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Friday, 19 April 2019

विद्युत चुंबकीय (EM SPECTRUM) क्या है और वह खगोलभौतिकी (ASTROPHYSICS) मे महत्वपूर्ण उपकरण क्यों है ?

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

कितना अद्भुत है कि हम खूबसूरत तारों , ग्रहों, चंद्रमा और सूर्य से लाखों करोड़ो किलोमीटर दूर रहते हुये भी उनके विषय मे बहुत कुछ जानते और समझते है। यह लेख ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला का द्वितीय लेख है। इस लेख मे हम खगोलभौतिकी के अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण के बारे मे बुनियादी जानकारी देगें। इस उपकरण का नाम है विद्युतचुंबकीय वर्णक्रम(Electromagnetic spectrum)। अब हम जानने का प्रयास करते है कि विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम(Electromagnetic spectrum) क्या है और इसका खगोल भौतिकी मे क्या महत्व है?

विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम(The Electromagnetic (EM) spectrum)

बचपन से ही हमे विद्युत चुंबकीय वर्ण क्रम के सिद्धांत का परिचय दे दिया जाता है। इसे हमने सीधे इंद्रधनुष के रूप मे देखा होता है या इसे अपने प्राथमिक स्कूल मे पढ़ा होता है। लेकिन इंद्रधनुष विशाल विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम का एक नन्हा सा दृश्य हिस्सा है। अब हम विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम को संपूर्ण रूप से देखते है।

दृश्य प्रकाश के रंग और विद्युत चुंबकिय विकिरण

दृश्य प्रकाश के रंग और विद्युत चुंबकिय विकिरण

विद्युत चुंबकीय विकिरण (Electromagnetic Radiation)

विकिरण या रेडीएशन ऊर्जा का एक प्रकार है तरंग और कणो के रूप मे यात्रा करता है और अपनी इस यात्रा मे विस्तृत(फ़ैलते) होते जाता है। विद्युत चुंबकीय विकिरण को शून्य द्रव्यमान वाले कण फोटान की धारा के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है। हर फोटान एक विशिष्ट मात्रा मे ऊर्जा रखता है और वह एक तरंग के रूप मे प्रकाशगति से यात्रा करता है।

सूर्य, तारो या घर मे लगी ट्युबलाईट/बल्ब से हमारे घर तक आने वाला प्रकाश दृश्य विद्युत चुंबकीय विकिरण का उदाहरण है। किसी रेडीयो स्टेशन से निकलने वाली रेडीयो तरंगे जो संचार का एक सशक्त माध्यम है विद्युत चुंबकीय विकिरण है। खाना बनाने या उसे गरम करने मे प्रयुक्त माइक्रोवेव तरंग भी विद्युत चुंबकीय विकिरण है। पराबैंगनी तरंग(Ultraviolet waves) जिनसे त्वचा कैंसर हो सकता है भी विद्युत चुंबकीय विकिरण है। हमारे रोजमर्रा के जीवन मे विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के कई भाग जैसे अवरक्त किरणे(infrared), एक्सरे, गामा किरण का प्रयोग होता है। जब हम ठंड लगती है और हम सूर्य से उष्णता प्राप्त करने का प्रयास करते है तब है सौर विद्युतचुंबकीय वर्णक्रम के अवरक्त भाग से उष्णता प्राप्त कर रहे होते है। जब हमारी हड्डीयों मे कोई चोट लगती है तो उसकी जांच और स्थिति की जानकारी के लिये हम एक्सरे का प्रयोग करते है।

विद्युत चुंबकीय विकिरण (आकार और तापमान की तुलना)

विद्युत चुंबकीय विकिरण (आकार और तापमान की तुलना)

हम विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के विभिन्न भागो का वर्गीकरण कैसे करते है ?

विभिन्न प्रकार के विकिरण की परिभाषा उनके वाहक फोटान की ऊर्जा के के अनुसार दी जाती है। रेडीयो तरंग के फोटान की ऊर्जा कम होती है, माइक्रोवेव के फोटानो की ऊर्जा रेडीयो तरंग के फोटानो से अधिक होती है, अवरक्त तरंगो के फोटान की और अधिक। इस ऊर्जा के बढ़ते अनुक्रम मे दृश्य प्रकास, पराबैंगनी, एक्स रे और सबसे शक्तिशाली गामा किरणे आती है।

विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम का खगोलभौतिकी मे महत्व

भिन्न तरंगदैधर्य वाले क्षेत्रो के विकिरण खगोलभौतिकी के पिंडो मे होने वाली भिन्न भिन्न भौतिकीय प्रतिक्रियाओं का परिणाम होते है। हम ब्रह्मांड के दूरी वाले क्षेत्रो का अध्ययन इन विद्युत चुंबकीय विकिरणो की जांच और विश्लेषण से कर सकते हैं।

किसी तारे द्वारा उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के एक बड़े भाग मे कई क्षेत्रो मे फ़ैला होता है। इस क्षेत्रो के विश्लेषण और अध्ययन से हम उस तारे की संरचना, आकार और अन्य गुणधर्मो को जान सकते है।

कुछ सरल तत्वो का वर्णक्रम

खगोलभौतिकी वैज्ञानिक स्पेक्ट्रोस्कोपी(spectroscopy) उपकरण के प्रयोग से तारे और ग्रह की रासायनिक संरचना का पता लगाते है, इस अध्ययन मे उस तारे द्वारा उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण के तरंगदैधर्य को देखा जाता है। हमने पिछले लेख मे देखा है कि वोल्लास्टन और फ़्राउनहोफ़र द्वारा सौर वर्णक्रम मे पाई जाने वाली गहरी रेखाओं ने खगोलभौतिकी को जन्म दिया था।

हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला

हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला

हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला तथा वायेजर अंतरिक्ष अण्वेषण यान अंतरिक्ष मे शोध करते है और इन उपकरणो द्वारा दूरस्थ खगोलिय पिंडो के अध्ययन मे पृथ्वी द्वारा उत्पन्न विद्युत चुंबकीय विकिरण आड़े नही आता है। इन उपकरण हमारी आकाशगंगा और ब्रह्माण्ड के दूरस्थ भागो से आते विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के अध्ययन मे अत्याधिक संवेदी और सटीक निरीक्षण परिणाम प्राप्त होता है।

किसी खगोलवैज्ञानिक के हाथो मे ब्रह्मांड के रहस्यो को अनावृत्त करने के लिये विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है। वर्णक्रम के अध्ययन से अत्याधिक मात्रा मे सूचना प्राप्त होती है। उदाहरण के लिये खगोलीय वर्णक्रम से हम उसकी रासायनिक संरचना, तापमान, द्रव्यमान , आकार, दूरी और घनत्व को जान सकते है। इसके साथ ही हम उस तारे की हमसे सापेक्ष गति की भी गणना कर सकते है। रेडीयो खगोलशास्त्र(Radio Astronomy) इस विषय की एक मुख्य शाखा और लोकप्रिय शाखा है। रेडीयो वर्णक्रम(Radio Spectrum) के अध्ययन से वैज्ञानिक अत्यधिक दूरी पर स्थित पिंडों जैसे ब्लैक होल, क्वासर और आकाशगंगाओ का अध्ययन करते है।

लेखिका का संदेश

मै प्लाज्मा भौतिक शास्त्री हुं और मै अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा की विभिन्न तरंगो जैसे अल्फ़वेन(alfven) तरंग का अध्ययन करती हुं। अल्फ़वेन तरंग को सौर कोरोना के अनियमित रूप से उष्ण होने के लिये उत्तरदायी माना जाता है। उपग्रहों और अंतरिक्ष यान द्वारा प्लाज्मा तरंगे का निरीक्षण होता रहता है जोकि अंतरिक्ष और खगोल भौतिकीय पिंडो द्वारा मूलभूत प्लाज्मा गतिविधियों के अध्ययन के लिये अत्यधिक रूचिकर है। आशा है कि इस लेख से आपको खगोल भौतिकी मे प्रयुक्त होने वाले इस सरल से लेकिन अत्यधिक महत्वपूर्ण उपकरण को समझने मे मदद मिली होगी।

इस शृंखला मे इससे पहले : खगोल भौतिकी(ASTROPHYSICS) क्या है और वह खगोलशास्त्र(ASTRONOMY) तथा ब्रह्माण्डविज्ञान(COSMOLOGY) से कैसे भिन्न है?

