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Thursday, 9 May 2019

खगोल भौतिकी 11 : तारों का वातावरण

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

अब तक आप तारों के वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण तथा साहा के प्रसिद्ध समीकरण को जान चुके है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के इस लेख मे हम आपको आसमान मे टिमटीमाते खूबसूरत तारों के वातावरण के बारे मे चर्चा करने जा रहे है। आयोनाइजेशन सिद्धांत के अनुसार हम यह जानने का प्रयास करते है कि तारकीय वातावरण मे होता क्या है ?

हम जानते है कि किसी तारे के वातावरण मे किसी विशिष्ट तत्व की उपस्थिति से उस तारे के वर्णक्रम मे कुछ विशिष्ट रेखाये बनकर उभरती है जो उपरोक्त चित्र मे स्पष्ट है। यह उस तारे की संरचना पर ही नही, उसके तारकीय तापमान पर भी निर्भर है। इस लेख मे हम जानने का प्रयास करेंगे कि आयोजाइजेशन सिद्धांत के प्रयोग से किस प्रकार खगोलभौतिकी वैज्ञानिक उस तारे की आंतरिक संरचना केवल उस तारे के वर्णक्रम को ही देखकर जान लेते है। हम यह भी देखेंगे कि तारों का वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(spectral classification) किस तरह से आयोनाइजेशन सिद्धांत पर आधारित है। सबसे पहले यह जानते है कि आयोनाइजेशन ऊर्जा(ionization energy) क्या है ?

आयोनाइजेशन ऊर्जा(ionization energy) क्या है ?

किसी धात्विक गैस के बाह्य इलेक्ट्रानो को परमाणु से हटाने के लिये लगने वाली न्यूनतम ऊर्जा आयोनाइजेशन ऊर्जा कहलाती है। कुछ तत्वो की आयोनाइजेशन ऊर्जा अधिक होती है, जबकी कुछ धातुओं की आयोनाइजेशन ऊर्जा कम होती है। नीचे दिया गया चित्र विभिन्न तत्वो की आयोनाइजेशन ऊर्जा मे विचलन को दर्शा रहा है।

आयोनाइजेशन सिद्धांत ने “कल्पना युग (age of imagination)” से “प्रायोगिक विज्ञान युग (age of experimental science)” की ओर जाने का का मार्ग प्रशस्त किया है। इस सिद्धांत ने ही हार्वर्ड वर्गीकरण के O से M वर्ग के वर्णक्रमों को वास्तविकता मे तापमान आधारित क्रम के रूप सिद्ध किया है। अब तारों की संरचना और तापमान को आयोनाइजेशन सिद्धांत के आधार पर देखते है। सबसे पहले तारो को दो श्रेणीयों मे विभाजित करते है और उनमे आयोनाइजेशन प्रक्रिया को समझते है।

कम तापमान वाले तारे(Low-Temperature Stars)

केवल शीतलतम तारे ही अणुओं(molecules) से संबधित वर्णक्रम पट्टा(spectral bands) बना सकते है। ये अणु हायड्रोकार्बन(CH), सायनोजेन(CN), कार्बन अणु, टाइटेनियन आक्साईड(TiO) इत्यादि हो सकते है। ये अणु केवल शीतलीकृत वातावरण मे ही टूटे बगैर रह सकते है। इसलिये लाल और पीले रंग के तारे जिनकी सतह पर तापमान कम होता है, इन अणुओं वाले वर्णक्रम पट्टे दिखाते है।

धातुओं की आयोनाइजेशन और उद्दीपन(excitation) ऊर्जा कम होती है। शीतल तारो मे इन धात्विक रेखाओं के उद्दीपन के लिये पर्याप्त ऊर्जा होती है। इसलिये कम तापमान वाले तारों के वर्णक्रम मे प्राकृतिक धातुओं को दर्शाने वाली रेखायें होती है।

उच्च तापमान वाले तारे(High-Temperature Stars)

अब हम कम तापमान वाले तारो से उच्च तापमान वाले तारों के वर्णक्रम की ओर जाते है। इनमे उदासीन धात्विक वर्णक्रम रेखाये कमजोर होते जाती है, जबकी आयनीकृत धात्विक रेखाये गहरी होते जाती है। इसके पीछे अधिक तापमान पर धातुओं का आंशिक रूप से आयनीकृत होना है। उदाहरण के लिये कैल्शीयम-I की वर्णक्रम रेखा शीतल M तारों मे दिखाई देती है, जबकि कैल्शीयम II की वर्णक्रम रेखा उष्ण K या G तारों मे पाई जाती है।

हिलियम रेखाओं के संबध मे हिलियम की आयोनाईजेशन ऊर्जा सर्वाधिक है। इसलिये हिलियम की वर्णक्रम रेखायें अत्याधिक तापमान वाले तारों मे ही दिखाई देती है। हिलियम I की रेखाये अत्याधिक उच्च तापमान वाले तारे जैसे वर्ग B के तारों मे ही दिखाई देती है।

उदासीन और आयोनाइज्ड हिलियम, आक्सीजन , कार्बन , नाइट्रोजन और नीआन की विभिन्न आयनोईजेशन अवस्थाओं वाली रेखा केवल O वर्ग के तारों मे दिखाई देती है।

लेखिका का संदेश

इससे पिछले और इस लेख का उद्देश्य तारकीय वातावरण का परिचय था। इसके पिछले वाले लेख मे हमने साहा समीकरण द्वारा ब्रह्माण्ड मे तारे के रहस्यो को तोड़ने मे महत्व को देखा था। तारकीय वातावरण मे शोध यह खगोलभौतिकी मे अधिक कार्य किया जाने वाला विषय है। यह एक विस्तृत विषय है और इसके लिये प्लाज्मा भौतिकी की जानकारी आवश्यक है। इस लेख मे हमने केवल तारे के वातावरण का परिचय देखा है। इस विषय पर चर्चा हम यहीं पर रोकेंगे और शृंखला मे आगे बढ़ेंगे। हम मानते है कि ये दो लेख कठीन और जटिल थे, लेकिन यह खगोलभौतिकी की रीढ़ है।

मूल लेख : THE ATMOSPHERE OF STARS

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)

संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



from विज्ञान विश्व http://bit.ly/2YcMg7E
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Tuesday, 7 May 2019

