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Monday, 13 May 2019

खगोल भौतिकी 13 :सूरज की संरचना – I

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

मंदाकिनी आकाशगंगा(The Milky way) मे लगभग 1 खरब तारे है। हमारे लिये सबसे महत्वपूर्ण तारा सूर्य है। यह वह तेजस्वी तारा है जिसकी परिक्रमा पृथ्वी अन्य ग्रहों के साथ करती है। आज इस लेख मे हम सूर्य को करीब से जानेंगे। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के तेरहंवे लेख मे हम सूर्य की संरचना और रूपरेखा मे बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे।

इस शृंखला के सारे लेखों को पढने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें।

सूर्य हमारे सबसे समीप का तारा है, जिससे हम इस तारे के बारे विस्तार से जानने और अध्ययन करने के अधिक मौके मिले है। यह अकेला तारा है जिसे हम डिस्क के रूप मे देख पाते है, जबकि अन्य तारे हमे केवल बिंदु रूप मे ही दिखते है। आधुनिक परिष्कृत उपकरण और कार्यकुशल निरीक्षण तकनीक ने हमे सूर्य के वास्तविक भौतिक गुणधर्मो के अध्ययन के अवसर प्रदान किये है। लेकिन हम सूर्य के वातावरण और उसकी उग्र बाह्य परतो को ही देख पाते है। वैज्ञानिक भौतिकी के नियमों और सूर्य की बाह्य परतो के अध्ययन को जोड़ कर उसकी आंतरिक परतो के बारे मे अनुमान लगाते है। इस लेख मे हम सूर्य की संरचना, घटको और उसमे चलरही भिन्न गतिविधियों का संक्षिप्त परीचय देखेंगे।

सूर्य की संरचना

इसके पहले वाले लेख मे हमने हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM) की चर्चा की है। इसके अनुसार वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण के अनुसार सूर्य G वर्ग का मुख्य अनुक्रम का तारा है। इसे अनौपचारिक रूप से पीला वामन(yellow dwarf) तारा भी कहते है। इसमे 73% हायड्रोजन और 25% हिलियम है। सूर्य के अंदर अन्य भारी तत्व जैसे आक्सीजन, कार्बन , निआन और लोहा अत्यल्प मात्रा मे मौजूद है।

सूर्य की विभिन्न परतें

सूर्य के दोनो मुख्य क्षेत्र है, आंतरिक तथा बाह्य क्षेत्र। आंतरिक क्षेत्र सौर केंद्रक(solar core) तथा उसके पश्चात क्रमश: विकिरण क्षेत्र (radiation) तथा संवहण(convective) क्षेत्र से बना हुआ है। सौरकेंद्रक मे तापनाभिकिय प्रक्रियायें चलते रहती है। यही प्रक्रियायें ही सूर्य की प्रचुर ऊर्जा का स्रोत है। इस आंतरिक क्षेत्र के बाहर का क्षेत्र सौर वातावरण है, जिसके भाग है , फोटोस्फ़ियर( photosphere), क्रोमोस्फ़ियर( chromosphere), संक्रमण क्षेत्र(transition) और प्रभामंडल या कोरोना(corona)।

सूर्य की संरचना

सूर्य की संरचना

फोटोस्फियर(Photosphere)

इस क्षेत्र के नाम से ही स्पष्ट है कि फोटोस्फियर सूर्य का दृश्य क्षेत्र है। इसी क्षेत्र से निकलने वाला प्रकाश सौर वातावरण के भागो को प्रकाशित करता है। सौर वातावरण मे फोटोस्फियर के बाद का अगला क्षेत्र फोटोस्फ़ियर की तीव्र चमक के कारण अदृश्य है। सूर्य पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से उत्पन्न सौर कलंक(sunspots) इसी क्षेत्र मे उत्पन्न होते है। इस क्षेत्र का तापमान 5770 K-5780 K के मध्य होता है।

क्रोमोस्फीयर(The Chromosphere)

क्रोम का अर्थ है रंग, और क्रोमोस्फियर नाम के अनुसार यह क्षेत्र हल्की गुलाबी या हल्की लाल आभा लिये होता है। इस क्षेत्र का घनत्व अत्यंत कम अर्थात पृथ्वी के समुद्र सतह के वातावरण से 8-10 गुणा होता है और इसे केवल सूर्यग्रहण के समय ही देखा जा सकता है। इस क्षेत्र का तापमान लगभग 20,000 K होता है।

संक्रमण क्षेत्र(Transition Region)

क्रोमोस्फियर के बाद संक्रमण क्षेत्र आता है। इस क्षेत्र मे तापमान अचानक ही 20,000 K से बढ़कर 1,000,000 K तक हो जाता है। इस क्षेत्र को पृथ्वी से देखा नही जा सकता है। लेकिन इसे अंतरिक्ष के उपग्रहों द्वारा पराबैंगनी(ultraviolet) वर्णक्रम के लिये संवेदी उपकरणो द्वारा आसानी से देखा जा सकता है।

प्रभामंडल(The Corona)

सूर्य का सबसे बाह्य क्षेत्र प्रभामंडल या कोरोना है। यह क्रोमोस्फ़ियर का सहज विस्तार है लेकिन गुणधर्मो के अत्याधिक भिन्न है। कोरोना को सूर्यग्रहण के समय स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह सूर्य के आंतरिक भाग के को घेरे हुये एक आभामंडल के जैसे दिखाई देता है। इस क्षेत्र का बाह्य भाग सूर्य की डिस्क से बहुत दूर तक ग्रहों के मध्य के अंतरिक्ष तक देखा जा सकता है। इसका तापमान दस लाख डीग्री केल्विन तक होता है। यह एक विसंगति है। इस संरचना मे स्रोत का तापमान अत्यंत कम है लेकिन वह इस क्षेत्र को इतना अधिक उष्ण कैसे कर देता है ? अपेक्षाकृत 5900 K तापमान के शीतल फोटोस्फियर से उष्मा प्रवाहित होकर प्रभामंडल को दस लाख डीग्री केल्विन तक कैसे उष्ण कर देती है ? प्रभामंडल को उष्णता प्रदान करने का स्रोत कुछ और होना चाहीये। खगोलभौतिकी की अनसुलझी पहेलीयो मे से एक है : सौर प्रभामंडल का उष्ण होने की पहेली।

सूर्यग्रहण के दौरान लिया गया प्रभामंडल का चित्र

सूर्यग्रहण के दौरान लिया गया प्रभामंडल का चित्र

मानव प्रभामंडल के बारे मे शताब्दियों से जानकारी रखता है लेकिन उसे इसकी वास्तविकता और प्रकृति के बारे मे जानकारी नही थी। वैज्ञानिको को पहले यह केवल एक दृष्टिभ्रम ही लगता था। यहाँ तक कि केप्लर जैसे खगोलवैज्ञानिक इसकी वास्तविक प्रकृति से अनजान थे। 1869 मे अमेरीकन खगोलशास्त्री डब्ल्यु हार्कनेस(W. Harkness) तथा सी ए यंग(C. A. Young) ने पहली बार सौर प्रभामंडल के वर्णक्रम का अध्ययन किया। इसके बाद 1930 मे फ़्रेंच भौतिक वैज्ञानिक बी लायट(B. Lyot) ने क्रोनोग्राफ़ उपकरण के द्वारा प्रभामंडल का प्रथम चित्र लिया। इसी क्षेत्र मे सौर ज्वाला(solar prominence) जैसी संरचनाये दिखाई देती है।

स्कायलैब (Skylab) द्वारा 1973 मे लिया गया सौर ज्वाला का चित्र

स्कायलैब (Skylab) द्वारा 1973 मे लिया गया सौर ज्वाला का चित्र

लेखिका का संदेश

इस लेख के द्वारा खगोलभौतिकी लेख शृंखला मे हमने एक नई शाखा सौर भौतिकी (Solar Physics) का परिचय कराया है। लेखिका प्लाज्मा भौतिक वैज्ञानिक है और उन्होने अल्फ़वेन तरंगो(Alfven waves) का अध्ययन किया है जोकि सौर प्रभामंडल के असामान्य रूप से उष्ण होने के लिये संभावित रूप से उत्तरदायी हो सकती है। यदि आप सूर्य की संरचना को गहराई से जानना चाहते है तो आपको विद्युतगतिकी(Electrodynamics) तथा प्लाज्मा भौतिकी का ज्ञान होना आवश्यक है। इस शृंखला के अगले लेख मे हम सूर्य की सतह के कुछ गुणधर्मो जैसे सौर कलंक(Sunspots), सौर ज्वाला(Solar Flares) के बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे।

मूल लेख : THE STRUCTURE OF SUN – I

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)

संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



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Sunday, 12 May 2019

रडार (Radar) क्या है और कैसे कार्य करता है ?