मूल लेख : WHAT IS EM SPECTRUM & WHY IT’S THE MOST IMPORTANT TOOL IN ASTROPHYSICS?

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)
संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



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Tuesday, 16 April 2019

खगोल भौतिकी(ASTROPHYSICS) क्या है और वह खगोलशास्त्र(ASTRONOMY) तथा ब्रह्माण्डविज्ञान(COSMOLOGY) से कैसे भिन्न है?

लेखक : ऋषभ

यह लेख ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)” शृंखला के 30 लेखो मे से पहला है, इस शृंखला मे खगोलभौतिकी संबधित विविध विषय जैसे विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम से लेकर आकाशगंगा, सूर्य से लेकर न्युट्रान तारे तथा ब्लैकहोल और क्वासार से लेकर नेबुला और कास्मिक बैकग्राउंड विकिरण(CMB) का समावेश होगा। इन सब ब्रह्मांडीय संरचनाओं की चर्चा से पहले हम जानने का प्रयास का करते है कि खगोल भौतिकी क्या है और वह खगोलशास्त्र(Astronomy) तथा ब्रह्मांड विज्ञान(Cosmology) से किस तरह भिन्न है?

खगोलभौतिकी की परिभाषा

खगोलभौतिकी (Astrophysics) खगोल विज्ञान का वह अंग है जिसके अंतर्गत भौतिकी और रसायनशास्त्रो के नियमों के द्वारा खगोलीय पिंडो की रचना तथा उनके भौतिक लक्षणों का अध्ययन किया जाता है जिसमे उनकी स्थिति तथा अंतरिक्ष मे गति का समावेश नही है।

खगोलभौतिकी मे तारों का अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है।

खगोलभौतिकी मे तारों का अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है।

खगोलभौतिकी मे तारों के अध्ययन का विशेष महत्व है। खगोलभौतिकी वैज्ञानिक भौतिकी ने नियमों का प्रयोग कर सूर्य, तारे और उनके विकास, आकाशगंगा, अंतरतारकीय(intersteller) माध्यम तथा कास्मिक बैकग्राउंड विकिरण का अध्ययन करते है। ब्रह्मांड के इस अध्ययन मे रहस्यों को खोलने का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम है। इसलिये खगोलभौतिकी वैज्ञानिक इन सभी खगोलिय पिंडों के वर्णक्रम का अध्ययन कर उनमे चल रही विभिन्न गतिविधियों को समझते है। श्याम ऊर्जा(Dark Energy),श्याम पदार्थ(Dark Matter), समय यात्रा(Time Travel), वर्महोल तथा श्याम वीवर (Black Hole) जैसे विषय खगोलभौतिकी के अंतर्गत आते है।

खगोलभौतिकी की समय रेखा

अब हम खगोलभौतिकी के विकास यात्रा मे आये पांच मुख्य पड़ाव की चर्चा करेंगे। इन पांच घटनाओं ने खगोलभौतिकी को एक विज्ञान की अन्य शाखाओं मध्य अपनी अलग पहचान बनाने मे सहयोग दिया है।

1. वोलास्टन (1802 मे) और फ़्राउनहोफ़र(1814 मे) द्वारा सौर वर्णक्रम मे गहरी रेखाओं का निरीक्षण(Dark Lines In Solar Spectrum by Wollaston And Fraunhofer)

खगोलभौतिकी का आरंभ सूर्य के वर्णक्रम मे सर विलियम वोल्लास्टन और जोसेफ़ फ़्राउनहोफ़र द्वारा गहरी रेखाओं के अध्ययन से आरंभ हुआ था, इन रेखाओं को अब फ़्राउनहोफ़र रेखा (Fraunhofer Lines) कहा जाता है।

फ़्राउनहोफ़र रेखा (Fraunhofer Lines)

फ़्राउनहोफ़र रेखा (Fraunhofer Lines)

जब सूर्यप्रकाश किसी प्रिज्म से गुजरता है तो वह इंद्रधनुष के रंगो मे विभाजित हो जाता है। इन रंगो को सूर्य का वर्णक्रम कहा जाता है। लेकिन जब इस वर्णक्रम को गहराई से देखा जाये तो इसमे बहुत सी गहरी रेखायें होती है। यह अवशोषण रेखाये सूर्य मे बहुत सी अशुद्धीयों जैसे कैल्सीयम, सोडेयम, मैग्निशियम , लोहा इत्यादि की उपस्तिथि से उत्पन्न होती है। सूर्य मे सबसे अधिक मात्रा मे हायड्रोजन उपस्थित है लेकिन उसमे अत्यल्प मात्रा मे अशुद्धियो की उपस्थिति विशिष्ट तरंगदैधर्य के प्रकाश को अवशोषित कर लेती है जिससे ये गहरी रेखायें बनती है। इस विषय पर हम आने वाले ले्खों मे चर्चा करेंगे।

2. पिकरींग एट अल द्वारा 1885 मे तारों का 7 वर्गो मे वर्गीकरण( Classification of Stars Into 7 Types by Pickering et al)

हावर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification Scheme)

हावर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification Scheme)

पिकरींग और उनकी टीम मे एन्नी कैनन जंप(Annie Cannon Jump) और एंटोनिया मौरी(Antonia Maury) जैसे महिला वैज्ञानिको का समावेश था। इस टीम मे वर्णक्रम के आधार पर 400,000 तारों को सात वर्गो मे विभाजित किया।इस वर्गीकरण प्रणाली को हावर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification Scheme) कहते है, इस प्रणाली ने खगोलभौतिकी को एक दिशा दी और इस प्रणाली का प्रयोग आज भी होता है। इस वर्गीकरण ने स्पेक्ट्रोग्राफ़ी(वर्णक्रम के अध्ययन) का महत्व को खगोलभौतिकी मे रेखांकित किया।

3. एडींगटन का शोधपत्र: तारों की आंतरिक संरचना -1920( Eddington’s Paper: The Internal Constitution Of Stars)

1920 के आसपास किसी भी खगोलीय पिंड की ऊर्जा का स्रोत एक रहस्य ही था। आर्थर एडींगटन ने आईंस्टाईन के द्रव्यमान-ऊर्जा के प्रसिद्ध समीकरण की सहायता से सिद्ध किया कि तारों मे ऊर्जा का उत्पादन उनके केंद्र मे हायड्रोजन के संलयन से हिलियम निर्माण से होता है। उन्होने इस निष्कर्ष को तारों की आंतरिक संरचना शीर्षक वाले शोधपत्र मे प्रकाशित किया था।

4. सेसीलिआ पेन का डाक्टरल शोधपत्र -1925( Doctoral Thesis of Cecilia Payne)

सेसीलिआ पेन के सहकर्मीयों के अनुसार यह सबसे विलक्षण डाक्टरल शोधपत्र था जिसमे यह बताया गया था कि तारों के मुख्य घटक हायड्रोजन(H) और हिलियम(He) है।

5. गुरुत्वाकर्षण तरंगो की खोज – 2016 (Detection of Gravitational Waves)

दो श्याम वीवरों द्वारा एक दूसरे की परिक्रमा से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगे

दो श्याम वीवरों द्वारा एक दूसरे की परिक्रमा से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगे

गुरुत्वाकर्षण तरंगो की खोज से खगोलभौतिकी के क्षेत्र मे एक नया युग आया, यह खगोल भौतिकी मे एक मील का पत्थर है। गुरुत्वाकर्षण तरंगे किसी दो अत्यधिक संपिडीत पिंड जैसे ब्लैक होल के टकराने और विलय से उत्पन्न होती है। इनका निरीक्षण और जांच अत्यधिक दुरुह कार्य है।

खगोलभौतिकी किस तरह खगोलशास्त्र(ASTRONOMY) तथा ब्रह्माण्डविज्ञान(COSMOLOGY) से भिन्न है?