खगोल भौतिकी 10 : मेघनाद साहा का समीकरण और महत्व

लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के इस लेख मे हम आज एक आधारभूत गणितीय उपकरण की चर्चा करेंगे। इस उपकरण को साहा का समीकरण कहा जाता है। इस समीकरण ने खगोलभौतिकी की एक विशिष्ट शाखा की नींव रखी थी और यह प्लाज्मा के अध्ययन मे मील का पत्थर साबीत हुई है। लेखिका प्लाज्मा भौतिक वैज्ञानिक है, और इस लेख मे साहा के समीकरण और उसके इतिहास के बारे मे सहर्ष चर्चा कर रही है। चलीये साहा के समीकरण को समझते है और देखते है कि इस समीकरण ने तारों के वर्णक्रम के अध्ययन मे क्या भूमिका निभाई है।

संक्षिप्त इतिहास

1814 मे फ़्राउनहोफ़र रेखाओं की खोज ने तारों के वर्णक्रम के अध्ययन को जन्म दिया था। तारों का वर्णक्रम फ़्राउनहोफ़र वर्णक्रम के साधारण गुणधर्मो की व्याख्या करता है। सभी तारकीय(stellar) वर्णक्रम मे कुछ तत्वो की रेखाये अन्य तत्वो की रेखाओं की तुलना मे अधिक गहरी होती है। दिलचस्प रूप से उसी तत्व की रेखा की गहराई भिन्न तारों के वर्णक्रम मे सतत रूप से भिन्नता मे पाई जाती है।

यह भी पढ़े : विद्युत चुंबकीय (EM SPECTRUM) क्या है और वह खगोलभौतिकी (ASTROPHYSICS) मे महत्वपूर्ण उपकरण क्यों है ?

फ़्राउनहोफ़र रेखायें(The Fraunhofer Lines)

फ़्राउनहोफ़र रेखायें(The Fraunhofer Lines)

मेघनाद साहा

जिस समय परमाण्विक तथा विकिर्ण सिद्धांत अज्ञात था, खगोलभौतिक वैज्ञानिक वर्णक्रम रेखाओं मे भिन्नता को तारों के निर्माण के समय आरंभिक पदार्थ की संरचना मे भिन्नता का परिणाम मानते थे। लेकिन आज हम जानते है कि तारों के वर्णक्रम मे यह भिन्नता तापमान के अंतर के कारण है। इस लेख मे हम इतिहास मे झांखते हुये देखते है कि तारों के वर्णक्रम मे इस विविधता की पहेली को किस तरह एक भारतीय खगोलवैज्ञानिक मेघनाद साहा ने हल किया था।

1920 मे साहा के आयोनाइजेशन सिद्धांत ने बोह्र के परमाण्विक सिद्धांत के एक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग की व्याख्या की थी। आयनोनाईजेशन एक ऐसी स्तिथि है जिसमे किसी परमाणु केंद्रक के आसपास मंडराते इलेक्ट्रान इतनी ऊर्जा प्राप्त कर लेते है कि वे केंद्रक से अलग हो जाते है या बहुत ही कमजोर रूप से बंधे रहते है। साहा ने एक गणितिय सूत्र प्रस्तावित किया था जो कि यह दर्शाता था कि किसी तारे के वातावरण मे इलेक्ट्रानो का ऊर्जा प्राप्त करना और परमाणुओं का आयोनाइजेशन वास्तविकता मे तारों की संरचना के अतिरिक्त तापमान और दबाव पर भी निर्भर करता है। साहा के इस समीकरण ने खगोलभौतिकी की एक नई शाखा की नींव रखी थी जिसे तारकीय(stellar) स्पेक्ट्रोस्कोपी कहते है। अब हम साहा के प्रसिद्धा कार्य साहा आयोनाइजेशन समीकरण को देखते है।

साहा के समीकरण का अर्थ

साहा का समीकरण तारों के वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(spectral classification) की व्याख्या करने के लिये क्वांटम यांत्रिकी(quantum mechanics) और सांख्यकिय यांत्रिकी(statistical mechanics) के मिश्रण का प्रभावी परिणाम है। यह समीकरण बताता है कि उष्मीय संतुलन(thermal equilibrium) किसी गैस मे आयोनाइजेशन की दर उस गैस के दबाव और तापमान पर निर्भर करती है।

साहा का समीकरण

साहा का समीकरण

साहा का समीकरण

यह समीकरण दर्शा रहा है कि किसी गैस मे आयोनाईजेशन भिन्न भौतिक कारको पर निर्भर है और ये कारक है :

  • आयोनाइजेशन ऊर्जा(Ionization energy): जब किसी गैस के तापमान मे वृद्धि होती है, आयोनाइजेशन की डीग्री(degree of ionization) तब तक निम्न रहती है जब तक आयोनाइजेशन ऊर्जा के गैस के तापमान से अधिक ना हो जाये।(जो कि घातांकी(exponential ) कारक से स्पष्ट है।)
  • तापमान(Temperature): उष्मीय संतुलन मे किसी गैस की आयोनाइजेशन की डीग्री(degree of ionization) अर्थात आयन के जनघनत्व(number density) तथा उदासीन परमाणु के जनघनत्व का अनुपात तापमान मे वृद्धि के साथ अचानक बढती है। इस के बाद गैस प्लाज्मा अवस्था मे पहुंच जाती है जोकि आयन, इलेक्ट्रान और कुछ उदासीन परमाणूओ से बनी होती है।
  • आयन का जनघनत्व(number density) : जब कोई परमाणु आवेशित होता है, वह किसे इलेक्ट्रान से मिलकर फ़िर से उदासीन हो सकता है। इसलिये जैसे ही इलेक्ट्रान की संख्या बढ़ती है, आयोनाइजेशन अनुपात कम होता है। सबसे सरल हायड्रोजन प्लाज्मा मे इलेक्ट्रान की संख्या और आयन की संख्या समान मानी जाती है। इसलिये जब प्लाज्मा मे आयन का जनघनत्व बढ़ता है, आयन के उदासीन होने की दर भी बढ़ती है। इससे आयोनाइजेशन अनुपात मे कमी होती है।
  • अब इस समीकरण का भौतिक महत्व समझने का प्रयास करते है।

साहा ने निर्देशित किया था कि किसी गैस की आयोनाइजेशन की डीग्री मे दबाव का अत्याधिक प्रभाव रहता है। इस तथ्य को इससे पहले नही माना गया था। उन्होने 1921 मे जब अपना शोधपत्र रायल सोसायटी मे प्रकाशित किया। इस शोधपत्र मे उन्होने इस सिध्दांत की सहायता से तारकीय वर्णक्रम की व्याख्या की थी। उन्ही के शब्दो मे