रडार (Radar) वस्तुओं का पता लगाने वाली एक प्रणाली है जो सूक्ष्मतरंगों(माइक्रोवेव) का उपयोग करती है। इसकी सहायता से गतिमान वस्तुओं जैसे वायुयान, जलयान, मोटरगाड़ियों आदि की दूरी (परास), ऊंचाई, दिशा, चाल आदि का दूर से ही पता चल जाता है। इसके अलावा मौसम में तेजी से आ रहे परिवर्तनों (weather formations) का भी पता चल जाता है। ‘रडार’ (RADAR) शब्द मूलतः एक संक्षिप्त रूप है जिसका प्रयोग अमेरिका की नौसेना ने 1940 में ‘रेडियो डिटेक्शन ऐण्ड रेंजिंग’ (radio detection and ranging) के लिये प्रयोग किया था। बाद में यह संक्षिप्त रूप इतना प्रचलित हो गया कि अंग्रेजी शब्दावली में आ गया और अब इसके लिये बड़े अक्षरों (कैपिटल) का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

रडार का आविष्कार टेलर व लियो यंग (Teller and Liyo ying  (यू.एस.ए.) ने वर्ष 1922 में किया था। यह यंत्र आकाश में आने-जाने वाले वायुयानों के संचालन और उनकी स्थिति ज्ञात करने के काम आता है। रडार, एक यंत्र है जिसकी सहायता से रेडियो तरंगों का उपयोग दूर की वस्तुओं का पता लगाने में तथा उनकी स्थिति, अर्थात्‌ दिशा और दूरी, ज्ञात करने के लिए किया जाता है। आँखों से जितनी दूर दिखाई पड़ सकता है,

 कोहरा, धुंध, वर्षा, हिमपात, धुँआ अथवा अँधेरा, इनमें से कोई भी इसमें बाधक नहीं होते। किंतु रडार आँख की पूरी बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि इससे वस्तु के रंग तथा बनावट का सूक्ष्म ब्योरा नहीं जाना जा सकता, केवल आकृति का आभास होता है।

कोहरा, धुंध, वर्षा, हिमपात, धुँआ अथवा अँधेरा, इनमें से कोई भी इसमें बाधक नहीं होते। किंतु रडार आँख की पूरी बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि इससे वस्तु के रंग तथा बनावट का सूक्ष्म ब्योरा नहीं जाना जा सकता, केवल आकृति का आभास होता है।

रडार द्वारा उससे कहीं अधिक दूरी की चीजों की स्थिति का सही पता लगाया जा सकता है। कोहरा, धुंध, वर्षा, हिमपात, धुँआ अथवा अँधेरा, इनमें से कोई भी इसमें बाधक नहीं होते। किंतु रडार आँख की पूरी बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि इससे वस्तु के रंग तथा बनावट का सूक्ष्म ब्योरा नहीं जाना जा सकता, केवल आकृति का आभास होता है। पृष्ठभूमि से विषम तथा बड़ी वस्तुओं का, जैसे समुद्र पर तैरते जहाज, ऊँचे उड़ते वायुयान, द्वीप, सागरतट इत्यादि का, रडार द्वारा बड़ी अच्छी तरह से पता लगाया जा सकता है। सन्‌ 1886 में रेडियो तरंगों के आविष्कर्ता, हाइनरिख हेर्ट्स ने ठोस वस्तुओं से इन तरंगों का परावर्तन होना सिद्ध किया था। रेडियो स्पंद (pulse) के परावर्तन द्वारा परासन, अर्थात्‌ दूरी का पता लगाने, का कार्य सन्‌ 1925 में किया जा चुका था और सन्‌ 1939 तक रडार के सिद्धांत का प्रयोग करने वाले कई सफल उपकरणों का निर्माण हो चुका था, किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध में ही रडार का प्रमुख रूप से उपयोग आरंभ हुआ।

स्थिति निर्धारण की पद्धति

रडार से रेडियो तरंगें भेजी जाती हैं और दूर की वस्तु से परावर्तित होकर उनके वापस आने में लगने वाले समय को नापा जाता है। रेडियो तरंगों की गति लगभग तीन लाख किमी प्रतिसेकंड(1,86,999 मील प्रति सेकंड) है, इसलिए समय ज्ञात होने पर परावर्तक वस्तु की दूरी सरलता से ज्ञात हो जाती है। रडार में लगे उच्च दिशापरक ऐंटेना (antenna) से परावर्तक, अर्थात्‌ लक्ष्य वस्तु, की दिशा का ठीक ठीक पता चल जाता है। दूरी और दिशा मालूम हो जाने से वस्तु की यथार्थ स्थिति ज्ञात हो जाती है। रडार का ट्रांशमिटार (transmitter) नियमित अंतराल पर रेडियो ऊर्जा के क्षणिक, किंतु तीव्र, स्पंद भेजता रहता है। प्रेषित स्पंदों के अंतरालों के बीच के समय में रडार का ग्राही (receiver), यदि बाहरी किसी वस्तु से परावर्तित होकर तरंगें आवें तो उनकी ग्रहण करता है। परावर्तन होकर वापस आने का समय विद्युत्‌ परिपथों द्वारा सही सही मालूम हो जाता है और समय के अनुपात में अंकित सूचक से दूरी तुरंत मालूम हो जाती है। एक माइक्रोसेकंड (सेकंड का दसलाखवाँ भाग) के समय से 164 गज और 19.75 माइक्रोसेकंड से 1 मील की दूरी समझी जाती है। कुछ रडार 199 मील दूर तक की वस्तुओं का पता लगा लेते हैं। अच्छे यंत्रों से दूरी नापने में 15 गज से अधिक की भूल नहीं होती और दूरी के कम या अधिक होने पर इस नाप की यथार्थता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लक्ष्य वस्तु की दिशा अथवा उसकी ऊँचाई का कोण एक अंश के 9.96 भाग तक परिशुद्ध नापा जा सकता है। रडार के ग्राही यंत्र के मानीटर पर वस्तु की स्थिति स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

दिशा का ज्ञान

लक्ष्य का पता लगाने के लिए ऐंटेना को घुमाते, या आगे पीछे करते हैं। जब ऐंटेना लक्ष्य की दिशा में होता हैं, तब लक्ष्य का प्रतिरूप मानीटर पर प्रकट होता है। इस प्रतिरूप को पिप (Pip) कहते हैं। पिप सबसे अधिक स्पष्ट तभी होता है, जब ऐंटेना सीधे लक्ष्य की दिशा में होता है। रडार के ऐंटेना अत्युच्च दिशापरक होते हैं। ये रेडियोतरंगों को सकरी किरणपुंजों में एकाग्र करते हैं तथा यंत्र में लगे विशेष प्रकार के परावर्तक इन किरणपुंजों को सघन बनाते हैं। रडार के कार्य के लिए अति लघु तरंग दैर्ध्य वाली, अर्थात्‌ अत्युच्च आवृत्तियों की, तरंगों का उपयोग होता है। इन सूक्ष्म तरंगों के उत्पादन के लिए मल्टिकैविटी मैग्नेट्रॉन (Multicavity Magnetron) नामक उपकरण आवश्यक है, जिसके बिना आधुनिक रडार का कार्य संभव नहीं है।

रडार के अवयव

रडार(Radar)

रडार(Radar)

 

प्रत्येक रडार के अवयो के कार्य निम्नलिखित है-

  1. मॉडुलेटर (modulator) से रेडियो-आवृत्ति दोलित्र (radio frequency oscillator) को दिए जाने वाली विद्युत्‌ शक्ति के आवश्यक विस्फोट प्राप्त होते हैं;
    रेडियो-आवृत्ति दोलित्र उच्च आवृत्ति वाली शक्ति के उन स्पंदों को उत्पन्न करता है जिनसे रडार के संकेत बनते हैं
  2. ऐंटेना द्वारा ये संकेत(स्पंद) आकाश में भेजे जाते हैं और ऐंटेना ही उन्हें वापसी में ग्रहण करता है
  3. ग्राही (रीसीवर)वापस आनेवाली रेडियो तरंगों का पता पाता है
  4. सूचक (indicator) रडार परिचालक को रेडियो तरंगों द्वारा एकत्रित की गई सूचनाएँ देता है।
  5. तुल्यकालन (synchronisation) तथा परास की माप के अनिवर्य कृत्य मॉडुलेटर तथा सूचक द्वारा संपन्न होते हैं। यों तो जिस विशेष कार्य के लिए रडार यंत्र का उपयोग किया जाने वाला है, उसके अनुरूप इसके प्रमुख अवयवों को भी बदलना आवश्यक होता है।

रडार के उपयोग

  • हवाई यातायात नियंत्रण
  • एंटी मिसाइल सिस्टम्स
  • वायु रक्षा प्रणाली
  • मौसम की भविष्यवाणी
  • समुद्री शिल्प और विमान नेविगेशन