अब हम जानते है कि खगोलभौतिकी क्या है, अब देखते है कि वह खगोलशास्त्र(ASTRONOMY) तथा ब्रह्माण्डविज्ञान(COSMOLOGY) से कैसे भिन्न है?

खगोलविज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमे आकाशीय पिंडो की गति तथा स्तिथि का अध्ययन किया जाता है। खगोल शास्त्र, एक ऐसा शास्त्र है जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उसके वायुमण्डल के बाहर  अर्थात अंतरिक्शःअ होने वाली घटनाओं का अवलोकन, विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या (explanation) की जाती है। यह वह अनुशासन है जो आकाश में अवलोकित की जा सकने वाली तथा उनका समावेश करने वाली क्रियाओं के आरंभ, बदलाव और भौतिक तथा रासायनिक गुणों का अध्ययन करता है। इसमे ग्रहों की स्तिथियों की गणना, ग्रहण के समय की गणना, उल्कापात के पूर्वानुमान का समावेश होता है। खगोलशास्त्र मुख्य रूप मे खगोलीय गतिकी और ओप्टिक्स के प्रयोग से खगोलीय पिंडो की स्तिथि और संरचना का अध्ययन करता है।

ब्रह्माण्ड विज्ञान या कॉस्मोलॉजी खगोल विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें ब्रह्माण्ड से जुड़ी तमाम बातों का अध्ययन किया जाता है। इसमें ब्रह्माण्ड के बनने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी जाती है। ब्रह्माण्ड विज्ञान(Cosmology) मुख्य रूप से ब्रह्माण्ड के जन्म , विकास और अंत का अध्ययन करता है।

ब्रह्माण्ड विज्ञान मे ब्रह्मांड का बड़े पैमाने पर अध्ययन होता है, इसमे ब्रह्मांड का सम्पूर्ण रूप से अध्ययन होता है जबकि खगोलशास्त्र मे किसी विशिष्ट खगोलिय पिंड का अध्ययन होता है।

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe (https://secretsofuniverse.in/) के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.

मूल लेख : https://secretsofuniverse.in/2019/04/15/what-is-astrophysics-and-hows-it-different-from-astronomy-cosmology/



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Wednesday, 10 April 2019

ऐतिहासिक उपलब्धि : ब्लैक होल (श्याम विवर) का प्रथम चित्र

ब्लैक होल की प्रथम तस्वीर

ब्लैक होल की प्रथम तस्वीर

1979 मे खगोल भौतिक वैज्ञानिक जीन-पियरे ल्यूमिनेट(Jean-Pierre Luminet) के पास सुपरकंप्युटर नही था लेकिन उन्होने विश्व को दिखाया था कि कोई ब्लैक होल किस तरह दिखाई देगा। उनके पास IBM का कंप्युटर IBM 7040 और कुछ पंच्ड कार्ड्स( punch cards) थे जिनसे वे कंप्यूटर को निर्देश और आंकड़े देते थे। वे सैद्धांतिक रूप से जानते थे कि ब्लैक होल प्रकाश का उत्सर्जन नही करते है। लेकिन ब्लैक होल के आसपास अत्याधिक उष्ण गैस और धुल का विशालकाय बवंडर अत्याधिक चमकदार प्रकाश उत्सर्जित करता है। ल्यूमिनेट ने सोचा कि इस पदार्थ से उत्सर्जित प्रकाश ब्लैक होल के आकार की जानकारी दे सकता है और इस प्रकाश से काल-अंतराल(space-time) मे गुरुत्वाकर्षण द्वारा उत्पन्न की गई वक्रता को भी देखा जा सकता है।

1979 मे खगोल भौतिक वैज्ञानिक जीन-पियरे ल्यूमिनेट(Jean-Pierre Luminet) के द्वारा बनाया गया ब्लैक होल का चित्र

1979 मे खगोल भौतिक वैज्ञानिक जीन-पियरे ल्यूमिनेट(Jean-Pierre Luminet) के द्वारा बनाया गया ब्लैक होल का चित्र

किसी रेफ़्रिजरेटर के आकार के IBM 7040 कंप्यूटर से संसाधित आंकड़ो के आधार पर ल्यूमिनेट ने पेन और कागज की सहायता से अपने हाथो से ब्लैक होल का सर्वप्रथम चित्र बनाया था। इस चित्र मे उन्होने ब्लैक होल का घटना क्षितिज(event horizon) दिखाया था जिसके पार जाने पर ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण से कुछ नही बच सकता है। इसी के साथ उन्होने अक्रिशन डिस्क भी दिखाई थी जो कि ब्लैक होल द्वारा निगले गये तारों के मलबे से बना धुल और गैस का एक विशाल बवंडर होता है। ब्लैक होल के पास एक ही अक्रिशन डिस्क होती है लेकिन गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से इसका स्वरूप विकृत दिखाई देता है। किसी विकृत दर्पण मे बनी छवि के जैसे इस अक्रिशन डिस्क की छवि दो लंबवत डिस्क के जैसे दिखाई देती है। ये दोनो ब्लैक होल के समीप अधिक चमकदार दिखाई देती है।

इस चित्र के बनाये जाने के 4 दशक के पश्चात भी ल्यूमिनेट का पूर्वानुमान अब भी सही माना जाता है। लेकिन उनके द्वारा बनाया गया चित्र और ब्लैक होल के सभी चित्र पेंटींग मात्र है, वास्तविक फोटोग्राफ़ नही है। अब यह बदलने जा रहा है। वैज्ञानिक एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे है जिसे इवेंट होरीजान टेलिस्कोप(Event Horizon Telescope) नाम दिया गया है। 10 अप्रैल 2019 को वे सेजीटेरीयस A( Sagittarius A , उच्चारण ए स्टार) ब्लैक होल का वास्तविक चित्र जारी किया गया है, यह महाकाय ब्लैक होल हमारी आकाशगंगा के केंद्र मे है। वैज्ञानिको के पास M87 आकाशगंगा मे स्थित एक अन्य ब्लैक होल के भी आंकड़े है। इस चित्र से ब्रह्माण्ड के सबसे रहस्यमय पिंड के रहस्य का आवरण हटाने मे मदद मिलेगी। साथ ही आकाशगंगाओ की निर्माण प्रक्रिया, विकास और आकार के बारे मे भी जानकारी मिलेगी।

इवेंट होरीजान टेलिस्कोप एक अकेली दूरबीन नही है, यह आठ रेडीयो दूरबीनो का नेटवर्क है जोकि हवाई, अरिजोना, स्पेन, मेक्सीको, चीली और अंटार्कटीका मे स्तिथ है।

इवेंट होरीजान टेलिस्कोप एक अकेली दूरबीन नही है, यह आठ रेडीयो दूरबीनो का नेटवर्क है जोकि हवाई, अरिजोना, स्पेन, मेक्सीको, चीली और अंटार्कटीका मे स्तिथ है।

इवेंट होरीजान टेलिस्कोप एक अकेली दूरबीन नही है, यह आठ रेडीयो दूरबीनो का नेटवर्क है जोकि हवाई, अरिजोना, स्पेन, मेक्सीको, चीली और अंटार्कटीका मे स्तिथ है। खगोल वैज्ञानिक इन आठ दूरबीनो का प्रयोग एक समय मे एक ही पिंड के निरीक्षण के लिये करते है। उसके पश्चात वे इन सभी दूरबीनो से प्राप्त आंकड़ो को मिलाकर एक चित्र बनाते है। इन आठ दूरबीनो से इस तरह से एक साथ मे कार्य करने की प्रक्रिया को आप पृथ्वी के आकार की एक दूरबीन के तुल्य मान सकते है।