जब हम किसी तारे को हायड्रोजन, हिलियम या कार्बन तारा कहते है और यह कहने का प्रयास कर रहे होते है कि ये तत्व किसी तारे के मुख्य घटक है तब हम उन तारों के साथ न्याय नही कर रहे होते है। जबकि सही निष्कर्ष यह है कि उस तारे के वातावरण मे उपस्थित उद्दीपन कारको के प्रभाव मे विशिष्ट तत्व या एकाधिक तत्व उत्तेजित अवस्था मे होते है और अपनी गुणधर्म वाली वर्णक्रम रेखा से उपस्थिति दर्शाते है, जबकि अन्य तत्व या तो आयन अवस्था मे होते है या उद्दीपन इतना कम होता है कि उन तत्वो को पहचानने वाली गुणधर्म रेखा नही बन पाती है।
We are not justified in speaking of a star as a hydrogen, helium or carbon star, thereby suggesting that these elements for the chief ingredients in the chemical composition of the star. The proper conclusion would be that under the stimulus prevailing in the star, the particular element or elements are excited by radiation of their characteristic lines, while other elements are either ionized or the stimulus is too weak to excite the lines by which we can detect the element.

साहा का समीकरण यह भी दर्शाता है कि कोई गैस प्लाज्मा अवस्था अत्याधिक तापमान तथा आवेशित कणो के कम जनघनत्व पर प्राप्त करती है। इसी कारण से प्लाज्मा प्राक्रुतिक रूप से खगोलीय पिंडो मे पाई जाती है जिनपर तापमान लाखों डीग्री तथा परमाणुओं का जनघनत्व 1 परमाणु प्रति घन सेमी होता है। अपनी इस प्राकृतिक उपस्थिति के कारण प्लाज्मा को पदार्थ की चतुर्थ अवस्था माना जाता है।

लेखिका का संदेश

लेखिका प्लाज्मा भौतिकी वैज्ञानिक है और वे मानती है कि तारकीय वातावरण मे शोध, खगोलभौतिकी मे लोकप्रिय और सक्रिय विषयो मे से एक है। किसी तारे का वर्णकम वास्तविकता मे अत्याधिक सूचना प्रदान कर देता है जोकि किसी खगोलभौतिक वैज्ञानिक के लिये ब्रह्मांड के रहस्यो को खोलने मे अत्यावश्यक है। इस लेख के साथ हमने इस शृंखला का एक तिहाई भाग देख लिया है। अगले लेख मे हम किसी तारे के वातावरण और खगोलभौतिकी के आयोनाइजेशन सिद्धांतों के महत्व को और विस्तार से देखेंगे। उसके पश्चात हम अपने सबसे समीप के और सर्वाधिक शोध किये गये तारे की आधारभूत संरचना को देखेंगे, यह तारा है : हमारा अपना सूर्य।

मूल लेख : SAHA’S EQUATION AND ITS IMPORTANCE

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)
संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.



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Monday, 6 May 2019

तारों का वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण (SPECTRAL CLASSIFICATION)

लेखक : ऋषभ

यह लेख ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला मे नंवा लेख है और अब तक की यात्रा रोचक रही है। हमने एक सरल प्रश्न से आरंभ किया था कि खगोलभौतिकी क्या है? इसके पश्चात हमने इस क्षेत्र मे प्रयुक्त होने आधारभूत उपकरणो और तकनीकी शब्दो, दूरी की इकाईयों, खगोलीय निर्देशांक प्रणाली, परिमाण(magnitud) की अवधारणा, विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम का महत्व तथा लाल विचलन(redshifts) के प्रकारों को समझा। अब हम इस विषय की गहराईयों के गोता लगाने के लिये तैयार है और अब हम समझेंगे कि ब्रह्मांड कैसे कार्य करता है। इस लेख मे हम तारकीय खगोलभौतिकी(Stellar Astrophysics) की यात्रा आरंभ करेंगे जो कि खगोलशास्त्र मे सबसे ज्यादा अध्ययन कीया जाने वाला विषय है। इस नवम लेख मे हम समझेंगे कि ब्रह्मांड के अरबो खरबो तारों को हम केवल सात वर्गो मे समेट लेते है, अर्थात तारों का वर्गीकरण कैसे होता है।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

यूरोपीयन अंतरिक्ष संस्थान (European Space Agency (ESA)) के अनुसार ब्रह्मांड मे लगभग 1 ट्रिलियन ट्रिलियन(1024) तारे है। यह एक ऐसी संख्या है जिसका मानव की तकनीकी क्षमता मे बढ़ोत्तरी और गहन अंतरिक्ष मे अन्वेषण के साथ बढ़ना तय है। लेकिन क्या हमारे पास इन ब्रह्माण्ड के इन तारों के वर्गीकरण की कोई प्रणाली है ? इसका उत्तर है हाँ मे है! मार्गन कीनन वर्ग्रीकरण प्रणाली(The Morgan Keenan Classification System) जो कि पुरानी वर्गीकरण प्रणाली हार्वर्ड प्रणाली(Harvard System) तथा येर्कीस प्रणाली(Yerkes System) का संगम है। इन प्रणालीयों को विस्तार से देखते है।

तारों का वर्णक्रम के आधार पर वर्गीकरण

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली एक विमा वाली वर्गीकरण प्रणाली है जिसमे तारों को सात मुख्य वर्गो मे वर्णक्रम के आधार पर रखा जाता है। यह वर्गीकरण तारे की सतह के तापमान पर आधारित है। इसके सात वर्ग सात अल्फ़ाबेट से निर्देशित होते है जो कि उष्ण से शीतलता की ओर है, O, B, A, F, G, K तथा M। O वर्ग का तारा उष्णतम होता है जिसकी सतह का तापमान लगभग 50,000 K होता है जबकि एक M वर्ग का तारा शीतलतम होता है जिसकी सतह का तापमान केवल2,500 K होता है। इन तारो का रंग भी उनके सतह के तापमान के अनुसार होता है जोकि नीचे दिये चित्र मे दर्शाया गया है।

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

हार्वर्ड वर्गीकरण प्रणाली(Harvard Classification System)

इस वर्गीकरण को याद रखने का सबसे आसान उपाय नीचे दिया गया सूत्र है।

Oh Boy, A Funny Girl Kicked Me.