रडार के कारण युद्ध में सहसा आक्रमण प्राय: असंभव हो गया है। इसके द्वारा जहाजों वायुयानों और रॉकेटों के आने की पूर्वसूचना मिल जाती है। धुंध, अँधेरा आदि इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकते और अदृश्य वस्तुओं की दूरी, दिशा आदि ज्ञात हो जाती हैं। वायुयानों पर भी रडार यंत्रों से आगंतुक वायुयानों का पता चलता रहता है तथा इन यंत्रों की सहायता से आक्रमणकारी विमान लक्ष्य तक जाने और अपने स्थान तक वापस आने में सफल होते हैं। केंद्रीय नियंत्रक स्थान से रडार के द्वारा 299 मील के व्यास में चतुर्दिक्‌, ऊपर और नीचे, आकाश में क्या हो रहा है, इसका पता लगाया जा सकता है। रात्रि या दिन में समुद्र के ऊपर निकली पनडुब्बी नौकाओं का, या आते जाते जहाजों का, पता चल जाता है तथा दुश्मन के जहाजों पर तोपों का सही निशाना लगाने में भी इससे सहायता मिलती है।

शांति के समय में भी रडार के अनेक उपयोग हैं। इसने नौका, जहाज, या वायुयान चालन को अधिक सुरक्षित बना दिया है, क्योंकि इसके द्वारा चालकों को दूर स्थित पहाड़ों, हिमशैलों अथवा अन्य रुकावटों का पता चल जाता है। रडार से वायुयानों को पृथ्वी तल से अपनी सही ऊँचाई ज्ञात होती रहती है तथा रात्रि में हवाई अड्डों पर उतरने में बड़ी सहूलियत होती है। 19 जनवरी, 1946 ई. को संयुक्त राज्य अमरीका के सैनिक संकेत दल (Army Signal Corps) ने रडार द्वारा सर्वप्रथम चंद्रमा से संपर्क स्थापित किया। रेडियो संकेत को चंद्रमा तक आने जाने में 4,59,999 मील की यात्रा करनी पड़ी और 2.4 सेकंड समय लगा।

रडार से बचाव

स्टील्थ टेक्नालाजी

स्टील्थ विमान अदृश्य कैसे हो जाते हैं, यह जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि पृथ्वी स्थित वायु यातायात नियंत्रण केंद्र विमान की स्थिति का पता कैसे लगाते हैं। इसके लिए दो तरह की प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। पहला यह कि सभी व्यावसायिक व यात्री विमानों में एक ट्रांसपोर्डर लगाया जाता है, जो विमानों के पल-पल की स्थिति की सूचना धरती पर के वायु यातायात नियंत्रण केंद्रों तक भेजता है। दूसरी स्थिति में धरती पर लगे रडार आकाश में चारों तरफ रेडियो तरंगें प्रसारित करते रहते हैं। जब ये तरंगे विमान से टकराकर परावर्तित होती हैं। रडार इन्हें पुन: रिसीव करता  है, जिससे उसे विमान की स्थिति का पता चलता है।

यह सारी प्रक्रिया लगभग वैसी ही होती है, जैसे आंखों से किसी वस्तु को देखने पर होती हैं। बस इस प्रक्रिया में आंखों की जगह रडार व प्रकाश की जगह रेडियो तरंगें होती हैं। इन्हीं रडारों को चकमा देने के लिए स्टील्थ विमान को एक खास तरह की धातु से पेंट किया जाता है, जो रेडियो तरंगो को अवशोषित कर लेता है, जिससे रेडियो तरंगे परावर्तित होकर वापस धरती पर नहीं आतीं। इस वजह से स्टील्थ विमान रडार से अदृश्य हो जाता है। उनका पता नहीं चलता।

आंखों से देखे जा सकते हैं ये विमान
ये खास तरह के पेंट विमान को सिर्फ रडार से ही अदृश्य कर पाने में सक्षम होते हैं। मानव आंखों से इन्हें साफ-साफ देखा जा सकता है। बशर्ते कि ये विमान मानव आंखों की देखे जाने की सीमा के भीतर हों, बीच मेंकोई अन्य बाधा न हो।

अन्य उपाय

  1. यदि कोई वस्तु नकली संकेत उत्पन्न करे तो उस से वास्तविक रडार संकेतो को भ्रमित किया जा सकता है, फिर वो असली वाले रडार सिग्नल से मिलकर गलत जानकारी पहुंचाएंगे या फिर रीसीवर तक पहुँच ही नहीं पाएंगे।
  2. यदि किसी भी हवाई जहाज या लड़ाकू विमान डिजाईन है या नुकीला है, तो संकेत विमान पर टकराकर बिखर जाते हैं, और रिसिवर तक नहीं पहुँच पाते हैं।
  3. यदि कोई विमान बहुत कम ऊंचाई पर है और उसके आस पास पहाड़ पेड़ पौधे और इमारते हैं, तब भी संकेत इधर उधर टकराकर ख़त्म हो जाते हैं और रीसीवर तक नहीं पहुँच पाते हैं।

स्रोत

भारत डीस्कवरी

विकिपीडीया



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Saturday, 11 May 2019

खगोल भौतिकी 12 : हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM)

लेखक : ऋषभ

जब आप खगोलभौतिकी का अध्ययन करते है, विशेषत: तारो का तो यह असंभव है कि आपने हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM) ना देखा हो। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के बारहवें लेख मे हम खगोल विज्ञान के सबसे महत्वपूर्ण आरेख HR आरेख के बारे मे जानेंगे। यह सबसे महत्वपूर्ण आरेख क्यों है ? प्रथम आप इसमे ब्रह्मांड के सभी तारों को इस पर चित्रित कर सकते है और द्वितिय इस आरेख मे तारे के संपूर्ण जीवन चक्र को चित्रित किया जा सकता है। अब हम हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख और इसके खगोलभौतिकी मे अनुप्रयोगो को देखते है।

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM)

ब्रह्मांड मे एक अनुमान के आधार पर ट्रिलीयन ट्रिलियन(1024) तारे है। हर तारा अपने आप मे अद्वितिय है, हर तारे का अपना भिन्न द्रव्यमान, सतही तापमान, आकार, घनत्व, सतह पर घनत्व इत्यादि है। जब खगोलवैज्ञानिक तारों का अध्ययन कर रहे थे तो उन्होने इन तारों के मध्य एक विशिष्ट पैटर्न देखा। वे चाहते थे कि एक ऐसा आरेख(graph) बनाया जाये जिसमे ब्रह्मांड के हर तारे को चित्रित किया जा सके। हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख एक ऐसा ही आरेख है। यह उपर दिखाये गये चित्र के अनुसार बिंदु आरेख(scatter graph) है।

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख के अक्ष(Axes of HR Diagram)

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख के अक्ष(Axes of HR Diagram)

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख के अक्ष(Axes of HR Diagram)

जब भी आप कोई आरेख बनाते है तो सबसे पहले आपको उसके अक्षो को परिभाषित करना होता है। हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख के अक्ष मे Y अक्ष दीप्ती(Luminosity) का प्रतिनिधित्व करता है जो कि Y के मूल्य के साथ बढ़ती जाती है। दीप्ती(Luminosity) किसी तारे का कुल ऊर्जा उत्पादन होता है। इसकी चर्चा हमने इस शृंखला के आंठवे आलेख ’खगोलभौतिकी मे परिमाण (MAGNITUDE) की अवधारणा’ मे की है। वैकल्पिक रूप से दीप्ती को मोटे तौर पर किसी पिंड की चमक के रूप मे भी परिभाषित कर सकते है। खगोलभौतिकी मे हम चमक को परिमाण (magnitude)के रूप मे मापते है। यह एक ऐसी संख्या है जो बताती है कि कोई पिंड कितना चमकदार है। यह संख्या जितनी छोटी होगी, पिंड उतना अधिक चमकदार होगा। इस आरेख मे जैसे हम उपर जाते है(Y मे वृद्धि), परिमाण कम होता है और दीप्ती मे वृद्धि होती है।

तारे के रंग और सतह के तापमान के मध्य संबंध( The relation between a star's color and surface temperature)

तारे के रंग और सतह के तापमान के मध्य संबंध( The relation between a star’s color and surface temperature)

अब हम x अक्ष पर आते है। यह तारे की सतह तापमान का प्रतिनिधित्व करता है। इस शृंखला के नवम लेख ’तारों का वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण (SPECTRAL CLASSIFICATION)’ मे हमने देखा था कि तारों को उनके सतह के तापमान के आधार पर सात मुख्य वर्गो मे रखा जा सकता है। तारों की सतह के तापमान के घटते क्रम मे यह वर्ग है O,B,A,F,G,K तथा M। अब आप ध्यान मे रखिये कि इस आरेख मे x के मूल्य मे वृद्धि के साथ सतह का तापमान घटता है। चित्र मे नीले तीर पर ध्यान दिजिये। उष्णतम O वर्ग के तारे इस आरेख मे बायें है जबकि शितलतम K तथा M तारे दायें भाग मे है।