इस तकनीक को “वेरी लांग बेसलाईन इंटरफ़ेरोमेट्री (very long baseline interferometry, VLBI)” कहते है। इस तकनीक की सफ़लता के लिये आवश्यक है सभी दूरबीनो मे समय मापन के लिये समान और सटीक समय दर्शाने वाली घड़ीयों की उपस्थिति। उन्होने इस कार्य के लिये परमाणु घड़ीयों का प्रयोग किया है।

सब सभी दूरबीने सेजीटेरीयस A* का निरीक्षण करती है तब उनके निरीक्षण के आंकड़ो के साथ परमाणु घड़ी का समय जोड़ देते है। अब जब वैज्ञानिक सभी दूरबीनो के आंकड़ो का मिलान करते है तब वे उन आंकड़ो को परमाणु घड़ी के समय के अनुसार मिलाते है, उदाहरण के लिये किसी एक दूरबीन के 5:13 p.m. GMT के आंकड़ो को अन्य दूरबीनो के 5:13 p.m. GMT के आंकड़ो के साथ ही मिलाया जायेगा।

आठ दूरबीन के आंकड़ो को एक ही स्थान पर मिलाया जाता है। सामान्यत: वैज्ञानिक इन आंकड़ो को इंटरनेट से एक दूसरे से साझा करते है लेकिन चित्र के लिये आंकड़ो के मिलान के लिये सारे आंकड़ो की आवश्यकता होती है और इन आंकड़ो की मात्रा पेटाबाईट मे होती है जोकि इंटरनेट से भेजा नही जा सकता है। इस समस्या को पार पाने के लिये आंकड़ो की हार्ड डिस्क को विमान से भेजा जाता है। वैज्ञानिको ने आंकड़ो को इस तरह भेजे जाने को स्निकरनेट(sneakernet) नाम दिया है।

अप्रैल 2017 मे वैज्ञानिको ने इस प्रयोग मे सबसे पहला निरीक्षण चीली की अटाकामा लार्ज मिलीमिटर-सबमिलीमिटर दूरबीन(ALMA) से किया था। यह उपकरण इतना शक्तिशाली है कि उससे EHT द्वार काल-अंतराल मे एक नन्हे से छिद्र के द्वारा देखा जा सकता है। लेकिन इसकी तैयारीयाँ इतनी आसान नही थी। वैज्ञानिको को इसके लिये ALMA की 66 डीश से प्राप्त आंकड़ो को जमा करना पड़ा था। उसके बाद उन आंकड़ो को अन्य आठ दूरबीनो के आंकड़ो से जोड़ा गया।

इसके बाद भी ALMA के द्वारा सभी आंकड़ो के विश्लेषण के लिये एक साल से से अधिक समय के लेने के बाद भी चित्र नही बन पाया। इसके लिये उन्हे अंटार्कटीका और उस पर स्थित दक्षिणी ध्रुव दूरबीन से आंकड़ो वाली हार्ड डिस्क के विमान से आने के लिये अगले वसंत तक इंतजार करना पड़ा। क्योंकि वर्ष मे केवल वसंत और गर्मीयों मे ही दक्षिणी ध्रुव से विमान उड़ान भर सकते है। यह आंकड़े MIT की हेस्टेक वेधशाला(Haystack Observatory) मे दिसंबर 2017 मे पहुंच पाये थे।

फ्रांस के ग्रीनोबल शहर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मिलीमेट्रिक रेडियो एस्ट्रोनॉमी के खगोलविद माइकल ब्रिमर ने कहा,

‘हमने कोई विशाल टेलीस्कोप इसलिए नहीं बनाया क्योंकि वह अपने वजन के चलते ही टूट सकता है। हमने कई सारे रेडियो टेलीस्कोप से ली गई तस्वीरों को इस तरह जोड़ा है जैसे वह किसी बड़े से शीशे का टुकड़ा हो।’

ब्लैक होल के एक चित्र के लिये इतनी सारी कवायद की क्या आवश्यकता है ? वैज्ञानिको के अनुसार

“यही तो विज्ञान की विचित्रता है। ब्लैक होल ब्रह्माण्ड के सबसे अधिक रहस्यमय पिंड है। इनसे अधिक रहस्यमय केवल जीवन ही है।”

और जीवन, कमसे कम वह जीवन जिसे हम जानते है, वह नही जानता कि ब्लैक होल कैसे दिखता है, उनके अंदर क्या होता है, ब्लैक होल की आकाशगंगा और उनके विकास मे क्या भूमिका है , ब्लैकहोल के जन्म और उसके विकास मे हमारे जीवन की उत्पत्ति मे क्या भूमिका निभाई है ? जीवन के लिये यह जानना महत्वपूर्ण है।

EHT के निदेशक शेप डोलमेन ( Shep Doeleman) के अनुसार

” ऐसे बहुत कम विषय है जहाँ हम कह सकते है कि हम नही जानते है ब्रह्मांड के इस बिंदु पर क्या हो रहा है ? इनमे से एक है चेतना और दूसरा है ब्लैक होल!” (“There are very few topics where we say we just really have no idea what happens at that point in the universe,” says Doeleman. “One of those may be consciousness. And another one is the black hole.”)

आखिर ब्लैकहोल क्या है ?

श्याम विवर (Black Hole) एक अत्याधिक घनत्व वाला पिंड है जिसके गुरुत्वाकर्षण से प्रकाश किरणो का भी बच पाना असंभव है। श्याम विवर मे अत्याधिक कम क्षेत्र मे इतना ज्यादा द्रव्यमान होता है कि उससे उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण किसी भी अन्य बल से शक्तिशाली हो जाता है और उसके प्रभाव से प्रकाश भी नही बच पाता है।

श्याम विवर की उपस्थिति का प्रस्ताव 18 वी शताब्दी मे उस समय ज्ञात गुरुत्वाकर्षण के नियमो के आधार पर किया गया था। इसके अनुसार किसी पिंड का जितना ज्यादा द्रव्यमान होगा या उसका आकार जितना छोटा होगा, उस पिंड की सतह पर उतना ही ज्यादा गुरुत्वाकर्षण बल महसूस होगा। जान मीशेल तथा पीयरे सायमन लाप्लास दोनो ने स्वतंत्र रूप से कहा था कि अत्याधिक द्रव्यमान या अत्याधिक लघु पिंड के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से किसी का भी बचना असंभव है, प्रकाश भी इससे बच नही पायेगा।

इन पिंडो को ’श्याम विवर(Black Hole)’ नाम जान व्हीलर ने 1967 मे दिया था। भौतिक विज्ञानीयों तथा गणितज्ञों ने यह पाया है कि श्याम विवर के पास काल और अंतराल(Space and Time) के विचित्र गुणधर्म होते हैं। इन विचित्र गुणधर्मो की वजह से श्याम विवर विज्ञान फतांसी लेखको का पसंदीदा रहा है। लेकिन श्याम विवर फतांसी नही है। श्याम विवर का आस्तित्व है और जब भी एक महाकाय तारे की मृत्यु होती है एक श्याम विवर का जन्म होता है। यह महाकाय तारे अपनी मृत्यु के पश्चात श्याम विवर बन जाते है। हम श्याम विवर को नही देख सकते है लेकिन उसमे गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप उसमे गिरते द्रव्यमान को देख सकते है। इस विधि से खगोल वैज्ञानिको ने अब तक ब्रह्माण्ड का निरीक्षण कर सैकड़ो श्याम विवरो की खोज की है। अब हम जानते है कि हमारा ब्रह्माण्ड श्याम विवरो से भरा पड़ा है और उन्होने ब्रह्माण्ड को आकार देने मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

सिंगुलरैटी : ब्लैक होल का केंद्र जिस स्थान पर पदार्थ संपिड़ित होकर अत्याधिक(अनंत) घनत्व मे होता है।

