की निर्धारण विधि

यह संभव ही नहीं है। लेकिन ये सभी प्रतिकृति उस मूल से जितना ज्यादा संभव हो सकता है उतनी समान हैं। इन सभी प्रतिकृति में समय के साथ-साथ एक किलोग्राम के लाखवें हिस्से जितना कम-ज़्यादा होता रहता है। इसलिए हर देश की प्रतिकृति समय-समय पर फ़्रांस में BPIM फ़िर से कैलिबरेट करवाने के लिए भेजी जाती है। भारत में जो प्रतिकृति है वो 1985, 1992, 2002 और 2012 में कैलिबरेट करवायी गयी। IPK में समस्या तो दिखने ही लगी होगी। सबसे पहली बात तो इस तक पहुंचना बहुत ही मुश्किल है तो उसका प्रयोग नामुमकिन जैसा है। देशों को उसकी प्रतिकृति से काम चलाना होता है जो कि भले ही एक किलो हैं पर परिपूर्ण एक किलो नहीं हैं। दूसरी बात सबको एक प्रतिकृति देने से भी काम कहाँ चल जायेगा। हर देश में इतनी सारी प्रयोगशालाएं हैं, सबको कैसे मिलेगा अपने देश की ही प्रतिकृति तक पहुच देना कठीन है? ऊपर से ये स्वयं भी अपना द्रव्यमान बनाये नहीं रख पाता जो सबसे ज़रूरी है। माइक्रोग्राम में ही सही पर कमी बढोत्तरी तो होता ही है।

इसलिये मापन ईकाईयों के मूल्य निर्धारण के लिये कुछ ऐसा चाहिए जो विश्वव्यापी हो और जो समय के साथ भी कभी भी न बदले। कुछ ऐसा जो खुद में ही परिभाषित हो और प्रायोगिक तौर पर भी सर्वसुलभ हो। ऐसा क्या हो सकता है?

इसका उत्तर है मूलभूत भौतिक नियतांक। ये वो स्थिरांक हैं जिन्हें आप भले ही पूर्ण शुद्धता से माप न पाओ लेकिन इनका मूल्य स्थिर होता हैं जो कभी नहीं बदलता। हर देश-काल में एक जैसी ही रहती हैं। फिर क्यों न किलो आदि की परिभाषा इनपे ही आधारित कर दी जाये?

ईकाईयों के प्रयोग मे स्थिरांको/नियतांको का प्रयोग

विद्युत धारा का मापन

विद्युत धारा का मापन

यही सब सोंचते हुए 2011 में हुए GCPM के 24 वें सम्मलेन में वैज्ञानिकों ने इस आवश्यकता के कारण प्राकृतिक नियतांकों के आधार पर मापन की मूलभूत ईकाइयों को परिभाषित करने का प्रस्ताव सामने रखा। 2014 में 25वां सम्मलेन हुआ और इसमें भी इस बात पर चर्चा हुई मगर अंतिम फैसला नहीं हुआ क्यूंकि इन नियतांकों की जो भी मूल्य है वो हमेशा हमेशा के लिए एक परिभाषा के द्वारा स्थित की जानी थी और उसके लिए प्रयोगों द्वारा इन नियतांकों की सबसे शुद्धतम मूल्य का ज्ञात होना बहुत ज़रूरी था, जिससे कि नयी परिभाषा आने के बाद भी आम रोजमर्रा के कार्य में कोई प्रभाव नहीं पड़े और नया किलोग्राम पुराने किलोग्राम से जितना निकट हो सके उतना निकट हो।

मापन की ईकाईयों के आधार मे प्राकृतिक स्थिरांको के प्रयोग का आईडीया अपरिवर्तनीय है और वह किसी एक देश से संबधित नही है। यह आईडीया 19वी सदी के अंत मे प्रस्तावित किया गया था लेकिन इसके प्रयोग मे लाने के लिये 150 वर्ष लग गये।

यह तय हुआ कि इन नियतांकों के आधार पर परिभाषा तो बनेगी मगर उससे पहले इन नियतांकों को पुनः पूरी शक्ति के साथ और भी अधिकतम शुद्धता से मापा जाये। तो इतने सालों से दुनियाभर के अनेकों वैज्ञानिक इन नियतांकों को नयी नयी तकनीकें अपनाकर जितना हो सके उतनी शुद्धता से मापने की कोशिश करते रहे।