आरेख मे तारों का अंकन(Plotting The Stars On The Diagram)

इस आरेख मे अक्षो को समझने के पश्चात हम ब्रह्मांड के किसी भी तारे को लेकर इस आरेख मे अंकित कर सकते है। इस आरेख मे हर बिंदु एक तारे का प्रतिनिधित्व कर रहा है। ध्यान दिजिये कि इस आरेख मे तारे समूहों के रूप मे दिख रहे है। अब हम इन समूहों को देखते है।

समूह (Group) A

सर्वाधिक तारे समूह A मे के भाग प्रतित होते है। इन तारों को मुख्य अनुक्रम के तारे(the Main Sequence stars) कहते है।एक मुख्य अनुक्रम का तारा अपने केंद्रक मे हायड्रोजन के संलयन से हिलियम का निर्माण कर रहा होता है। हमारा सूर्य भी एक मुख्य अनुक्रम का तारा है और समूह A का सदस्य है, इसकी सतह का तापमान लगभग 5,900 K है। इसका अर्थ यह है कि यह G वर्ग का तारा है। सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान (absolute magnitude)+4.8 है। हम सूर्य के दोनो कारको को जानते है और उसे आसानी से आरेख मे अंकित कर सकते है। मुख्य अनुक्रम के अन्य तारों मे अल्फ़ा सेंटारी (alpha centuri) और लुब्धक(Sirius) भी है।

समूह (Group) B

अपनी सारी हाइड्रोजन को हिलियम मे जलाने के बाद तारे मुख्य अनुक्रम पट्टे से बाहर चले जाते है। अधिकतर तारे लाल दानव(red giants) बन जाते है और समूह B मे आ जाते है। लाल दानव का अर्थ है तारे की सतह का तापमान कम हो रहा है(वे K या M वर्ग मे है) लेकिन उसकी दीप्ती या ऊर्जा उत्पादन बढ़ रहा है। तो अब तारा आरेख मे कहाँ जायेगा ? यह तारा X अक्ष मे दायें और Y अक्ष मे उपर की ओर जायेगा अर्थात तापमान मे कमी और दीप्ती मे वृद्धि। इस क्षेत्र को लाल दानव शाखा(Red Giant Branch) कहते है। समूह B के कुछ परिचित तारे अल्डेबरान(Aldebaran) और मिरा(Mira) है।

समूह (Group) C

समूह C के तारे दानव तारों से भी अधिक दीप्तीमान होते है। इन्हे महादानव(supergiants) कहते है , ऐसे तारे जिनकी दीप्ती अत्याधिक ज्यादा है। बीटलगुज(Betelgeuse) के जैसे महादानव तारे इतने विशाल है कि यदि उन्हे सूर्य की जगह रखे तो इनका आकार बृहस्पति(Jupiter) की कक्षा से भी बाहर चला जायेगा। ध्यान दिजिये कि दानव और महादानव का x अक्ष साझा है, लेकिन Y अक्ष अलग है क्योंकि उनकी दीप्ती अधिक है। लेकिन नीले महादानव तारे इसका अपवाद है जो कि चित्र के उपरी बायें कोने मे है, उनकी सतह का तापमान अधिक होता है।

समूह (Group) D

समूह D के तारे श्वेत वामन(white dwarfs) कहलाते है। यदि आप इन तारों को आरेखे मे देखे तो इनके गुणो को आसानी से जान जायेंगे। यह आरेख मे बायें नीचे है, आप देख सकते है कि इनकी सतह का तापमान अधिक है और रंग नीला सफ़ेद है। ये आरेख के निचले भाग मे है अर्थात इनकी दीप्ती या ऊर्जा उत्पादन कम है। ये गुण न्युट्रान तारों और श्वेत वामन तारों के है। ये वास्तविकता मे मृत तारे है।

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM)

मूल लेख :THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



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Thursday, 9 May 2019

खगोल भौतिकी 11 : तारों का वातावरण

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

अब तक आप तारों के वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण तथा साहा के प्रसिद्ध समीकरण को जान चुके है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के इस लेख मे हम आपको आसमान मे टिमटीमाते खूबसूरत तारों के वातावरण के बारे मे चर्चा करने जा रहे है। आयोनाइजेशन सिद्धांत के अनुसार हम यह जानने का प्रयास करते है कि तारकीय वातावरण मे होता क्या है ?

हम जानते है कि किसी तारे के वातावरण मे किसी विशिष्ट तत्व की उपस्थिति से उस तारे के वर्णक्रम मे कुछ विशिष्ट रेखाये बनकर उभरती है जो उपरोक्त चित्र मे स्पष्ट है। यह उस तारे की संरचना पर ही नही, उसके तारकीय तापमान पर भी निर्भर है। इस लेख मे हम जानने का प्रयास करेंगे कि आयोजाइजेशन सिद्धांत के प्रयोग से किस प्रकार खगोलभौतिकी वैज्ञानिक उस तारे की आंतरिक संरचना केवल उस तारे के वर्णक्रम को ही देखकर जान लेते है। हम यह भी देखेंगे कि तारों का वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(spectral classification) किस तरह से आयोनाइजेशन सिद्धांत पर आधारित है। सबसे पहले यह जानते है कि आयोनाइजेशन ऊर्जा(ionization energy) क्या है ?

आयोनाइजेशन ऊर्जा(ionization energy) क्या है ?

किसी धात्विक गैस के बाह्य इलेक्ट्रानो को परमाणु से हटाने के लिये लगने वाली न्यूनतम ऊर्जा आयोनाइजेशन ऊर्जा कहलाती है। कुछ तत्वो की आयोनाइजेशन ऊर्जा अधिक होती है, जबकी कुछ धातुओं की आयोनाइजेशन ऊर्जा कम होती है। नीचे दिया गया चित्र विभिन्न तत्वो की आयोनाइजेशन ऊर्जा मे विचलन को दर्शा रहा है।

आयोनाइजेशन सिद्धांत ने “कल्पना युग (age of imagination)” से “प्रायोगिक विज्ञान युग (age of experimental science)” की ओर जाने का का मार्ग प्रशस्त किया है। इस सिद्धांत ने ही हार्वर्ड वर्गीकरण के O से M वर्ग के वर्णक्रमों को वास्तविकता मे तापमान आधारित क्रम के रूप सिद्ध किया है। अब तारों की संरचना और तापमान को आयोनाइजेशन सिद्धांत के आधार पर देखते है। सबसे पहले तारो को दो श्रेणीयों मे विभाजित करते है और उनमे आयोनाइजेशन प्रक्रिया को समझते है।

कम तापमान वाले तारे(Low-Temperature Stars)

केवल शीतलतम तारे ही अणुओं(molecules) से संबधित वर्णक्रम पट्टा(spectral bands) बना सकते है। ये अणु हायड्रोकार्बन(CH), सायनोजेन(CN), कार्बन अणु, टाइटेनियन आक्साईड(TiO) इत्यादि हो सकते है। ये अणु केवल शीतलीकृत वातावरण मे ही टूटे बगैर रह सकते है। इसलिये लाल और पीले रंग के तारे जिनकी सतह पर तापमान कम होता है, इन अणुओं वाले वर्णक्रम पट्टे दिखाते है।

धातुओं की आयोनाइजेशन और उद्दीपन(excitation) ऊर्जा कम होती है। शीतल तारो मे इन धात्विक रेखाओं के उद्दीपन के लिये पर्याप्त ऊर्जा होती है। इसलिये कम तापमान वाले तारों के वर्णक्रम मे प्राकृतिक धातुओं को दर्शाने वाली रेखायें होती है।

उच्च तापमान वाले तारे(High-Temperature Stars)

अब हम कम तापमान वाले तारो से उच्च तापमान वाले तारों के वर्णक्रम की ओर जाते है। इनमे उदासीन धात्विक वर्णक्रम रेखाये कमजोर होते जाती है, जबकी आयनीकृत धात्विक रेखाये गहरी होते जाती है। इसके पीछे अधिक तापमान पर धातुओं का आंशिक रूप से आयनीकृत होना है। उदाहरण के लिये कैल्शीयम-I की वर्णक्रम रेखा शीतल M तारों मे दिखाई देती है, जबकि कैल्शीयम II की वर्णक्रम रेखा उष्ण K या G तारों मे पाई जाती है।

हिलियम रेखाओं के संबध मे हिलियम की आयोनाईजेशन ऊर्जा सर्वाधिक है। इसलिये हिलियम की वर्णक्रम रेखायें अत्याधिक तापमान वाले तारों मे ही दिखाई देती है। हिलियम I की रेखाये अत्याधिक उच्च तापमान वाले तारे जैसे वर्ग B के तारों मे ही दिखाई देती है।