रिलेटीविस्टीक जेट : जब कोई ब्लैक होल किसी तारे को निगल लेता है जब परमाण्विक कणो और विकिरण की एक तेज धारा(jet)प्रकाशगति की गति के समीप वाली गति(लेकिन कम) से निकलती है।

फोटान गोला (Photon Sphere) : ब्लैक होल के निकट के उष्ण प्लाज्मा से उत्सर्जित फोटान जो गुरुत्वाकर्षण से मुड़कर एक चमकीला वलय बनाते है।

घटना क्षितिज(Event Horizon) :सिंगुलरैटी के पास की वह सीमा जिसे पार करने के बाद पदार्थ और ऊर्जा ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण से बच नही सकते। वह बिंदु जिससे वापसी संभव नही।

अक्रिशन डिस्क(Accretion Disc) : ब्लैक होल के पास अत्याधिक उष्ण गैस और धुल की तश्तरी जो अत्याधिक गति से घूर्णन करती है और विद्युत चुंबकीय विकिरण(X रे) उत्पन्न करती है।

ब्लैक होल(श्याम विवर)

ब्लैक होल(श्याम विवर)

ब्लैक होल के बारे मे विस्तार से :

https://vigyanvishwa.in/2011/06/27/black-hole/
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Monday, 1 April 2019

पृथ्वी के उपग्रह और उनकी कक्षायें(Earth Satellite Orbits)

पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

जब भी अंतरिक्ष और उपग्रहो की चर्चा होती है तब बहुत सी कक्षाओं की भी चर्चा होती है जैसे भूस्थानिक कक्षा, ध्रुविय कक्षा। क्या होती है ये कक्षायें ? इनकी आवश्यकता क्या है ?

जब आप किसी थियेटर मे को ड्रामा देखने जाते है तो अलग अलग सीट से आपको एक ही मंचन के अलग अलग पहलू दिखायी देते है, उसी तरह से पृथ्वी की विभिन्न कक्षायें उपग्रह को पृथ्वी को अलग अलग परिप्रेक्ष्य से निरीक्षण का अवसर देते है। हर कक्षा का अलग अलग कारण से अपना महत्व होता है। कुछ कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के किसी एक बिंदु पर टिका हुआ दिखाई देता है, कुछ अन्य कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के कई स्थानो के उपर से सतत यात्रा करता रहता है।

मूल रूप से पृथ्वी पर उपग्रहों की तीन कक्षायें है, उच्च पृथ्वी कक्षा, मध्यम पृथ्वी कक्षा तथा निम्न पृथ्वी कक्षा। अधिकतर मौसम उपग्रह और कुछ संचार उपग्रह उच्च पृथ्वी कक्षा मे रहते है, अर्थात पृथ्वी की सतह से अधिक दूरी पर। मध्य पृथ्वी कक्षा मे रहने वाले उपग्रह नेविगेशन तथा जासूसी उपग्रह होते है जो किसी एक विशेष क्षेत्र पर नजर रखने के लिये बनाये गये होते है। वैज्ञानिक उपग्रह पृथ्वी की निम्न कक्षा मे होते है जिसमे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, नासा के पृथ्वी के निरीक्षण उपग्रहों के बेड़े का समावेश है।

 

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

किसी भी कक्षा की उंचाई या पृथ्वी की सतह से उपग्रह की दूरी से उपग्रह की गति निर्धारित होती है। पृथ्वी की परिक्रमा करते उपग्रह की गति का नियंत्रण मुख्य रूप से पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल करता है। जब उपग्रह पृथ्वी के समीप होता है, गुरुत्वाकर्षण बल का खिंचाव अधिक होता है और जिससे उपग्रह की गति अधिक होती है। नासा का एक्वा उपग्रह पृथ्वी की सतह से 705 किमी उंचाई पर है और वह पृथ्वी की एक परिक्रमा 99मिनट मे कर लेता है, जबकी एक मौसमी उपग्रह 36,000 किमी की उंचाई से पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकंड लेता है। पृथ्वी के केंद्र से 384,403 किमी की दूरी पर से चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 28 दिन लगते है।

किसी भी उपग्रह की उंचाई मे परिवर्तन करने पर उसकी कक्षीय गति मे भी परिवर्तन होता है। इससे एक विचित्र विरोधाभाष का भी निर्माण होता हओ। मान लिजिये कि किसी उपग्रह के संचालक को उपग्रह की कक्षीय गति बढ़ानी है, वह उपग्रह के प्रणोदक को जलाकर उपग्रह की गति नही बढ़ा सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो उपग्रह की उंचाई बढ़ जायेगी और उससे उपग्रह की कक्षीय गति कम हो जायेगी। उपग्रह की गति बढ़ाने के लिये उपग्रह के प्रणोदक राकेट को उपग्रह की गति की उल्टी दिशा मे चलाना होगा, इसे हम पृथ्वी के सतह पर ब्रेक लगाना कह सकते है। इससे उपग्रह अपनी कक्षा मे पृथ्वी के निकट आयेगा और उसकी गति बढ़ जायेगी।

 किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।


किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।

उंचाई के अतिरिक्त विकेन्द्रता(eccentricity) और कक्षीय झुकाव(inclination) भी उपग्रह की कक्षा को आकार देते है। विकेन्द्रता से कक्षा का आकार निर्धारित होता है। कम विकेन्द्रता वाला उपग्रह वृत्त के जैसी कक्षा रखता है। अधिक विकेन्द्रता वाला उपग्रह दिर्घवृत्त के जैसी कक्षा मे पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इस कक्षा मे पृथ्वी से उपग्रह की दूरी निरंतर परिवर्तित होते रहती है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा और पृथ्वी के विषुवत के मध्य के कोण को कहते है। विषुवत के ठीक उपर गति करने वाले उपग्रह का कक्षीय झुकाव शून्य होता है। यदि कोई उपग्रह पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की कक्षा मे गति करता है तो उसका कक्षीय झुकाव 90 डीग्री होगा।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

उपग्रह की उंचाई, विक्रेंद्रता और झुकाव किसी उपग्रह के पथ और पृथ्वी के दृश्य भाग को परिभाषित करते है।

उपग्रह कक्षा के तीन वर्ग

उच्च पृथ्वी कक्षा (High Earth Orbit)

जब उपग्रह पृथ्वी के केंद्र से 42,164 किमी (सतह से 36,000 किमी) की उंचाई पर पहुंचता है तो वह एक ऐसे बिंदु पर होता है जिसमे उसकी कक्षीय गति और पृथ्वी की घूर्णन(rotation) गति एक समान होती है। अब उपग्रह की गति और पृथ्वी की घूर्णन गति समान होने से, उपग्रह पृथ्वी के उपर एक ही देशांतर रेखा(longitude) पर स्थिर प्रतित होता है। यह संभव है कि उपग्रह की स्तिथि मे उत्तर दक्षिण दिशा मे विचलन हो। इस विशेष कक्षा को भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा कहते है।

वृत्ताकार भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा यदि विषुवत के उपर हो अर्थात उसकी विकेंद्रता शून्य तथा कक्षीय झुकाव शून्य हो तो उसे भूस्थानिक(geostationary) कक्षा कहते है क्योंकि इस कक्षा मे वह पृथ्वी के किसी बिंदु के सापेक्ष स्थिर रहेगा। वह हमेशा पृथ्वी के सतह के एक बिंदु के उपर ही रहेगा।