विद्युत पर कार्य करते वैज्ञानिक अपने प्रयोगो को उन्नत करते रहे और वे इलेक्ट्रानो की संख्या की गिनती करने मे जुटे रहे जिससे कि वे एक अकेले कण के आवेश के प्रयोग से एक एम्पीयर को परिभाषित कर सके। वर्तमान एम्पीयर की परिभाषा एक वैचारिक प्रयोग पर आधारित है जिसमे दो अनंत लंबाई के तारों का प्रयोग होता है। एम्पीयर की ईकाई मे यह परिवर्तन विद्युत इंजीनियरो द्वारा 1990 से प्रयुक्त प्रणाली के जैसे ही है जिसे वे अचूकता के लिये प्रयोग करते रहे है।

केल्विन को अब बोल्ट्जमैन स्थिरांक के प्रयोग से परिभाषित किया जायेगा जो कि ऊर्जा और तापमान को जोड़ता है। जबकि वर्तमान मानक जल के विशिष्ट तापमान के संदर्भ मे है जिसे तिहरा बिंदु(Triple Point) कहते है।

जबकी मात्रा की मानक ईकाई मोल जोकि वर्तमान के कार्बन 12 के 0.012 किलोग्राम मे परमाणुओं की संख्या के तुल्य है, अब अवोगाड्रो संख्या(Avogadro’s number) के तुल्य होगी।

परिवर्तन

मोल की परिभाषा विधि

मोल की परिभाषा विधि

मापन ईकाईयो मे 1875 के पश्चात सबसे बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन के लिये अंतराष्ट्रीय स्तर पर मतदान हुआ और इस बदलाव के फ़लस्वरूप चार मूलभूत ईकाईयों की परिभाषाये पुननिर्धारित की गई, ये ईकाईयाँ है – एम्पीयर, किलोग्राम, केल्विन और मोल।

16 नवंबर 2018 को , वर्सेल्स फ़्रांस(Versailles, France) मे विश्व के 60 देशों की सरकारो के प्रतिनिधीयों ने सर्वसम्मति से इन बदलावो को स्विकार किया। यह परिवर्तन 20 मई 2019 से प्रभावी होंगे।

अंतराष्ट्रीय ईकाईयो की प्रणाली जिसे संक्षेप मे SI भी कहा जाता है, मे अब सभी ईकाईयाँ प्रकृति के विभिन्न मूलभूत स्थिरांको पर आधारित होंगी। यह नये मानक पुरानी वस्तुओं पर आधारित ईकाईयों के वर्तमान मूल्यों को मूलभूत स्थिरांको के रूप मे विभिन्न प्रयोगो द्वारा परिवर्तन कर निर्धारित किये गये है। वर्तमान मे प्रचलित मापन ईकाई किसी भौतिक वस्तु या अनियमित संदर्भ पर आधारित है।

GCPM यानी ‘जनरल कॉन्फ्रेंस ऑन वेट्स एंड मेज़र्स’ का 26 वाँ सम्मेलन , इस सम्मेलन में प्लांक नियतांक, बोल्ट्समैन नियतांक, आवोगाद्रो नियतांक और मूलभूत आवेश या एक इलेक्ट्रॉन के आवेश को स्थिर कर दिया गया और इनके आधार पर किलोग्राम, एम्पियर, केल्विन और मोल को फ़िर से परिभाषित किया गया और यह तय किया गया कि आने वाले 20 मई 2019 से अंतर्राष्ट्रीय इकाई प्रणाली या SI सिस्टम में इन चार नियतांकों का मूल्य इस प्रकार रहेगा:

  • प्लैंक स्थिरांक(Planck constant) h = 6.626 070 15 × 10−34 J s, (किलोग्राम के लिए)
  • मूलभूत आवेश(Elementary Charge) e = 1.602 176 634 × 10−19 C, (एम्पियर के लिए)
  • बोल्टजमैन स्थिरांक( Boltzmann constant) k = 1.380 649 × 10−23 J/K, (केल्विन के लिए)
  • अवागाड्रो स्थिरांक (the Avogadro constant) NA = 6.022 140 76 × 1023 mol-1, (मोल के लिए)

 