उदासीन और आयोनाइज्ड हिलियम, आक्सीजन , कार्बन , नाइट्रोजन और नीआन की विभिन्न आयनोईजेशन अवस्थाओं वाली रेखा केवल O वर्ग के तारों मे दिखाई देती है।

लेखिका का संदेश

इससे पिछले और इस लेख का उद्देश्य तारकीय वातावरण का परिचय था। इसके पिछले वाले लेख मे हमने साहा समीकरण द्वारा ब्रह्माण्ड मे तारे के रहस्यो को तोड़ने मे महत्व को देखा था। तारकीय वातावरण मे शोध यह खगोलभौतिकी मे अधिक कार्य किया जाने वाला विषय है। यह एक विस्तृत विषय है और इसके लिये प्लाज्मा भौतिकी की जानकारी आवश्यक है। इस लेख मे हमने केवल तारे के वातावरण का परिचय देखा है। इस विषय पर चर्चा हम यहीं पर रोकेंगे और शृंखला मे आगे बढ़ेंगे। हम मानते है कि ये दो लेख कठीन और जटिल थे, लेकिन यह खगोलभौतिकी की रीढ़ है।

मूल लेख : THE ATMOSPHERE OF STARS

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)

संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



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Tuesday, 7 May 2019

खगोल भौतिकी 10 : मेघनाद साहा का समीकरण और महत्व

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के इस लेख मे हम आज एक आधारभूत गणितीय उपकरण की चर्चा करेंगे। इस उपकरण को साहा का समीकरण कहा जाता है। इस समीकरण ने खगोलभौतिकी की एक विशिष्ट शाखा की नींव रखी थी और यह प्लाज्मा के अध्ययन मे मील का पत्थर साबीत हुई है। लेखिका प्लाज्मा भौतिक वैज्ञानिक है, और इस लेख मे साहा के समीकरण और उसके इतिहास के बारे मे सहर्ष चर्चा कर रही है। चलीये साहा के समीकरण को समझते है और देखते है कि इस समीकरण ने तारों के वर्णक्रम के अध्ययन मे क्या भूमिका निभाई है।

संक्षिप्त इतिहास

1814 मे फ़्राउनहोफ़र रेखाओं की खोज ने तारों के वर्णक्रम के अध्ययन को जन्म दिया था। तारों का वर्णक्रम फ़्राउनहोफ़र वर्णक्रम के साधारण गुणधर्मो की व्याख्या करता है। सभी तारकीय(stellar) वर्णक्रम मे कुछ तत्वो की रेखाये अन्य तत्वो की रेखाओं की तुलना मे अधिक गहरी होती है। दिलचस्प रूप से उसी तत्व की रेखा की गहराई भिन्न तारों के वर्णक्रम मे सतत रूप से भिन्नता मे पाई जाती है।

यह भी पढ़े : विद्युत चुंबकीय (EM SPECTRUM) क्या है और वह खगोलभौतिकी (ASTROPHYSICS) मे महत्वपूर्ण उपकरण क्यों है ?

फ़्राउनहोफ़र रेखायें(The Fraunhofer Lines)

फ़्राउनहोफ़र रेखायें(The Fraunhofer Lines)

मेघनाद साहा

जिस समय परमाण्विक तथा विकिर्ण सिद्धांत अज्ञात था, खगोलभौतिक वैज्ञानिक वर्णक्रम रेखाओं मे भिन्नता को तारों के निर्माण के समय आरंभिक पदार्थ की संरचना मे भिन्नता का परिणाम मानते थे। लेकिन आज हम जानते है कि तारों के वर्णक्रम मे यह भिन्नता तापमान के अंतर के कारण है। इस लेख मे हम इतिहास मे झांखते हुये देखते है कि तारों के वर्णक्रम मे इस विविधता की पहेली को किस तरह एक भारतीय खगोलवैज्ञानिक मेघनाद साहा ने हल किया था।

1920 मे साहा के आयोनाइजेशन सिद्धांत ने बोह्र के परमाण्विक सिद्धांत के एक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग की व्याख्या की थी। आयनोनाईजेशन एक ऐसी स्तिथि है जिसमे किसी परमाणु केंद्रक के आसपास मंडराते इलेक्ट्रान इतनी ऊर्जा प्राप्त कर लेते है कि वे केंद्रक से अलग हो जाते है या बहुत ही कमजोर रूप से बंधे रहते है। साहा ने एक गणितिय सूत्र प्रस्तावित किया था जो कि यह दर्शाता था कि किसी तारे के वातावरण मे इलेक्ट्रानो का ऊर्जा प्राप्त करना और परमाणुओं का आयोनाइजेशन वास्तविकता मे तारों की संरचना के अतिरिक्त तापमान और दबाव पर भी निर्भर करता है। साहा के इस समीकरण ने खगोलभौतिकी की एक नई शाखा की नींव रखी थी जिसे तारकीय(stellar) स्पेक्ट्रोस्कोपी कहते है। अब हम साहा के प्रसिद्धा कार्य साहा आयोनाइजेशन समीकरण को देखते है।

साहा के समीकरण का अर्थ

साहा का समीकरण तारों के वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(spectral classification) की व्याख्या करने के लिये क्वांटम यांत्रिकी(quantum mechanics) और सांख्यकिय यांत्रिकी(statistical mechanics) के मिश्रण का प्रभावी परिणाम है। यह समीकरण बताता है कि उष्मीय संतुलन(thermal equilibrium) किसी गैस मे आयोनाइजेशन की दर उस गैस के दबाव और तापमान पर निर्भर करती है।

साहा का समीकरण

साहा का समीकरण

साहा का समीकरण

यह समीकरण दर्शा रहा है कि किसी गैस मे आयोनाईजेशन भिन्न भौतिक कारको पर निर्भर है और ये कारक है :

  • आयोनाइजेशन ऊर्जा(Ionization energy): जब किसी गैस के तापमान मे वृद्धि होती है, आयोनाइजेशन की डीग्री(degree of ionization) तब तक निम्न रहती है जब तक आयोनाइजेशन ऊर्जा के गैस के तापमान से अधिक ना हो जाये।(जो कि घातांकी(exponential ) कारक से स्पष्ट है।)
  • तापमान(Temperature): उष्मीय संतुलन मे किसी गैस की आयोनाइजेशन की डीग्री(degree of ionization) अर्थात आयन के जनघनत्व(number density) तथा उदासीन परमाणु के जनघनत्व का अनुपात तापमान मे वृद्धि के साथ अचानक बढती है। इस के बाद गैस प्लाज्मा अवस्था मे पहुंच जाती है जोकि आयन, इलेक्ट्रान और कुछ उदासीन परमाणूओ से बनी होती है।
  • आयन का जनघनत्व(number density) : जब कोई परमाणु आवेशित होता है, वह किसे इलेक्ट्रान से मिलकर फ़िर से उदासीन हो सकता है। इसलिये जैसे ही इलेक्ट्रान की संख्या बढ़ती है, आयोनाइजेशन अनुपात कम होता है। सबसे सरल हायड्रोजन प्लाज्मा मे इलेक्ट्रान की संख्या और आयन की संख्या समान मानी जाती है। इसलिये जब प्लाज्मा मे आयन का जनघनत्व बढ़ता है, आयन के उदासीन होने की दर भी बढ़ती है। इससे आयोनाइजेशन अनुपात मे कमी होती है।
  • अब इस समीकरण का भौतिक महत्व समझने का प्रयास करते है।

साहा ने निर्देशित किया था कि किसी गैस की आयोनाइजेशन की डीग्री मे दबाव का अत्याधिक प्रभाव रहता है। इस तथ्य को इससे पहले नही माना गया था। उन्होने 1921 मे जब अपना शोधपत्र रायल सोसायटी मे प्रकाशित किया। इस शोधपत्र मे उन्होने इस सिध्दांत की सहायता से तारकीय वर्णक्रम की व्याख्या की थी। उन्ही के शब्दो मे

जब हम किसी तारे को हायड्रोजन, हिलियम या कार्बन तारा कहते है और यह कहने का प्रयास कर रहे होते है कि ये तत्व किसी तारे के मुख्य घटक है तब हम उन तारों के साथ न्याय नही कर रहे होते है। जबकि सही निष्कर्ष यह है कि उस तारे के वातावरण मे उपस्थित उद्दीपन कारको के प्रभाव मे विशिष्ट तत्व या एकाधिक तत्व उत्तेजित अवस्था मे होते है और अपनी गुणधर्म वाली वर्णक्रम रेखा से उपस्थिति दर्शाते है, जबकि अन्य तत्व या तो आयन अवस्था मे होते है या उद्दीपन इतना कम होता है कि उन तत्वो को पहचानने वाली गुणधर्म रेखा नही बन पाती है।
We are not justified in speaking of a star as a hydrogen, helium or carbon star, thereby suggesting that these elements for the chief ingredients in the chemical composition of the star. The proper conclusion would be that under the stimulus prevailing in the star, the particular element or elements are excited by radiation of their characteristic lines, while other elements are either ionized or the stimulus is too weak to excite the lines by which we can detect the element.