भूस्थानिक(geostationary) कक्षा मौसम उपग्रहों के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इस कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के एक भाग पर लगातार निरीक्षण कर सकता है। जब भी आप मौसम की जानकारी देनेवाली किसी वेबसाइट पर अपने शहर के मौसम की जानकारी देनेवाली पृथ्वी का चित्र देखते है तब वह चित्र भूस्थानिक कक्षा के किसी उपग्रह द्वारा लिया गया चित्र होता है। हर कुछ मिनट मे भारत के INSAT शृंखला के उपग्रह के जैसे मौसम उपग्रह बादलो, जल बाष्प, वायु दिशा जैसी जानकारी पृथ्वी के मौसम केंद्र तक भेजती है, इस जानकारी के विश्लेषण के द्वारा मौसम का अनुमान लगाया जाता है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्थानिक उपग्रह हमेशा एक ही स्थान के उपर रहते है जिससे वे संचार माध्यम(फोन, टीवी और रेडीयो) के लिये प्रयोग किये जाते है। नासा द्वारा बनाये गये और अमरीकी नेशनल ओशेनिक एन्ड एटमासफ़ियिरीक एडमिनिस्ट्रेशन (National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA)) द्वारा संचालित जिओस्टेशनरी आपरेशनल एन्विरोन्मेंटल सेटेलाइट( Geostationary Operational Environmental Satellite (GOES)) जहाज और विमानो की आपदा स्तिथि मे खोज, राहत और बचाव मे मदद करते है।

बहुत से उच्च पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह सौर गतिविधियों की भी निगरानी भी करते है। GOES उपग्रहों के पास अंतरिक्ष मौसम की निगरानी के लिये उपकरण है जो सूर्य के चित्र लेते है और अपने आसपास चुंबकीय क्षेत्र और सौर वायु की जांच करते रहते है।

उच्च पृथ्वी कक्षा से आगे कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु है जिन्हे लाग्रांज(Lagrange)बिंदु कहते है। इन बिंदुओं पर सूर्य तथा पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण समान होता है। इन बिंदुओ पर स्थित कोई भी वस्तु या पिंड पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है क्योंकि वह पृथ्वी और सूर्य दोनो द्वारा समान रूप से बंधा होता है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

कुल पांच लाग्रांज बिंदु है जिनमे से दो L4 और L5 बिंदु ही संतुलित या स्थाई है। अन्य तीन बिंदुओं पर उपग्रह किसी पहाड़ की चोटी पर गेंद के जैसे है, इन बिंदुओं पर हल्के से क्षोभ से उपग्रह अपने स्थान से पहाड़ी से लुढकती गेंद के जैसे हट जाता है। इन तीनो बिंदुओ पर उपग्रह को स्थिर, संतुलित रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है। अंतिम दो बिंदुओ पर स्थित उपग्रह किसी कटोरे मे गेंद की तरह होते है, किसी वजह से इन बिंदुओ से हटजाने पर भी वापिस अपनी वास्तविक स्थिति पर आ जाते है।

प्रथम लाग्रांज बिंदु पृथ्वी और सूर्य के बीच मे स्तिथ है जिससे इस बिंदु से सूर्य पर लगातार नजर रखी जा सकती है। नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष संस्थान (ESA) की सोलर एन्ड हिलिओस्फेरिक ओब्जर्वेटरी(Solar and Heliospheric Observatory (SOHO)) पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर इसी बिंदु पर स्थित है।

द्वितिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी से इतनी ही दूरी पर है लेकिन पृथ्वी के पीछे है, पृथ्वी हमेशा सूर्य और द्वितिय लाग्रांज बिंदु के मध्य होती है। इस स्तिथि मे पृथ्वी, सूर्य और उपग्रह एक ही रेखा मे होते है, जिससे इस बिंदु पर स्तिथ उपग्रहो को सूर्य और पृथ्वी की उष्मा से बचने के लिये केवल एक ही ओर उष्मा शील्ड चाहीये होती है। यह अंतरिक्ष दूरबीनो के लिये सर्वोत्तम जगह है जिसमे भविष्य की जेम्स वेब दूरबीन तथा वर्तमान विल्किंसन माइक्रोवेव अनिसोट्रोपी प्रोब( Wilkinson Microwave Anisotropy Probe-WMAP) शामिल है जिसका प्रयोग ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने के लिये माइक्रोवेव विकिरण के अध्ययन के लिये हो रहा है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

तृतिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी के विपरीत सूर्य की दूसरी ओर इस तरह से है कि सूर्य हमेशा इस बिंदु और पृथ्वी के मध्य होता है। इस स्तिथि मे उपग्रह पृथ्वी से कभी संपर्क नही कर पाता है। अत्याधिक रूप से स्थिर लाग्रांज बिंदु L4 तथा L5 है जो की पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा कक्षा मे पृथ्वी के सामने और पीछे 60 डीग्री दूरी पर है। इन बिंदुओ पर जुड़वा सोलर टेरेस्टेरीयल रीलेशनस ओब्सरवेटरी (Solar Terrestrial Relations Observatory (STEREO)) परिक्रमा कर रहे है और सूर्य का त्रिआयामी चित्र बना रहे है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा

पृथ्वी के समीप मध्यम पृथ्वी कक्षा मे उपग्रह तेजी से गति करते है। इनमे से दो कक्षाये विशिष्ट है, अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) तथा मोलनिया कक्षा(Molniya)।

अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) कक्षा लगभग वृत्ताकार अर्थात कम विकेन्द्रता लिये हुये होती है और पृथ्वी केंद्र से 25,560 किमी(सतह से 20,200 किमी) उंचाई पर है। इस स्तिथि मे पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये उपग्रह को 12 घंटे लगते है। जैसे ही उपग्रह गति करता है, पृथ्वी भी नीचे घूर्णन करती है। 24 घंटो मे उपग्रह एक स्थान पर से दो बार गुजरता है। यह कक्षा सुसंगत और स्थिर होती है, जिससे यह कक्षा नेविगेशन उपग्रहो, ग्लोबल पोजिशनिगं सीस्टम के उपग्रहो के लिये उपयुक्त होती है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा मे दूसरी महत्वपूर्ण कक्षा मोलनिया कक्षा है। यह कक्षा रूसी वैज्ञानिको ने खोजी थी। यह कक्षा उच्च अक्षांशो के लिये प्रयुक्त होती है। भूस्थानिक कक्षा के उपग्रहों से पृथ्वी का स्थिर परिदृश्य मिलता है लेकिन ये उपग्रह विषुवत रेखा पर होते है और इस स्तिथि मे वे उत्तरी ध्रुव या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो के निरीक्षण के लिये अनुपयुक्त होते है क्योंकि वे इन उपग्रहो की परिदृश्य की सीमा पर होते है। इस स्तिथि मे मोलनिया कक्षा एक अच्छा विकल्प होती है।

मोलनिया कक्षा अत्याधिक विकेन्द्रित होती है। उपग्रह अत्याधिक दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे गति करता है जिसके एक भाग मे पृथ्वी निकट होती है। पृथ्वी की निकटतम स्तिथि मे उपग्रह की गति सर्वाधिक होती है क्योंकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उसे गति देता है। जैसे ही वह पृथ्वी से दूर जाता है उसकी गति कम होते जाती है और वह कक्षा मे अधिकतम समय उपर पृथ्वी से दूर व्यतित करता है। मोलनिया कक्षा मे उपग्रह 12 घंटे मे पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है लेकिन इसका दो तिहाई समय वह केवल एक ही गोलार्ध के उपर रहता है। अर्धसमकालिक कक्षा के जैसे यह भी 24 घंटे मे एक स्थान पर दो बार पहुंचता है। यह कक्षा उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो पर संचार के लिये उपयुक्त होती है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit)

अधिकतर वैज्ञानिक उपग्रह और मौसमी उपग्रह लगभग वृत्ताकार निम्न पृथ्वी कक्षा मे होते है। उपग्रह का झुकाव उसके प्रयोग पर निर्भर करता है। ट्रापीकल रेनफ़ाल मेजरींग मिशन(Tropical Rainfall Measuring Mission (TRMM)) उपग्रह उष्णकटिबंध प्रदेश मे वर्षा के मापन के लिये है। इसलिये इस उपग्रह का झुकाव कम अर्थात 35 डीग्री है जिससे वह उष्णकटिबंध प्रदेश के उपर अधिकतर समय रहे।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