ध्यान रहे कि इस परिभाषा के लागू हो जाने के बाद से इन नियतांकों का यह मूल्य हमेशा-हमेशा के लिए स्थाई हो जाएगा और इनमें कोई भी अशुद्धता नहीं रह जाएगी। इसका अर्थ यह है कि इसके बाद से इन नियतांकों के मूल्य का मापन करना या ज़्यादा शुद्धता से मापन करना जैसी बातें अर्थहीन हो जाएँगी क्योंकि अब यह नियतांक किसी प्रयोग से आया मूल्य के रूप मे नहीं हैं जिनमें कुछ न कुछ अशुद्धता हो सकती है। बल्कि अब इन नियतांकों को यह मूल्य एक परिभाषा के माध्यम से मि्ला है जिससे इनमें अनंत शुद्धता है। नयी परिभाषा लागू होने से पहले इन नियतांकों के मूल्य में जो प्रयोगात्मक अशुद्धता थी वो अशुद्धता अब अपने किलोग्राम के प्रोटोटाइप में ट्रांसफर हो जाएगी, जिससे फ़्रांस में रखे अपने उस प्रोटोटाइप का मूल्य परिपूर्ण एक किलोग्राम नहीं रह जाएगी और उसमें कुछ अशुद्धता आ जाएगी जो कि फ़िलहाल दस करोड़ में एक हिस्से के बराबर है। भविष्य में भी उस प्रोटोटाइप का द्रव्यमान कितना बदलता है अब यह प्रयोगों के माध्यम से तय किया जायेगा। यानी पहले लोग जिससे खुद की तुलना करते थे, जो ख़ुद को बस ख़ुद से तुलना करता था, वो जो ख़ुदा था, उसकी गद्दी छिन गयी है। अब उसकी भी तुलना होगी हालाँकि वो अभी भी वहीँ रहेगा जैसे पिछले 129 सालों से रह रहा है। वैज्ञानिक उसके द्रव्यमान की जाँच नए मानक के हिसाब से समय समय पर करते रहेंगे।

मूलभूत इकाइयाँ सात होती हैं. इनमें से तीन को नियतांकों के आधार पर पहले ही परिभाषित किया जा चुका था। GCPM के 1967 में हुए 13वें सम्मलेन में सेकण्ड को, 1979 में हुए 16वें सम्मलेन में कैंडेला को और 1983 में हुए 17वें सम्मेलन में मीटर को पुनः परिभाषित किया गया था। और जो तीन नियतांक स्थाई किये गए थे वे हैं:

  1. सीजीयम 133 परमाणु मे दो हायपरफ़ाईन स्तरो के मध्य संक्रमण की आवृत्ती :9 192 631 770 Hz, (सेकण्ड के लिए)
  2. 540 × 1012 Hz आवृत्ति वाले मोनोक्रोमोटिक विकिरण की प्रकाशदीप्ती 683 lm/W, (कैंडेला के लिए)
  3. निर्वात मे प्रकाशगति c = 299 792 458 m/s, (मीटर के लिए)
SI ईकाईयों मे परिवर्तन

SI ईकाईयों मे परिवर्तन

किलोग्राम की परिभाषा मे प्रयुक्त विधि

किब्बल तुला से किलोग्राम का मापन

किब्बल तुला से किलोग्राम का मापन

किलोग्राम ईकाई के संबंध म नई परिभाषा गढ़ने के लिये प्लैन्क स्थिरांक का मापन आवश्यक था। यह स्थिरांक क्वांटम स्तर पर ऊर्जा के पैकेट का आकार सटिकता से परिभाषित करता है। एक विशिष्ट विधि किब्ब्ल संतुलन(Kibble balance) के द्वारा प्लैंक स्थिरांक की गणना ज्ञात द्रव्यमान को विद्युत चुंबकीय बल की तुलना मे मापा जाता है।

दूसरी विधि मे सिलिकान-28 के दो गोलो मे परमाणुओं की गणना कर अवागाड्रो संख्या ज्ञात की जाती है, इस संख्या से प्लैंक स्थिरांक की गणना की जाती है।

दोनो विधियों के प्रयोग से प्लैंक स्थिरांक की अचूक गणना 2015 मे ही संभव हो पाई थी।

क्युइन कहते है कि दोनो विधियो से गणना से प्राप्त स्थिराक मे अंतर 100 लाख मे कुछ भाग ही है, जोकि एक असाधारण सफलता है क्योंकि दोनो विधि भौतिकी की दो अलग शाखाओं से संबधित है।

इन स्थिरांको को सर्वसम्मत स्थाई संख्या पर निश्चित किया जायेगा। 1983 मे यह प्रक्रिया मीटर की परिभाषा के लिये प्रकाश गति को आधार बनाते हुये प्रयुक्त की गई थी जब प्रकाशगति की सबसे सटीक माप की गई गति को मीटर की परिभाषा के लिये स्थाई कर दिया गया था। अब ईकाई को परिभाषित करने के लिये वैज्ञानिक विधि को उलट देंगे अर्थात स्थिरांक ज्ञात करने की विधि को पलट देंगे। उदाहरण के लिये वे प्लैन्क स्थिरांक के स्थाई मूल्य को किब्बल संतुलन मे विद्युत चुंबकीय बल के साथ अज्ञात द्रव्यमान के मापन मे प्रयोग मे लायेंगे।