इस वर्गीकरण मे हर वर्ग से संबधित तापमान सीमाये नीचे दी है।

  • O: ≥ 30,000 K
  • B: 10,000–30,000 K
  • A: 7,500–10,000 K
  • F: 6,000–7,500 K
  • G: 5,200–6,000 K
  • K: 3,700-5200 K
  • M: 2,400–3,700 K

 

वर्ग प्रभावी तापमान औपचारिक रंग आभासी रंग मुख्य अनुक्रम द्रव्यमान
(सौर द्रव्यमान)
मुख्य अनुक्रम्र त्रिज्या(सौर त्रिज्या) मुख्य अनुक्रम दीप्ती(बोलोमेट्रीक) हाइड्रोजन रेखायें मुख्य अनुक्रम का अनुपात]
O ≥ 30,000 K नीला नीला ≥ 16 M☉ ≥ 6.6 R☉ ≥ 30,000 L☉ कमजोर ~0.00003%
B 10,000–30,000 K नीला श्वेत गहरा नीला श्वेत 2.1–16 M☉ 1.8–6.6 R☉ 25–30,000 L☉ मध्यम 0.13%
A 7,500–10,000 K श्वेत नीला श्वेत 1.4–2.1 M☉ 1.4–1.8 R☉ 5–25 L☉ मजबूत 0.6%
F 6,000–7,500 K पीला श्वेत श्वेत 1.04–1.4 M☉ 1.15–1.4 R☉ 1.5–5 L☉ मध्यम 3%
G 5,200–6,000 K पीला पीलापन लिये श्वेत 0.8–1.04 M☉ 0.96–1.15 R☉ 0.6–1.5 L☉ कमजोर 7.6%
K 3,700–5,200 K हल्का संतरा हल्का पीला संतरा 0.45–0.8 M☉ 0.7–0.96 R☉ 0.08–0.6 L☉ बहुत कमजोर 12.1%
M 2,400–3,700 K संतरा लाल हल्का संतरा लाल 0.08–0.45 M☉ ≤ 0.7 R☉ ≤ 0.08 L☉ बहुत कमजोर 76.45%

अब इन मुख्य वर्गो के अंदर दस उपवर्ग है जिन्हे 0-9 से निर्देशित किया जाता है। इसमे भी छोटी संख्या अधिक तापमान को दर्शाती है। इसलिये K0 वर्ग का तारा K7 तारे से उष्ण होता है। खगोलशास्त्र मे औपचारिक रंहो का प्रयोग परम्परागत है और ये रंग A वर्ग के तारों के रंग के सापेक्ष होते है जिसे श्वेत माना जाता है। इन आभासी रंग का निर्धारण का आधार किसी निरीक्षक द्वारा गहरे आकाश मे नंगी आंखो से तारे के निरीक्षण मे दिखाई देने वाले रंग पर है।

येरकिस वर्गीकरण प्रणाली(Yerkes Classification System)

किसी तारे को उसकी सतह के तापमान के आधार पर एक अल्फ़ाबेट वर्ग दे देना काफ़ी नही है। तारे विभिन्न आकारों मे आते है और वे अपने जीवन के विभिन्न चरणो मे होते है। इसमे मुख्य अनुक्रम(Main Sequences) के तारे होते है जो अब भी अपने केंद्रक मे हाईड्रोजन के संलयन से हिलियम का निर्माण कर रहे होते है और दूसरी ओर श्वेत वामन होते है जिनका जीवन समाप्त हो चुका होता है। इसलिये हमे इनके वर्गीकरण के लिये एक और कारक चाहीये होता है, यह कारक है उनकी दीप्ती।

खगोलभौतिकी मे दीप्ती का अर्थ प्रति सेकंड कुल ऊर्जा का उत्पादन होता है। घने तारे जिनकी अधिक सतह पर अधिक गुरुत्वाकर्षण होता है, उनके वर्णक्रम मे की गहरी रेखाये गुरुत्विय दबाव मे अधिक फ़ैली होती है। किसी महाकाय तारे की सतह पर श्वेत वामन तारे की तुलना मे गुरुत्वाकर्षण कम होता है जिससे उत्पन्न दबाव भी कम होता है। ऐसा इसलिये कि समान द्रव्यमान वाले महाकाय(giant) तारे की त्रिज्या वामन(dwarf) तारे से अधिक होती है। इसलिये वर्णक्रम मे अंतर को दीप्ती के प्रभाव को माना जा सकता है और तारे को उसके वर्णक्रम के विश्लेषण के आधार पर एक दीप्ती वर्ग(luminosity class) दिया जा सकता है। दीप्ती वर्ग(luminosity class) और उसका विवरण नीचे दिया है :

  • 0 or Ia(+): अतिमहादानव (hypergiants) या अत्याधिक चमकीले महाकाय तारे(super giants)
  • Ia: दीप्तीमान महादानव(supergiants)
  • Iab: मध्यम आकार वाले दीप्तीमान महादानव(intermediate-size luminous supergiants)
  • Ib: निम्न दीप्तीमान महादानव(less luminous supergiants)
  • II: दीप्तीमान दानव( giants)
  • III: सामान्य दानव( giants)
  • IV: अर्धदानव(subgiants)
  • V: मुख्य अनुक्रम(Main Sequence)
  • sd: अर्धवामन(sub-dwarfs)
  • D: श्वेत वामन

यह वर्गीकरण तारे के वर्णक्रम के आधार पर है। इस शृंखला के दूसरे लेख मे हमने कहा था कि

“किसी खगोलवैज्ञानिक के हाथो मे ब्रह्मांड के रहस्यो को अनावृत्त करने के लिये विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है।”

अब आप इस वाक्य को प्रयोग मे देख सकते है ।

मार्गन कीनन वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण(Morgan Keenan Spectral Classification of Stars)

यह वर्गीकरण हार्वर्ड प्रणाली और येरेकेस दीप्ती वर्गीकरण प्रणाली का समिश्रण है और मार्गन कीनन वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण वर्तमान मे सबसे अधिक प्रयुक्त प्रणाली है। इसमे हर तारे को उसकी सतह के तापमान के आधार पर वर्णक्रम वर्ग (spectral class) तथा उसकी दीप्ती(सतह के गुरुत्वाकर्षण) के आधार पर दीप्ती वर्ग(luminosity class) दिया जाता है। हमारा सूर्य इस वर्गीकरण के आधार G2V वर्ग का है। इसकी सतह का तापमान 5,900 K (G वर्ग) तथा यह वर्तमान मे हायड्रोजन के संलयन से हिलियम बना रहा है अर्थात मुख्य अनुक्रम (V) का तारा है। मार्गन कीनन से ब्रह्माण्ड के सभी तारो को एक ही चित्र मे समेटा जा सकता है जिसे हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell) चित्र कहते है।

हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell)

हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell)

लेखक का संदेश

तारों का वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण और हर्टजस्प्रंग रस्सेल(Hertzsprung Russell) चित्र तारकीय खगोलभौतीकी(Stellar Astrophysics) की आधारभूत अवधारणा है। तारों की समस्त कहानी इन्ही दो अवधारणाओं के आसपास घूमती है। यह लेख तारकीय खगोलभौतिकी को समझने मे काफ़ी महत्वपूर्ण है। वर्तमान मे खगोलभौतिकी के नाम पर अधिकतर लोग वर्महोल से यात्रा, ब्लैक होल, श्वेत विवर(white hole), समय यात्रा , श्याम पदार्थ(dark matter) की ही बात करते है। लेकिन वास्तविकता मे, खगोलभौतिकी इन सब विषयो से बहुत अधिक है। इस शृंखला को लिखने का यदि मुख्य उद्देश्य है। हम चाहते है कि आप इस क्षेत्र के इन गहरे विषयों को समझे, उन सिद्धांतो को समझे जिनके बारे मे अधिकतर लोग चर्चा नही करना चाहते है। हम अपने युवा मित्रो को बताते है कि यदि आपको खगोलभौतिक वैज्ञानिक बनना है तो आपको स्पेक्ट्रोस्कोपी(Spectroscopy), विद्युत गतिकी(Electrodynamics), सांख्ययिकीय यांत्रिकी(Statistical Mechanics), क्वांटम यांत्रिकी(Quantum Mechanics), प्रकाशिकी(Optics) और नाभिकिय भौतीकी(Nuclear Physics) मे महारत हासिल करना होगा।

मूल लेख : THE SPECTRAL CLASSIFICATION OF STARS

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



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Friday, 3 May 2019

खगोलभौतिकी मे परिमाण (MAGNITUDE) की अवधारणा

लेखक : ऋषभ

जब हम आकाश मे देखते है तो हम भिन्न आकाशीय पिंडो को देखते है। इनमे से कुछ(सूर्य और चंद्रमा) अत्याधिक चमकदार है जबकि कुछ अन्य(धुंधले तारे, निहारिका) नग्न आंखो से मुश्किल से ही दिखाई देते है। किसी पिंड की चमक बहुत से कारको पर निर्भर होती है। किसी पिंड से दूरी निश्चय ही एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन किसी पिंड की चमक मे उस के द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा की मात्रा का सबसे बड़ा योगदान होता है। इसका अर्थ यह है कि पिंडो को उनकी चमक के आधार पर वर्गीकरण की भी कोई अवधारणा अवश्य होगी। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के आंठवे लेख मे हम परिमाण(MAGNITUDE) की अवधारणा को जानेंगे।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

आगे बढ़ने से पहले हम इस तथ्य पर जोर डालना चाहेंगे कि परिमाण(MAGNITUDE) की अवधारणा महत्वपूर्ण है, यह ना केवल खगोलभौतिक विज्ञानियों के लिये महत्वपूर्ण है, साथ ही यह आकाश मे नजरे गढ़ाये रखने वाले शौकीया खगोलशास्त्रीयों के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस लेख मे हम खगोलशास्त्रीयों द्वारा प्रयुक्त परिंमाणो को जानेंगे ?

खगोलभौतिकी मे परिमाण(Magnitude) क्या है?

सामान्यत: परिमाण का अर्थ किसी चीज का संख्यात्मक मूल्य होता है। उदाहरण के लिये यदि हम 40 किमी/घंटा पूर्व की ओर गति की को लेते है। यह एक सदिश मूल्य है, इसमे परिमाण और दिशा दोनो है। गति का परिमाण 40 है और दिशा पूर्व की ओर है। लेकिन खगोलभौतिकी मे परिमाण की अवधारणा गति जैसी सदिश राशीयो से भिन्न है। खगोलभौतिकी मे परिमाण का अर्थ है किसी पिंड द्वारा संपूर्ण विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम मे कुल उत्सर्जित ऊर्जा का मूल्य। सरल शब्दो मे परिमाण का अर्थ किसी पिंड की चमक या दीप्ती होता है।

परिमाण के प्रकार

खगोल भौतिकी मे तीन मुख्य प्रकार के परिमाण होते है। हर प्रकार का अपना प्रयोग और महत्व है।

आभासी परिमाण/सापेक्ष कांतिमान (Apparent Magnitude)

किसी पिंड का सापेक्ष कांतिमान पृथ्वी से किसी पिंड की दिखाई देने वाली चमक/दीप्ती/कांति को परिभाषित करने वाली संख्या है, इसकी कोई इकाई नही है। सापेक्ष कान्तिमान को मापने के लिए यह शर्त होती है कि आकाश में कोई बादल, धूल, वगैरा न हो और वह वस्तु साफ़ देखी जा सके। इस अवधारणा को समझने के लिये हमे इतिहास मे झांकना होगा और इसकी जड़ो को खोजना होगा।

खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel)

खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel)

ईसा पूर्व दूसरी सदी मे हिप्पारकस(Hipparchus) ने तारों का उनकी चमक के आधार पर वर्गीकरण किया और उन्होने 1000 तारों को छः वर्गो मे बांटा। इसके वर्ग 1 मे सबसे चमकीले तारे थे, वर्ग 2 मे वर्ग एक से कम चमकीले तारे थे, और इस तरह चमक के घटते क्रम मे वर्ग छः मे सबसे धूंधले तारे थे। ईसा के बाद दूसरी सदी मे टालेमी(Ptolemy) मे इसी आधार पर तारों का अपना स्वयं का वर्गीकरण किया। 1830 मे खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल( William Herschel) ने पाया कि वर्ग 1 के तारे वर्ग 6 के तारों से 100 गुणा अधिक दीप्ती रखते है। 1856 मे एन आर पोगसन(N R Pogson) ने तारों की दीप्ती को मापने के लिये एक नया पैमाना बनाया जिसमे दो क्रमिक वर्ग के मध्य दीप्ती का अनुपार समान था।

इसका निश्कर्ष यह निकला कि प्रथम परिमाण वाले तारे द्वितिय परिमाण वाले तारों से 2.5 गुणा अधिक चमकदार है और यही अनुपात अगले क्रमिक वर्गो मे है। इस तरह से छठा वर्ग प्रथम वर्ग से 100 गुणा कम चमकदार है। 100 का पांचवा मूल 2.5 है। गणितिय रूप से यदि B(m) तथा B(n) दो तारों की दीप्ती है जिनका परिमाण m तथा n ( n>m ) है तो