नासा और इसरो के अधिकतर उपग्रह ध्रुविय कक्षा मे है। इस अत्याधिक झुकाव वाली कक्षा मे उपग्रह ध्रुव से ध्रुव गति करते है और एक परिक्रमा पूरी करने मे 99 मिनट लेते है। एक परिक्रमा मे उपग्रह आधे समय दिन वाले भाग मे और आधे समय रात वाले भाग मे होता है। उपग्रह दिनवाले भाग से रात वाले भाग मे प्रवेश ध्रुव के उपर से करता है।

जब उपग्रह अपनी कक्षा मे गति करता है नीचे पृथ्वी भी घूर्णन करती है। जैसे ही उपग्रह दिन वाले भाग मे दोबारा आता है वह पिछली कक्षा वाले स्थान से बाजु वाले स्थान से गुजरता है। 24 घंटे मे ध्रुविय उपग्रह हर स्थान से दोबारा गुजरता है, एक बार दिन वाले समय मे दूसरी बार रात वाले समय मे।

भूसमकालिक उपग्रहों द्वारा जिस तरह से विषुवत के उपर रह कर पृथ्वी के एक स्थान की निगरानी की जा सकती है उसी तरह से ध्रुविय उपग्रहो द्वारा एक स्थान पर स्थिर समय पर नजर रखी जा सकती है। इस कक्षा को सूर्यसमकालिक (Sun-synchronous)कहते है, इसका अर्थ यह है कि जब भी उपग्रह विषुवत रेखा को पार करेगा, पृथ्वी पर उस स्थल का स्थानिक समय हमेशा समान रहेगा। उदाहरण के लिये टेरा(Terra) उपग्रह सुबह 10:30 बजे ब्राजील के उपर से जब विषुवत रेखा को पार करता है, 99 मिनट बाद अपनी अगली परिक्रमा मे वह जब इक्वाडोर या कोलंबीया के उपर से विषुवत को पार करता है तब इक्वाडोर या कोलंबीया मे स्थानिय समय 10:30 सुबह होता है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

विज्ञान मे सूर्य समकालिक कक्षाये महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इन कक्षाओं मे पृथ्वी की सतह पर सूर्य किरणो का कोण हमेशा समान रखने का प्रयास होता है।(हालांकि सूर्य की किरणो का कोण पृथ्वी की सतह पर मौसम के अनुसार बदलते रहता है।) इससे यह होता है कि वैज्ञानिक एक ही मौसम की भिन्न वर्षो मे ली गई तस्वीरो की सूर्य के कोण, प्रकाश और छाया की चिंता किये बगैर तुलना कर सकते है। सूर्य समकालिक कक्षा के बिना इस तरह की तुलना कष्टसाध्य होगी। मौसमी बदलाव या क्लाईमेट चेंज का अध्ययन इस तरह की तुलना के बगैर असंभव होगा।

सूर्य समकालिक कक्षा मे उपग्रह का पथ काफ़ी संकरा होता है। यदि उपग्रह की उंचाई 100 किमी है तो सूर्य समकालिक कक्षा मे बने रहने उसका कक्षीय झुकाव 96 डीग्री होना चाहिये। इन दोनो मे कोई भी बदलाव उस उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा से बाहर कर देगा। वातावरण द्वारा घर्षण से उत्पन्न खिंचाव और सूर्य, चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण इन उपग्रहो की कक्षा मे बदलाव करते है, जिससे इन उपग्रहो को सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है।

उपग्रह द्वारा कक्षा प्राप्त करना और उसमे बने रहना

प्रक्षेपण

किसी उपग्रह के प्रक्षेपण मे लगने वाली ऊर्जा प्रक्षेपण स्थल, कक्षा की उंचाई और कक्षीय झुकाव पर निर्भर करती है। उच्च पृथ्वी कक्षा मे पहुंचने उपग्रहों को सर्वाधिक ऊर्जा चाहिये होती है। अत्याधिक कक्षिय झुकाव जैसे ध्रुविय कक्षा के लिये लगने वाली ऊर्जा कम अक्षीय झुकाव वाले उपग्रह जैसे विषुवत के उपर गति करने वाले उपग्रह से अधिक होती है। कम अक्षिय झुकाव वाला उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन का प्रयोग कर अपनी कक्षा मे पहुंच सकता है। अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र 51.6397 डीग्री के झुकाव वाली कक्षा मे है जिससे नासा के स्पेस शटल और रूसी सोयुज द्वारा उस तक पहुंचना आसान है। जबकि ध्रुव की परिक्रमा करने वाले उपग्रह को पृथ्वी के संवेग से कोई मदद नही मिलने से उसी उंचाई तक पहुंचने मे अधिक ऊर्जा चाहिये होती है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कक्षा मे स्थिर रहना

एक बार उपग्रह अपनी कक्षा मे पहुंच गया तब भी उसे अपनी कक्षा मे बने रहने कुछ कार्य करते रहना होता है। पृथ्वी पूर्ण रूप से गोल नही है, उसका गुरुत्वाकर्षण कुछ जगह पर अन्य स्थानो की तुलना मे अधिक है। गुरुत्वाकर्षण मे यह अनियमितता और सूर्य, चंद्रमा , बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न खिंचाव से मिलकर उपग्रह के कक्षीय झुकाव मे परिवर्तन आ जाता है। अपने जीवनकाल मे GOES उपग्रहो को अपनी कक्षा मे बने रहने तीन से चार बार बदलाव करने होते है। नासा के निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने अपने कक्षीय झुकाव मे वर्ष मे एक बार या दो वर्ष मे एक बार बदलाव करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह पृथ्वी के वातावरण के घर्षण से उत्पन्न खिंचाव से अपनी कक्षा से हट जाते है। ये उपग्रह पृथ्वी के वातावरण की उपरी पतली तह से गुजरते है लेकिन उस उंचाई पर वायु का प्रतिरोध फ़िर भी इतना होता है कि वह उन उपग्रहो को खींच कर पृथ्वी की ओर ले आता है। अब पृथ्वी का गुरुत्चाकर्षण उन्हे कम उंचाई पर आने से अधिक गति देता है। अधिक गति अधिक घर्षण। समय के साथ उपग्रह गति बढ़ने और उंचाई कम होने से पृथ्वी के वातावरण मे स्पाईरल पथ मे प्रवेश कर जल सकता है।

वातावरण का यह खिंचाव सौर सक्रियता मे अधिक मजबूत होता है क्योंकि सौर सक्रियता मे सूर्य के द्वारा अतिरिक्त ऊर्जा के देने से वायुमंडल किसी गुब्बारे के जैसे फ़ूलता है। वातावरण की बाह्य पतली परत उपर उठती है और उसकी जगह नीचे से घनी परत ले लेती है। अब उपग्रह वातावरण मे घनी परत से गुजर रहा है जबकि वह सूर्य के सक्रिय ना होने पर अपेक्षाकृत रूप से पतली परत से गुजर रहा था। सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह अधिक घनी परत से गुजरने से उसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना होता है। सूर्य के असक्रिय काल मे निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रहों को अपनी कक्षा मे परिवर्तन वर्ष मे चार बार करना होता है। लेकिन सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह को अपनी कक्षा मे बदलाव हर दो तीन सप्ताह मे करना होता है।

उपग्रह की कक्षा मे बदलाव का तीसरा कारण अंतरिक्ष कबाड़ है जोकि उस उपग्रह के पथ मे हो सकता है। 11 फ़रवरी 2009 को अमरीकी उपग्रह कंपनी इरीडीयम का एक संचार उपग्रह रूस के निष्क्रिय उपग्रह से टकरा गया था। दोनो उपग्रह टूट गये और दोनो ने मिलकर 2,500 टूकड़ो का एक अंतरिक्ष मलबा बना दिया। इन 2500 टूकड़ो को पृथ्वी की कक्षा मे गति कर रहे 18,000 मानवनिर्मित पिंडो के डेटाबेस मे जोड़ दिया गया जिन पर अमरीकी अंतरिक्ष निगरानी नेटवर्क (U.S. Space Surveillance Network.)नजर रखता है।

 अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।


अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।

नासा उपग्रह अभियान संचालक अपने उपग्रह मे पथ मे आनेवाली हर वस्तु पर नजर रखते है। हर वर्ष कम से कम चार पांच बार उपग्रहो को रास्ते मे आ रहे इन मलबो से टकराने से बचने के लिये पथ बदलना होता है।

उपग्रह संचालन टीम अंतरिक्ष के इन मलबो तथा अन्य उपग्रहो पर नजर रखती है, और उसके अनुसार इन उपग्रहो के कक्षा मे मार्ग, उंचाई बदलने की योजना बनाती है।



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Thursday, 27 December 2018

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington).