प्लैंक स्थिरांक का यह मूल्य SI प्रणाली मे स्थाई हो जायेगा साथ ही इस मूल्य को NIST मे भी स्थाई कर दिया जायेगा।

भौतिक वस्तुओ के साथ खो जाने या क्षतिग्रस्त हो जाने की समस्या होती है, स्थिरांक के प्रयोग से यह समस्या नही रहती है और द्रव्यमान की परिभाषा अधिक प्रभावी हो जाती है। ले ग्रांड के(Le Grand K) का माप परिभाषा के अनुसार हमेशा 1 किलोग्राम रहा है, लेकिन उसकी प्रतिकृतियों की तुलना मे उसके द्रव्यमान मे आंशिक परिवर्तन आया है। यह कहना मुश्किल है कि ले ग्रांड के(Le Grand K) ने परमाणु खोये है या प्राप्त किये है। लेकिन भविष्य के अध्यन इसे ज्ञात कर पायेंगे।

नया किलोग्राम

द्रव्यमान मापन की नई परिभाषा तय कर रहे वैज्ञानिक सीधे सीधे इसे लागु नही कर सकते है। विभिन्न प्रयोगो के परिणाम बताते है कि नई परिभाषा उत्तम है लेकिन यह भी तथ्य है कि यह परिपूर्ण नही है। जब तक विश्व मे द्रव्यमान मापन मे आने वाली सूक्ष्म अंतर दूर नही होजाते है BIPM एक मध्यस्थ की भूमिका निभायेगा। यह संस्थान हर समूह को एक ही वस्तु का मापन करने के लिये कहेगा और उनके औसत द्रव्यमान को प्रकाशित करेगा जिसका प्रयोग समस्त विश्व तुलना के लिये करेगा। इस प्रक्रिया मे सभी अशुद्धियों और समस्याओं को दूर करने मे कम से कम दस साल तो लग जायेंगे।

इस समय सभी देशो की राष्ट्रीय मापन प्रयोगशाला मे रखे गये मानक वजन बाट फ़ेंके नही जायेंगे। विश्व मे बहुत कम प्रयोगशालाओं के पास नई परिभाषा से एक मानक किलोग्राम बाट निर्माण की क्षमता है, जिससे इन पर निर्भरता अगले कुछ वर्षो तक बनी रहेगी।

NIST तथा युनाईटेड किंगडम और जर्मनी की राष्ट्रीय मानक प्रयोगशालायें सस्ती और टेबल पर रखे जा सकने वाले किब्बल संतुलन पर कार्य कर रही है जिससे कि विभिन्न उद्योग और छोटी कंपनी स्वयं मानक किलोग्राम बाट स्वयं बना सकेंगी।

एक सेकंड बस

सेकंड की नई परिभाषा पर वैज्ञानिक 2005 से काम कर रहे है। वर्तमान मे एक सेकंड सीजीयम-133 द्वारा अवशोषित और उत्सर्जित माइक्रोवेव प्रकाश की आवृत्ति के संदर्भ मे पारिभाषित है। इन परमाणुओ का स्थान आप्टिकल घड़ीयो (optical clock) ने ले लिया है और वे दूसरे परमाणुओ के प्रयोग से उच्च आवृत्ति वाली दृश्य प्रकाश तरंग का प्रयोग करते है। इन आप्टिकल घडीयों की अचूकता अत्याधिक है और इनमे ब्रह्मांड की संपूर्ण आयु मे केवल एक सेकंड की चूक हो सकती है।

वैज्ञानिको की योजना के अनुसार सेकंड की परिभाषा मे परिवर्तन 2026 मे किया जायेगा। क्योंकि उन्हे समस्त विश्व मे आप्टिकल घड़ीयो के प्रयोग के लिये सर्वोत्तम परमाणु को खोजने के साथ तुलना के लिये विधियाँ खोजनी होगी।

SI ईकाईयों का भविष्य

SI ईकाईयों का भविष्य

 

इसके अतिरिक्त SI प्रणाली मे विमाओ के मापन के लिये ईकाई के समावेश के लिये भी दबाव है। उदाहरण के लिये रेडीयन जोकि किसी वृत्त चाप(arc) और त्रिज्या का अनुपात है।

1857 मे स्थापित BIPM जोकि वर्तमान मे मानक किलोग्राम और मीटर को रखे हुये है, SI प्रणाली मे यह परिवर्तन कुछ खट्टा मीठा है। अब किसी को भी मानक किलोग्राम या मीटर के लिये पेरीस जाने की आवश्यकता नही है।



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