B(m)/B(n) = (2.5) n-m

यह समीकरण एक महतपूर्ण तथ्य बताता है। इस समीकरण के अनुसार अधिक चमकदार पिंड का परिमाण उतना ही कम होगा। इसका अर्थ है कि -4 परिमाण वाले पिंड की दीप्ती +2 परिमाण वाले पिंड से अधिक होगी।
उदाहरण

सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान(आभासी परिमाण) -26.74 है और रात्रि आकाश मे सबसे अधिक चमकदार तारे का-1.74। अब इस समीकरण के अनुसार सूर्य रात्रि आकाश के सबसे अधिक चमकदार तारे(लुब्धक/सीरीअस) से 10 अरब गुणा अधिक दीप्तीमान है। निम्न चित्र इस अवधारणा को स्पष्ट करती है।

मानव आंखो
से दृष्य
सापेक्ष कांतिमान वेगा( Vega) के सापेक्ष दीप्ती सापेक्ष कांतिमान
से अधिक चमक वाले
तारों की संख्या
हाँ −1.0 251% 1 (Sirius)
0.0 100% 4
1.0 40% 15
2.0 16% 48
3.0 6.3% 171
4.0 2.5% 513
5.0 1.0% 1602
6.0 0.4% 4800
6.5 0.25% 9100[3]
नही 7.0 0.16% 14000
8.0 0.063% 42000
9.0 0.025% 121000
10.0 0.010% 340000

 

निरपेक्ष परिमाण(कांतिमान)/Absolute Magnitude

आभासी परिमाण/सापेक्ष कांतिमान उस पिंड की अपनी चमक या उस पिंड द्वारा प्रतिसेकंड उत्सर्जित कुल ऊर्जा पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त यह उस पिंड की दूरी पर भी निर्भर करता है। लेकिन खगोलीय पैमाने पर दूरी मे अत्याधिक परिवर्तन होता है जिससे किसी खगोलीय पिंड का निरपेक्ष परिमाण उस पिंड की वास्तविक चमक या दीप्ती नही दर्शाता है। उदाहरण के लिये सूर्य और लाल महादानव तारे बीटलगुज को लेते है। सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान -26.74 है जबकि बीटलगुज का +0.50। इसका अर्थ यह है कि उपरोक्त सूत्र के अनुसार सूर्य को बीटलगुज से 69 अरब गुणा अधिक चमकदार होना चाहीये। जबकि वास्तविकता यह है कि बीटलगुज सूर्य से 100,000 गुणा अधिक चमकदार है। इसलिये दीप्ती मापन के लिये एक नई पद्धिति निरपेक्ष परिमाण/कांतिमान(Absolute Magnitude) की आवश्यता महसूस हुई। निरपेक्ष कांतिमान किसी खगोलीय वस्तु के अपने चमकीलेपन को कहते हैं।

निरपेक्ष कांतिमान की अवधारणा मे हम खगोलीय पिंड की दूरी को एक मानक दूरी पर स्थिर कर देते है। यह चूनी हुई दूरी 10 पारसेक(32.6 प्रकाशवर्ष) है। किसी तारे के निरपेक्ष कांतिमान की बात हो रही हो तो यह देखा जाता है कि यदि देखने वाला उस तारे के ठीक 10 पारसैक की दूरी पर होता तो वह कितना चमकीला लगता। हम भिन्न खगोलीय पिंडो को इस दूरी पर रख कर उनकी दीप्ती के मध्य तुलना करते है।

गणितिय रूप से यदि m किसी पिंड का सापेक्ष कांतिमान है ,M उसका निरपेक्ष कांतिमान है तथा उसकी पृथ्वी से दूरी d हो तो,

m – M = 5 log (d) – 5

अवश्य पढ़े: खगोलीय दूरी मापन : खगोलीय इकाई(AU), प्रकाशवर्ष(Ly) और पारसेक(Parsec)

परिमाण m – M केवल दूरी पर निर्भर करता है इसलिये इसे दूरी माप(distance modulus) माप कहलाता है। यह सूत्र किसी पिंड के निरपेक्ष कांतिमान, सापेक्ष कांतिमान और हम से दूरी के मध्य के संबध को दर्शाता है।

अधिकतर तारों का निरपेक्ष कांतिमान -20 से + 10 के मध्य होता है। सूर्य का निरपेक्ष कांतिमान +4.8 है जो उसे तारों की जनसंख्या मे एक औसत तारा बनाता है।

फोटोग्राफ़िक परिमाण(Photovisual Magnitude)

जब हम तारों को आंखो से देखते है तब उसका परिमाण दृश्य परिमाण होता है। लेकिन हमारी आंखो का दृष्टिपटल विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के एक बड़े भाग को महसूस नही कर पाता है। लेकिन एक तारे का चित्र हम अलग अलग फ़िल्टर लगा कर ले सकते है और इस तरह से प्राप्त परिमाण को हम फोटोग्राफ़िक परिमाण कहते है।

बोलोमेट्रीक परिमाण(Bolometric Magnitude)

अब तक हमने जितने भी परिमाणो की चर्चा की है वे खगोलीय वर्णक्रम के एक चुनिंदा भाग पर ही निर्भर करते है। किसी पिंड की दीप्ती को यदि विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के समस्त पट्टे पर मापा जाये तो प्राप्त परिमाण बोलोमेट्रीक परिमाण कहलाता है।

लेकिन हमारे पास कोई ऐसा अकेला उपकरण नही है जो खगोलीय वर्णक्रम के सभी भागो के लिये संवेदी हो जिससे किसी अन्य परिमाण को बोलोमेट्रीक परिमाण मे रूपांतरित करने कुछ सुधार करने होते है। विशेष रूप से बोलोमेट्रीक परिमाण और फोटोग्राफ़िक परिमाण के मध्य का अंतर बोलोमेंट्रीक सुधार (Bolometric correction (BC)) कहलाता है।

सूर्य का बोलोमेट्रिक सुधार -0.11 है (यह हमेशा ऋणात्मक होगा)। इस परिमाण का महत्व इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा। ग्वाला तारामंडल(Boötes constellation) मे एक महाकाय नारंगी स्वाति(Arcturus) तारा है। यह तारा सूर्य से 110 गुणा अधिक चमकदार है लेकिन अवरक्त(infrared) वर्णक्रम मे यह सूर्य से 180 गुणा अधिक चमकदार है। इसलिये स्वाति तारे का कुल (बोलोमेट्रीक) ऊर्जा उत्पादन उसके आभासी ऊर्जा उत्पादन से कहीं अधिक है।