अल्बर्ट आइंस्टीन ! यह नाम आज किसी परिचय का मोहताज नही है। आइंस्टीन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षवाद सिद्धान्त आज आधुनिक भौतिकी का आधार स्तंभ माना जाता है। आज यह सिद्धान्त हमलोग भलीभांति समझते है और दूसरों को भी समझा सकते है लेकिन क्या यह सिद्धान्त को समझना शुरुआती दिनों में भी इतना ही सरल था ? जवाब है – नही !

शुरुआती दिनों में सापेक्षवाद सिद्धान्त को समझना सामान्य मनुष्यों को तो छोड़िए वैज्ञानिको के लिए भी बड़ा कठिन कार्य था।

एक प्रसिद्ध भौतिकविज्ञानी और विज्ञान प्रस्तोता का कथन है

“वो महान है जो जटिल यंत्र बनाये, जटिल सिद्धान्त दे परन्तु उससे भी ज्यादा महान वो है जो जटिल को सरल बना दे।”

हम उस महान व्यक्ति को तो हमेशा याद करते है जिन्होंने सापेक्षवाद सिद्धान्त हमे दिया लेकिन उस व्यक्ति को याद नही करते जिसने सापेक्षवाद सिद्धान्त को सामान्य लोगो से लेकर वैज्ञानिको के लिए भी सरलतम रूप में प्रस्तुत किया।

वह महान व्यक्ति था सर आर्थर स्टेनली एडिंगटन(Sir Arthur Stanley Eddington). एक प्रतिभाशाली खगोलविज्ञानी, भौतिकविज्ञानी और एक बेहतरीन गणितज्ञ। आइंस्टीन इस बात को जानते थे इसलिए उन्होंने कहा भी है

“जो सिद्धान्त को पुर्णतः समझता है वही अच्छी तरह सिद्धान्त को समझा सकता है।”

28 दिसम्बर को आर्थर एडींगटन का जन्मदिन है। उनका जन्म 28 दिसंबर 1882 तथा मृत्यु 22 नवंबर 1944 को हुई थी।

इस सिद्धांत की गूढ़ता के बारे में एक घटना विख्यात है। सापेक्षता सिद्धांत को पूरी तरह समझने वाले शुरुआती व्यक्तियों में सर आर्थर एंडिग्टन का नाम विशिष्ट माना जाता है। उनके बारे में एक भौतिक-विज्ञानी ने तो यहाँ तक कह दिया था-

‘‘सर आर्थर! आप संसार के उन तीन महानतम व्यक्तियों में से एक हैं जो सापेक्षता सिद्धांत को समझते हैं।’’ यह बात सुनकर सर आर्थर कुछ परेशान हो गये। तब उस भौतिक-विज्ञानी ने कहा- ‘‘इतना संकोच करने की क्या आवश्यकता है सर ?’’ इस पर सर आर्थर ने कहा-‘‘संकोच की बात तो नही है किन्तु मैं स्वयं सोच रहा था कि तीसरा व्यक्ति कौन हो सकता है ?’’

आर्थर एडिंगटन से सापेक्षवाद सिद्धान्त को सामान्य लोगो को उनकी भाषा मे समझाया और सापेक्षवाद पर सरल भाषा मे कई लेख लिखे। सरल रूप में उन्होंने ही सापेक्षवाद को इतना लोकप्रिय सिद्धान्त बनाया उनकी लिखी पुस्तक “Space, Time and Gravitation: An Outline of the General Relativity Theory” आज भी सापेक्षवाद की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में गिनी जाती है।

29 मई 1919 में एक पूर्ण सूर्यग्रहण लगा था उस समय आइंस्टीन की उम्र लगभग 40 साल थी। आइंस्टीन ने सूर्यग्रहण की उस घटना को धन्यवाद दिया साथ मे आर्थर एडिंगटन को भी क्योंकि उस व्यक्ति और उस घटना ने आइंस्टीन को रातों रात सेलेब्रिटी बना दिया था। वह व्यक्ति था आर्थर एडिंगटन। आर्थर एडिंगटन द्वारा सूर्यग्रहण के समय किये एक प्रयोग से यह पता चला कि दूर की सितारों से आनेवाली प्रकाश किरणों को सूर्य की गुरुत्वाकर्षण द्वारा वक्रीत किया जाता है। यह वक्रता उतनी ही है जितनी सामान्य सापेक्षवाद के अनुसार अनुमानित हैं। उस घटना ने सामान्य सापेक्षवाद सिद्धान्त को गुरुत्वाकर्षण का सबसे प्रमुख सिद्धान्त बना दिया।

आर्थर एडिंगटन ने सूर्य ग्रहण के दौरान तारों की स्थिति में विचलन देखा था यह विचलन सामान्य सापेक्षवाद सिद्धान्त को प्रमाणित करता था।
एडिंगटन को विश्वास था की अब आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार सापेक्षवाद सिद्धान्त के लिए मिलने वाला है। लेकिन नोबेल कमेटी ने सापेक्षवाद सिद्धान्त को प्रमाणित होने पर भी नोबेल पुरस्कार देना जरूरी नही समझा। बहुतों को और स्वयं आइंस्टीन को यह लगा जैसे कमेटी ने उनका तिरस्कार किया है। क्या वाकई आइंस्टीन के सिद्धांत प्रामाणिक नहीं थे? समस्या यह थी कि एडिंगटन द्वारा किए गए प्रेक्षण परिष्कृत नहीं थे और उन्होंने बहुत सारे डेटा को अनुपयोगी मानकर अपने निष्कर्षों में शामिल नहीं किया था।

लेकिन अन्ततः 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। जब नोबल कमेटी की पुरस्कार घोषणा में यह लिखा गया था कि आइंस्टीन को यह पुरस्कार

“सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान तथा विशेषकर प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए दिया जा रहा है”।

माना जाता है कि “सैद्धांतिक भौतिकी को उनके योगदान” लिखकर कमेटी ने एक तरह से उनकी सापेक्षता की खोज के गौरव को स्वीकार कर लिया था। लेकिन कमेटी ने एक स्थान पर यह भी लिख दिया कि “यह पुरस्कार सापेक्षता और गुरुत्व संबंधी आपकी स्थापनाओं को ध्यान में रखकर नहीं दिया जा रहा है क्योंकि उनकी पुष्टि होनी बाकी है”।

आर्थर एडींगटन की शिक्षा मैनचेस्टर विश्वविदयालय तथा कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कालेज मे हुई थी।

उन्हे निम्नलिखित खोजो के लिये भी जाना जाता है।

  • एडींगटन सीमा( Eddington limit)
  • एडींगटन संख्या( Eddington number)
  • एडींगटन -डिरैक संख्या(Eddington–Dirac number)
  • एडींगटन -फ़िंकेल्स्टाइन निर्देशांक(Eddington–Finkelstein coordinates)

सम्मान

  • रायल सोसाइटी का रायल पदक (Royal Society Royal Medal) (1928)
  • स्मिथ पुरस्कार (Smith’s Prize) (1907)
  • RAS स्वर्ण पदक(Gold Medal) (1924)
  • हेनरी ड्रेपर पदक(Henry Draper Medal) (1924)
  • ब्रुस पदक(Bruce Medal) (1924)
  • नाइट्स बैचलर(Knights Bachelor) (1930)
  • आर्डर आफ़ मेरीट(Order of Merit) (1938)


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