साहा का समीकरण यह भी दर्शाता है कि कोई गैस प्लाज्मा अवस्था अत्याधिक तापमान तथा आवेशित कणो के कम जनघनत्व पर प्राप्त करती है। इसी कारण से प्लाज्मा प्राक्रुतिक रूप से खगोलीय पिंडो मे पाई जाती है जिनपर तापमान लाखों डीग्री तथा परमाणुओं का जनघनत्व 1 परमाणु प्रति घन सेमी होता है। अपनी इस प्राकृतिक उपस्थिति के कारण प्लाज्मा को पदार्थ की चतुर्थ अवस्था माना जाता है।

लेखिका का संदेश

लेखिका प्लाज्मा भौतिकी वैज्ञानिक है और वे मानती है कि तारकीय वातावरण मे शोध, खगोलभौतिकी मे लोकप्रिय और सक्रिय विषयो मे से एक है। किसी तारे का वर्णकम वास्तविकता मे अत्याधिक सूचना प्रदान कर देता है जोकि किसी खगोलभौतिक वैज्ञानिक के लिये ब्रह्मांड के रहस्यो को खोलने मे अत्यावश्यक है। इस लेख के साथ हमने इस शृंखला का एक तिहाई भाग देख लिया है। अगले लेख मे हम किसी तारे के वातावरण और खगोलभौतिकी के आयोनाइजेशन सिद्धांतों के महत्व को और विस्तार से देखेंगे। उसके पश्चात हम अपने सबसे समीप के और सर्वाधिक शोध किये गये तारे की आधारभूत संरचना को देखेंगे, यह तारा है : हमारा अपना सूर्य।

मूल लेख : SAHA’S EQUATION AND ITS IMPORTANCE

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)
संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



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Monday, 6 May 2019

तारों का वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण (SPECTRAL CLASSIFICATION)

लेखक : ऋषभ

यह लेख ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला मे नंवा लेख है और अब तक की यात्रा रोचक रही है। हमने एक सरल प्रश्न से आरंभ किया था कि खगोलभौतिकी क्या है? इसके पश्चात हमने इस क्षेत्र मे प्रयुक्त होने आधारभूत उपकरणो और तकनीकी शब्दो, दूरी की इकाईयों, खगोलीय निर्देशांक प्रणाली, परिमाण(magnitud) की अवधारणा, विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम का महत्व तथा लाल विचलन(redshifts) के प्रकारों को समझा। अब हम इस विषय की गहराईयों के गोता लगाने के लिये तैयार है और अब हम समझेंगे कि ब्रह्मांड कैसे कार्य करता है। इस लेख मे हम तारकीय खगोलभौतिकी(Stellar Astrophysics) की यात्रा आरंभ करेंगे जो कि खगोलशास्त्र मे सबसे ज्यादा अध्ययन कीया जाने वाला विषय है। इस नवम लेख मे हम समझेंगे कि ब्रह्मांड के अरबो खरबो तारों को हम केवल सात वर्गो मे समेट लेते है, अर्थात तारों का वर्गीकरण कैसे होता है।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

यूरोपीयन अंतरिक्ष संस्थान (European Space Agency (ESA)) के अनुसार ब्रह्मांड मे लगभग 1 ट्रिलियन ट्रिलियन(1024) तारे है। यह एक ऐसी संख्या है जिसका मानव की तकनीकी क्षमता मे बढ़ोत्तरी और गहन अंतरिक्ष मे अन्वेषण के साथ बढ़ना तय है। लेकिन क्या हमारे पास इन ब्रह्माण्ड के इन तारों के वर्गीकरण की कोई प्रणाली है ? इसका उत्तर है हाँ मे है! मार्गन कीनन वर्ग्रीकरण प्रणाली(The Morgan Keenan Classification System) जो कि पुरानी वर्गीकरण प्रणाली हार्वर्ड प्रणाली(Harvard System) तथा येर्कीस प्रणाली(Yerkes System) का संगम है। इन प्रणालीयों को विस्तार से देखते है।

तारों का वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली एक विमा वाली वर्गीकरण प्रणाली है जिसमे तारों को सात मुख्य वर्गो मे वर्णक्रम के आधार पर रखा जाता है। यह वर्गीकरण तारे की सतह के तापमान पर आधारित है। इसके सात वर्ग सात अल्फ़ाबेट से निर्देशित होते है जो कि उष्ण से शीतलता की ओर है, O, B, A, F, G, K तथा M। O वर्ग का तारा उष्णतम होता है जिसकी सतह का तापमान लगभग 50,000 K होता है जबकि एक M वर्ग का तारा शीतलतम होता है जिसकी सतह का तापमान केवल2,500 K होता है। इन तारो का रंग भी उनके सतह के तापमान के अनुसार होता है जोकि नीचे दिये चित्र मे दर्शाया गया है।

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

इस वर्गीकरण को याद रखने का सबसे आसान उपाय नीचे दिया गया सूत्र है।

Oh Boy, A Funny Girl Kicked Me.

इस वर्गीकरण मे हर वर्ग से संबधित तापमान सीमाये नीचे दी है।

  • O: ≥ 30,000 K
  • B: 10,000–30,000 K
  • A: 7,500–10,000 K
  • F: 6,000–7,500 K
  • G: 5,200–6,000 K
  • K: 3,700-5200 K
  • M: 2,400–3,700 K

 

वर्ग प्रभावी तापमान औपचारिक रंग आभासी रंग मुख्य अनुक्रम द्रव्यमान
(सौर द्रव्यमान)
मुख्य अनुक्रम्र त्रिज्या(सौर त्रिज्या) मुख्य अनुक्रम दीप्ती(बोलोमेट्रीक) हाइड्रोजन रेखायें मुख्य अनुक्रम का अनुपात]
O ≥ 30,000 K नीला नीला ≥ 16 M☉ ≥ 6.6 R☉ ≥ 30,000 L☉ कमजोर ~0.00003%
B 10,000–30,000 K नीला श्वेत गहरा नीला श्वेत 2.1–16 M☉ 1.8–6.6 R☉ 25–30,000 L☉ मध्यम 0.13%
A 7,500–10,000 K श्वेत नीला श्वेत 1.4–2.1 M☉ 1.4–1.8 R☉ 5–25 L☉ मजबूत 0.6%
F 6,000–7,500 K पीला श्वेत श्वेत 1.04–1.4 M☉ 1.15–1.4 R☉ 1.5–5 L☉ मध्यम 3%
G 5,200–6,000 K पीला पीलापन लिये श्वेत 0.8–1.04 M☉ 0.96–1.15 R☉ 0.6–1.5 L☉ कमजोर 7.6%
K 3,700–5,200 K हल्का संतरा हल्का पीला संतरा 0.45–0.8 M☉ 0.7–0.96 R☉ 0.08–0.6 L☉ बहुत कमजोर 12.1%
M 2,400–3,700 K संतरा लाल हल्का संतरा लाल 0.08–0.45 M☉ ≤ 0.7 R☉ ≤ 0.08 L☉ बहुत कमजोर 76.45%

अब इन मुख्य वर्गो के अंदर दस उपवर्ग है जिन्हे 0-9 से निर्देशित किया जाता है। इसमे भी छोटी संख्या अधिक तापमान को दर्शाती है। इसलिये K0 वर्ग का तारा K7 तारे से उष्ण होता है। खगोलशास्त्र मे औपचारिक रंहो का प्रयोग परम्परागत है और ये रंग A वर्ग के तारों के रंग के सापेक्ष होते है जिसे श्वेत माना जाता है। इन आभासी रंग का निर्धारण का आधार किसी निरीक्षक द्वारा गहरे आकाश मे नंगी आंखो से तारे के निरीक्षण मे दिखाई देने वाले रंग पर है।

येरकिस वर्गीकरण प्रणाली(Yerkes Classification System)

किसी तारे को उसकी सतह के तापमान के आधार पर एक अल्फ़ाबेट वर्ग दे देना काफ़ी नही है। तारे विभिन्न आकारों मे आते है और वे अपने जीवन के विभिन्न चरणो मे होते है। इसमे मुख्य अनुक्रम(Main Sequences) के तारे होते है जो अब भी अपने केंद्रक मे हाईड्रोजन के संलयन से हिलियम का निर्माण कर रहे होते है और दूसरी ओर श्वेत वामन होते है जिनका जीवन समाप्त हो चुका होता है। इसलिये हमे इनके वर्गीकरण के लिये एक और कारक चाहीये होता है, यह कारक है उनकी दीप्ती।