लेखक का संदेश

सबसे पहले मै सभी पाठक को इस शृंखला के लिये दीये जा रहे उत्साहजनक प्रतिसाद के लिये धन्यवाद देता हुं। हमारी टीम की मेहनत के प्रतिफ़ल से हम खुश है। अब हम खगोलभौतिकी की अवधारणाओं मे गहरा गोता लगाने जा रहे है। अब तक हम इस क्षेत्र के मूलभूत उपकरणो और अवधारणाओं की जानकारी प्राप्त की है। खगोलभौतीकी मे परिमाण की अवधारणा समझना महत्वपूर्ण है। इसके बाद हम आने वाले लेखो मे तारकीय खगोलभौतिकी (Stellar Astrophysics) की यात्रा आरंभ करेंगे। यह एक खूबसूरत विषय है। अब हम देखेंगे कि तारो का जन्म कैसे होता है, उनका जीवन चक्र क्या होता है, उनकी संरचना कैसी होती है और उनकी मृत्यु किसी श्वेत वामन तारे, न्युट्रान तारे या ब्लैक होल के रूप मे कैसे होती है। इस लेख शृंखला से जुड़े रहीये, इस शृंखला मे बहुत कुछ बाकि है।

इस शृंखला मे इससे पहले : खगोलीय निर्देशांक प्रणाली(CELESTIAL COORDINATE SYSTEMS)
मूल लेख : UNDERSTANDING THE CONCEPT OF MAGNITUDE IN ASTROPHYSICS

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



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Wednesday, 1 May 2019

खगोलीय निर्देशांक प्रणाली(CELESTIAL COORDINATE SYSTEMS)

लेखिका:  सिमरनप्रीत (Simranpreet Buttar)

यदि आप कहीं जा रहे हों तो वहाँ पहुंचने के लिये आपके लिये क्या जानना सबसे महत्वपूर्ण क्या होगा ? उस स्थल का पता! खगोलभौतिकी मे हमे किसी भी पिंड की जानकारी ज्ञात करने के लिये, उस पिंड पर अपने उपकरणो को फ़ोकस करने के लिये हमे उस पिंड की स्थिति की जानकारी चाहीये। पृथ्वी पर किसी भी जगह की स्थिति जानने के निये हमे दो भौगोलिक निर्देशांक चाहीये होते है, जिन्हे हम अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) निर्देशांक (coordinates)कहते है। अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) निर्देशांक से हम पृथ्वी की सतह पर के किसी भी स्थल तक पहुंच सकते है। लेकिन यदि हमे गहन अंतरिक्ष मे किसी पिंड की स्तिथी जाननी हो तो ? इसके लिये हमे खगोलिय निर्देशांक प्रणाली(celestial coordinate) चाहीये।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

पृथ्वी पर हम अक्षांश और देशांतर से हम शहर, कस्बा और पर्वत जैसे स्थलो को खोज लेते है। इसी तरह से अंतरिक्ष मे किसी पिंड को खोजने के लिये खगोलिय निर्देशांक प्रणाली प्रयुक्त होती है। खगोलीय निर्देशांक प्रणाली खगोलशास्त्र और खगोलभौतिकी मे कई स्थानो पर प्रयोग की जाती है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के सांतवे लेख मे हम भिन्न खगोलीय निर्देशांक प्रणालीयों के बारे मे जानेंगे।

खगोलीय गोला(Celestial Sphere) क्या है ?

खगोलीय निर्देशांक प्रणाली को समझने से पहले हमे खगोलीय गोला(Celestial Sphere) समझना होगा। जब भी हम उपर अंतरिक्ष मे देखते है तो सारे खगोलीय पिंड किसी विशालकाय काल्पनिक गोले की आंतरिक सतह पर दिखाई देते है, इस काल्पनिक गोले के केंद्र मे हम होते है। यह किसी प्लेनेटेरियम के डोम की छत पर चिपके कृत्रिम तारों के जैसे ही दिखाई देता है। यह विशाल काल्पनिक गोला ही खगोलीय गोला है।

खगोलीय गोला(Celestial Sphere)

खगोलीय गोला(Celestial Sphere)

अब आप निरीक्षक के उपर और नीचे की दिशा मे एक सीधी रेखा खींचे। यह रेखा इस खगोलीय गोले से दो बिंदुओं पर मिलेगी। निरीक्षक के सर के उपर वाला बिंदु शिरोबिंदु(Zenith) तथा नीचे वाला बिंदु अधोबिंदु(Nadir) कहलाता है। शिरोबिंदु और अधोबिंदु को जोड़ने वाली रेखा पर लंबवत प्रतल खगोलीय गोले को एक वृत्त के रूप मे काटता है, यह महाकाय वृत्त खगोलीय क्षितिज( Celestial horizon)कहलाता है)

विस्तृत खगोलीय गोला(Celestial Sphere)

विस्तृत खगोलीय गोला(Celestial Sphere)

अब निरीक्षक को पार करती हुई पृथ्वी के घूर्णन अक्ष(rotational axis) के समांतर एक रेखा खींचीये, यह रेखा भी खगोलीय गोले से दो बिंदुओं पर मिलेगी। क्षितिज के उपर वाला कटाव बिंदु उत्तरी खगोलीय बिंदु(North Celestial point) तथा नीचे वाला दक्षिणी खगोलीय बिंदु कहलाता है। दोनो बिंदुओ को अपने ध्रुव पर समाविष्ट करने वला महा वृत्त खगोलीय विषुवत(celestial equator) कहलाता है। पृथ्वी के विषुवत का प्रतल(plane) तथा खगोलीय विषुवत का प्रतल समान है। शिरोबिंदु, अधोबिंदु तथा खगोलीय ध्रुवों से गुजरने वाला महाकाय वृत्त मध्याह्न(Meridian) वृत्त कहलाता है।

संपूर्ण वर्ष मे सूर्य के आभासी पथ के द्वारा बनने वाला महाकाय वृत्त क्रांतिवृत्त(ecliptic) कहलाता है। क्रांतिवृत्त विषुवत को दो बिंदुओ पर काटता है जिसे विषुव बिंदु(equinoctial) कहते है। जब सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हुये विषुवत को जिस बिंदु पर काटता है उसे मेष की प्रथम बिंदु(First Point of Aries) कहते है। विषुवत को काटने वाला दूसर बिंदु तुला का प्रथम बिंदु (First point of Libra)कहते है।