खगोलभौतिकी मे दीप्ती का अर्थ प्रति सेकंड कुल ऊर्जा का उत्पादन होता है। घने तारे जिनकी अधिक सतह पर अधिक गुरुत्वाकर्षण होता है, उनके वर्णक्रम मे की गहरी रेखाये गुरुत्विय दबाव मे अधिक फ़ैली होती है। किसी महाकाय तारे की सतह पर श्वेत वामन तारे की तुलना मे गुरुत्वाकर्षण कम होता है जिससे उत्पन्न दबाव भी कम होता है। ऐसा इसलिये कि समान द्रव्यमान वाले महाकाय(giant) तारे की त्रिज्या वामन(dwarf) तारे से अधिक होती है। इसलिये वर्णक्रम मे अंतर को दीप्ती के प्रभाव को माना जा सकता है और तारे को उसके वर्णक्रम के विश्लेषण के आधार पर एक दीप्ती वर्ग(luminosity class) दिया जा सकता है। दीप्ती वर्ग(luminosity class) और उसका विवरण नीचे दिया है :

  • 0 or Ia(+): अतिमहादानव (hypergiants) या अत्याधिक चमकीले महाकाय तारे(super giants)
  • Ia: दीप्तीमान महादानव(supergiants)
  • Iab: मध्यम आकार वाले दीप्तीमान महादानव(intermediate-size luminous supergiants)
  • Ib: निम्न दीप्तीमान महादानव(less luminous supergiants)
  • II: दीप्तीमान दानव( giants)
  • III: सामान्य दानव( giants)
  • IV: अर्धदानव(subgiants)
  • V: मुख्य अनुक्रम(Main Sequence)
  • sd: अर्धवामन(sub-dwarfs)
  • D: श्वेत वामन

यह वर्गीकरण तारे के वर्णक्रम के आधार पर है। इस शृंखला के दूसरे लेख मे हमने कहा था कि

“किसी खगोलवैज्ञानिक के हाथो मे ब्रह्मांड के रहस्यो को अनावृत्त करने के लिये विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है।”

अब आप इस वाक्य को प्रयोग मे देख सकते है ।

मार्गन कीनन वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(Morgan Keenan Spectral Classification of Stars)

यह वर्गीकरण हार्वर्ड प्रणाली और येरेकेस दीप्ती वर्गीकरण प्रणाली का समिश्रण है और मार्गन कीनन वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण वर्तमान मे सबसे अधिक प्रयुक्त प्रणाली है। इसमे हर तारे को उसकी सतह के तापमान के आधार पर वर्णक्रम वर्ग (spectral class) तथा उसकी दीप्ती(सतह के गुरुत्वाकर्षण) के आधार पर दीप्ती वर्ग(luminosity class) दिया जाता है। हमारा सूर्य इस वर्गीकरण के आधार G2V वर्ग का है। इसकी सतह का तापमान 5,900 K (G वर्ग) तथा यह वर्तमान मे हायड्रोजन के संलयन से हिलियम बना रहा है अर्थात मुख्य अनुक्रम (V) का तारा है। मार्गन कीनन से ब्रह्माण्ड के सभी तारो को एक ही चित्र मे समेटा जा सकता है जिसे हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell) चित्र कहते है।

हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell)

हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell)

लेखक का संदेश

तारों का वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण और हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell) चित्र तारकीय खगोलभौतीकी(Stellar Astrophysics) की आधारभूत अवधारणा है। तारों की समस्त कहानी इन्ही दो अवधारणाओं के आसपास घूमती है। यह लेख तारकीय खगोलभौतिकी को समझने मे काफ़ी महत्वपूर्ण है। वर्तमान मे खगोलभौतिकी के नाम पर अधिकतर लोग वर्महोल से यात्रा, ब्लैक होल, श्वेत विवर(white hole), समय यात्रा , श्याम पदार्थ(dark matter) की ही बात करते है। लेकिन वास्तविकता मे, खगोलभौतिकी इन सब विषयो से बहुत अधिक है। इस शृंखला को लिखने का यदि मुख्य उद्देश्य है। हम चाहते है कि आप इस क्षेत्र के इन गहरे विषयों को समझे, उन सिद्धांतो को समझे जिनके बारे मे अधिकतर लोग चर्चा नही करना चाहते है। हम अपने युवा मित्रो को बताते है कि यदि आपको खगोलभौतिक वैज्ञानिक बनना है तो आपको स्पेक्ट्रोस्कोपी(Spectroscopy), विद्युत गतिकी(Electrodynamics), सांख्ययिकीय यांत्रिकी(Statistical Mechanics), क्वांटम यांत्रिकी(Quantum Mechanics), प्रकाशिकी(Optics) और नाभिकिय भौतीकी(Nuclear Physics) मे महारत हासिल करना होगा।

मूल लेख : THE SPECTRAL CLASSIFICATION OF STARS

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



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Friday, 3 May 2019

खगोलभौतिकी मे परिमाण (MAGNITUDE) की अवधारणा

लेखक : ऋषभ

जब हम आकाश मे देखते है तो हम भिन्न आकाशीय पिंडो को देखते है। इनमे से कुछ(सूर्य और चंद्रमा) अत्याधिक चमकदार है जबकि कुछ अन्य(धुंधले तारे, निहारिका) नग्न आंखो से मुश्किल से ही दिखाई देते है। किसी पिंड की चमक बहुत से कारको पर निर्भर होती है। किसी पिंड से दूरी निश्चय ही एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन किसी पिंड की चमक मे उस के द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा की मात्रा का सबसे बड़ा योगदान होता है। इसका अर्थ यह है कि पिंडो को उनकी चमक के आधार पर वर्गीकरण की भी कोई अवधारणा अवश्य होगी। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के आंठवे लेख मे हम परिमाण(MAGNITUDE) की अवधारणा को जानेंगे।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

आगे बढ़ने से पहले हम इस तथ्य पर जोर डालना चाहेंगे कि परिमाण(MAGNITUDE) की अवधारणा महत्वपूर्ण है, यह ना केवल खगोलभौतिक विज्ञानियों के लिये महत्वपूर्ण है, साथ ही यह आकाश मे नजरे गढ़ाये रखने वाले शौकीया खगोलशास्त्रीयों के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस लेख मे हम खगोलशास्त्रीयों द्वारा प्रयुक्त परिंमाणो को जानेंगे ?

खगोलभौतिकी मे परिमाण(Magnitude) क्या है?

सामान्यत: परिमाण का अर्थ किसी चीज का संख्यात्मक मूल्य होता है। उदाहरण के लिये यदि हम 40 किमी/घंटा पूर्व की ओर गति की को लेते है। यह एक सदिश मूल्य है, इसमे परिमाण और दिशा दोनो है। गति का परिमाण 40 है और दिशा पूर्व की ओर है। लेकिन खगोलभौतिकी मे परिमाण की अवधारणा गति जैसी सदिश राशीयो से भिन्न है। खगोलभौतिकी मे परिमाण का अर्थ है किसी पिंड द्वारा संपूर्ण विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम मे कुल उत्सर्जित ऊर्जा का मूल्य। सरल शब्दो मे परिमाण का अर्थ किसी पिंड की चमक या दीप्ती होता है।

परिमाण के प्रकार

खगोल भौतिकी मे तीन मुख्य प्रकार के परिमाण होते है। हर प्रकार का अपना प्रयोग और महत्व है।

आभासी परिमाण/सापेक्ष कांतिमान (Apparent Magnitude)

किसी पिंड का सापेक्ष कांतिमान पृथ्वी से किसी पिंड की दिखाई देने वाली चमक/दीप्ती/कांति को परिभाषित करने वाली संख्या है, इसकी कोई इकाई नही है। सापेक्ष कान्तिमान को मापने के लिए यह शर्त होती है कि आकाश में कोई बादल, धूल, वगैरा न हो और वह वस्तु साफ़ देखी जा सके। इस अवधारणा को समझने के लिये हमे इतिहास मे झांकना होगा और इसकी जड़ो को खोजना होगा।

खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel)

खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel)

ईसा पूर्व दूसरी सदी मे हिप्पारकस(Hipparchus) ने तारों का उनकी चमक के आधार पर वर्गीकरण किया और उन्होने 1000 तारों को छः वर्गो मे बांटा। इसके वर्ग 1 मे सबसे चमकीले तारे थे, वर्ग 2 मे वर्ग एक से कम चमकीले तारे थे, और इस तरह चमक के घटते क्रम मे वर्ग छः मे सबसे धूंधले तारे थे। ईसा के बाद दूसरी सदी मे टालेमी(Ptolemy) मे इसी आधार पर तारों का अपना स्वयं का वर्गीकरण किया। 1830 मे खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel) ने पाया कि वर्ग 1 के तारे वर्ग 6 के तारों से 100 गुणा अधिक दीप्ती रखते है। 1856 मे एन आर पोगसन(N R Pogson) ने तारों की दीप्ती को मापने के लिये एक नया पैमाना बनाया जिसमे दो क्रमिक वर्ग के मध्य दीप्ती का अनुपार समान था।

इसका निश्कर्ष यह निकला कि प्रथम परिमाण वाले तारे द्वितिय परिमाण वाले तारों से 2.5 गुणा अधिक चमकदार है और यही अनुपात अगले क्रमिक वर्गो मे है। इस तरह से छठा वर्ग प्रथम वर्ग से 100 गुणा कम चमकदार है। 100 का पांचवा मूल 2.5 है। गणितिय रूप से यदि B(m) तथा B(n) दो तारों की दीप्ती है जिनका परिमाण m तथा n ( n>m ) है तो

B(m)/B(n) = (2.5) n-m

यह समीकरण एक महतपूर्ण तथ्य बताता है। इस समीकरण के अनुसार अधिक चमकदार पिंड का परिमाण उतना ही कम होगा। इसका अर्थ है कि -4 परिमाण वाले पिंड की दीप्ती +2 परिमाण वाले पिंड से अधिक होगी।
उदाहरण

सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान(आभासी परिमाण) -26.74 है और रात्रि आकाश मे सबसे अधिक चमकदार तारे का-1.74। अब इस समीकरण के अनुसार सूर्य रात्रि आकाश के सबसे अधिक चमकदार तारे(लुब्धक/सीरीअस) से 10 अरब गुणा अधिक दीप्तीमान है। निम्न चित्र इस अवधारणा को स्पष्ट करती है।

मानव आंखो
से दृष्य
सापेक्ष कांतिमान वेगा( Vega) के सापेक्ष दीप्ती सापेक्ष कांतिमान
से अधिक चमक वाले
तारों की संख्या
हाँ −1.0 251% 1 (Sirius)
0.0 100% 4
1.0 40% 15
2.0 16% 48
3.0 6.3% 171
4.0 2.5% 513
5.0 1.0% 1602
6.0 0.4% 4800
6.5 0.25% 9100[3]
नही 7.0 0.16% 14000
8.0 0.063% 42000
9.0 0.025% 121000
10.0 0.010% 340000

 

निरपेक्ष परिमाण(कांतिमान)/Absolute Magnitude

आभासी परिमाण/सापेक्ष कांतिमान उस पिंड की अपनी चमक या उस पिंड द्वारा प्रतिसेकंड उत्सर्जित कुल ऊर्जा पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त यह उस पिंड की दूरी पर भी निर्भर करता है। लेकिन खगोलीय पैमाने पर दूरी मे अत्याधिक परिवर्तन होता है जिससे किसी खगोलीय पिंड का निरपेक्ष परिमाण उस पिंड की वास्तविक चमक या दीप्ती नही दर्शाता है। उदाहरण के लिये सूर्य और लाल महादानव तारे बीटलगुज को लेते है। सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान -26.74 है जबकि बीटलगुज का +0.50। इसका अर्थ यह है कि उपरोक्त सूत्र के अनुसार सूर्य को बीटलगुज से 69 अरब गुणा अधिक चमकदार होना चाहीये। जबकि वास्तविकता यह है कि बीटलगुज सूर्य से 100,000 गुणा अधिक चमकदार है। इसलिये दीप्ती मापन के लिये एक नई पद्धिति निरपेक्ष परिमाण/कांतिमान(Absolute Magnitude) की आवश्यता महसूस हुई। निरपेक्ष कांतिमान किसी खगोलीय वस्तु के अपने चमकीलेपन को कहते हैं।

निरपेक्ष कांतिमान की अवधारणा मे हम खगोलीय पिंड की दूरी को एक मानक दूरी पर स्थिर कर देते है। यह चूनी हुई दूरी 10 पारसेक(32.6 प्रकाशवर्ष) है। किसी तारे के निरपेक्ष कांतिमान की बात हो रही हो तो यह देखा जाता है कि यदि देखने वाला उस तारे के ठीक 10 पारसैक की दूरी पर होता तो वह कितना चमकीला लगता। हम भिन्न खगोलीय पिंडो को इस दूरी पर रख कर उनकी दीप्ती के मध्य तुलना करते है।

गणितिय रूप से यदि m किसी पिंड का सापेक्ष कांतिमान है ,M उसका निरपेक्ष कांतिमान है तथा उसकी पृथ्वी से दूरी d हो तो,

m – M = 5 log (d) – 5

अवश्य पढ़े: खगोलीय दूरी मापन : खगोलीय इकाई(AU), प्रकाशवर्ष(Ly) और पारसेक(Parsec)

परिमाण m – M केवल दूरी पर निर्भर करता है इसलिये इसे दूरी माप(distance modulus) माप कहलाता है। यह सूत्र किसी पिंड के निरपेक्ष कांतिमान, सापेक्ष कांतिमान और हम से दूरी के मध्य के संबध को दर्शाता है।

अधिकतर तारों का निरपेक्ष कांतिमान -20 से + 10 के मध्य होता है। सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान +4.8 है जो उसे तारों की जनसंख्या मे एक औसत तारा बनाता है।

फोटोग्राफ़िक परिमाण(Photovisual Magnitude)

जब हम तारों को आंखो से देखते है तब उसका परिमाण दृश्य परिमाण होता है। लेकिन हमारी आंखो का दृष्टिपटल विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के एक बड़े भाग को महसूस नही कर पाता है। लेकिन एक तारे का चित्र हम अलग अलग फ़िल्टर लगा कर ले सकते है और इस तरह से प्राप्त परिमाण को हम फोटोग्राफ़िक परिमाण कहते है।

बोलोमेट्रीक परिमाण(Bolometric Magnitude)

अब तक हमने जितने भी परिमाणो की चर्चा की है वे खगोलीय वर्णक्रम के एक चुनिंदा भाग पर ही निर्भर करते है। किसी पिंड की दीप्ती को यदि विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के समस्त पट्टे पर मापा जाये तो प्राप्त परिमाण बोलोमेट्रीक परिमाण कहलाता है।

लेकिन हमारे पास कोई ऐसा अकेला उपकरण नही है जो खगोलीय वर्णक्रम के सभी भागो के लिये संवेदी हो जिससे किसी अन्य परिमाण को बोलोमेट्रीक परिमाण मे रूपांतरित करने कुछ सुधार करने होते है। विशेष रूप से बोलोमेट्रीक परिमाण और फोटोग्राफ़िक परिमाण के मध्य का अंतर बोलोमेंट्रीक सुधार (Bolometric correction (BC)) कहलाता है।

सूर्य का बोलोमेट्रिक सुधार -0.11 है (यह हमेशा ऋणात्मक होगा)। इस परिमाण का महत्व इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा। ग्वाला तारामंडल(Boötes constellation) मे एक महाकाय नारंगी स्वाति(Arcturus) तारा है। यह तारा सूर्य से 110 गुणा अधिक चमकदार है लेकिन अवरक्त(infrared) वर्णक्रम मे यह सूर्य से 180 गुणा अधिक चमकदार है। इसलिये स्वाति तारे का कुल (बोलोमेट्रीक) ऊर्जा उत्पादन उसके आभासी ऊर्जा उत्पादन से कहीं अधिक है।

लेखक का संदेश

सबसे पहले मै सभी पाठक को इस शृंखला के लिये दीये जा रहे उत्साहजनक प्रतिसाद के लिये धन्यवाद देता हुं। हमारी टीम की मेहनत के प्रतिफ़ल से हम खुश है। अब हम खगोलभौतिकी की अवधारणाओं मे गहरा गोता लगाने जा रहे है। अब तक हम इस क्षेत्र के मूलभूत उपकरणो और अवधारणाओं की जानकारी प्राप्त की है। खगोलभौतीकी मे परिमाण की अवधारणा समझना महत्वपूर्ण है। इसके बाद हम आने वाले लेखो मे तारकीय खगोलभौतिकी (Stellar Astrophysics) की यात्रा आरंभ करेंगे। यह एक खूबसूरत विषय है। अब हम देखेंगे कि तारो का जन्म कैसे होता है, उनका जीवन चक्र क्या होता है, उनकी संरचना कैसी होती है और उनकी मृत्यु किसी श्वेत वामन तारे, न्युट्रान तारे या ब्लैक होल के रूप मे कैसे होती है। इस लेख शृंखला से जुड़े रहीये, इस शृंखला मे बहुत कुछ बाकि है।

इस शृंखला मे इससे पहले : खगोलीय निर्देशांक प्रणाली(CELESTIAL COORDINATE SYSTEMS)
मूल लेख : UNDERSTANDING THE CONCEPT OF MAGNITUDE IN ASTROPHYSICS

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



from विज्ञान विश्व http://bit.ly/2DP26gO
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