तीन भिन्न खगोलीय निर्देशांक प्रणालीयाँ

अब हम तीन भिन्न निर्देशांक प्रणाली समझने की स्थिति मे हैं।

क्षैतिज निर्देशांक प्रणाली(उन्नतांश तथा दिगंश (Altitude and Azimuth))

मान लिजिये शिरोबिंदु Z है तथा A किसी तारे की स्तिथि है। अब यदि हम एक वृत्त ZAX बनाये तब खगोलीय गोले मे इस तारे की स्थिति को हम चाप(arc) NX, चाप ZA या चाप ZA तथा कोण NZA से परिभाषित कर सकते है। महा वृत्त ZAX का चाप AX उस तारे की क्षितिज से कोणीय दूरी(angular distance) दिखा रहा है जिसे हम उन्नतांश((Altitude) कहते है। चाप ZA उस तारे की शिरोबिंदु दूरी (Zenith distance) है। चाप NX जो उत्तरी बिंदु और तारे को समाये हुये महावृत के नीचे है, या कोण NZA जो कि मध्याह्न(Meridian) तथा मह वृत्त के मध्य है, तारे का दिगंश(Azimuth) कहलाता है। इसे उत्तरी बिंदु से पूर्व की ओर या पश्चिम की ओर मापा जाता है।

क्षैतिज निर्देशांक प्रणाली(उन्नतांश तथा दिगंश (Altitude and Azimuth))

क्षैतिज निर्देशांक प्रणाली(उन्नतांश तथा दिगंश (Altitude and Azimuth))

विषुवतीय प्रणाली(दायाँ आरोहण तथा दिक्पात (Right Ascension and Declination))

यदि हम तारे को पार करते हुये एक महावृत्त PAM बनाये तो उस तारे की स्तिथि को हम चाप PA, कोण QPA या चाप QM या कोण QPA से परिभाषित कर सकते है। चाप PA को तारे का उत्तरी ध्रुव दूरी कहते है, साथ मे चाप AM से उस तारे की विषुवत से कोणीय दूरी मिलती है जिसे उस तारे का दिक्पात(Declination) कहते है।

दिक्पात(Declination) का मूल्य धनात्मक या ऋणात्मक हो सकता है जो कि क्रमश: उस तारे विषुवत के उत्तर या दक्षिण पर होने पर निर्भर है। महावृत्त PAM उस तारे का दिक्पात(Declination) वृत्त कहलाता है। उस तारे का दायाँ आरोहण(R.A.) विषुवत चाप YM है जोकि मेष के प्रथम बिंदु तथा दिक्पात वृत्त के अधोबिंदु पर है।
मेष का प्रथम बिंदु की दैनिक गति और तारे की दैनिक गति समान होती है, इसलिये दैनिक गति मे तारे का RA और दिक्पात परिवर्तित नही होता है।

विषुवतीय प्रणाली(दायाँ आरोहण तथा दिक्पात (Right Ascension and Declination))

विषुवतीय प्रणाली(दायाँ आरोहण तथा दिक्पात (Right Ascension and Declination))

क्रांतिवृत्त प्रणाली (खगोलीय अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) निर्देशांक)

यदि क्रांतिवृत्त के ध्रुव और तारे के द्वारा महावृत्त बनाया जाये तो उस तारे की क्रांतिवृत्त से इस महावृत्त के साथ मापी जाने वाली कोणीय दूरी उस तारे का खगोलीय अक्षांश होगी। क्रांतिवृत्त पर मेष के प्रथम बिंदु और महावृत्त के अधोबिंदु के मध्य के चाप को खगोलीय देशांतर (longitude) निर्देशांक कहते है। दैनिक गति के दौरान किसी तारे का खगोलीय अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) परिवर्तित नही होता है। किसी तारे का खगोलीय अक्षांश तारे की विषुवत के उत्तर मे या दक्षिण मे होने के आधार पर धनात्मक या ऋणात्मक हो सकता है। जबकि देशांतर शून्य से 360 डीग्री के मध्य हो सकता है, यह मापन पूर्व की ओर होता है।

क्रांतिवृत्त प्रणाली (खगोलीय अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) निर्देशांक

क्रांतिवृत्त प्रणाली (खगोलीय अक्षांश(latitude) और देशांतर (longitude) निर्देशांक

लेखिका का संदेश

आशा है कि इस लेख ने खगोलीय निर्देशांक के बारे मे मूलभूत जानकारी उपलब्ध कराई होगी। यह लेख समझने मे थोड़ा कठीन हो सकता है लेकिन खगोलशास्त्र के लिये अत्यावश्यक है।

मूल लेख : THE THREE TYPES OF CELESTIAL COORDINATE SYSTEMS.

इस शृंखला मे इससे पहले : स्टीफ़न का नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व

लेखक परिचय

सिमरनप्रीत (Simranpreet Buttar)
संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका भौतिकी मे परास्नातक कर रही है। उनकी रुचि ब्रह्मांड विज्ञान, कंडेस्ड मैटर भौतिकी तथा क्वांटम मेकेनिक्स मे है।

Editor at The Secrets of the Universe, She is a science student pursuing Master’s in Physics from India. Her interests include Cosmology, Condensed Matter Physics and Quantum Mechanics



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Tuesday, 30 April 2019

स्टीफ़न का नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व

लेखक : ऋषभ

इस लेख मे हम भौतिकी के एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम की चर्चा कर रहे है जो कि बहुत ही सरल है इसके खगोलभौतिकी मे बहुत से प्रयोग है। यह बहुत लोकप्रिय नियम नही है और हम मे से बहुत इसके महत्व को समझ पाने मे असफ़ल रहते है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के छठे लेख मे हम स्टीफ़न के नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व को जानेंगे।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

स्टीफ़न के नियम का गणितिय रूप

स्टीफ़न के नियम का अर्थ सरल है। स्टेफॉन वोल्‍ज़मान नियमानुसार इकाई समय में सभी तरंगदैर्घ्य परास में कृष्णिका(ब्लैकबाडी )द्वारा प्रति इकाई पृष्ठिय क्षेत्रफल द्वारा विकरित कुल ऊर्जा कृष्णिका के ऊष्मगतिकीय ताप के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती होता है। सरल शब्दो मे किसी ब्लैकबाडी (black body) की सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफ़ल द्वारा सभी तरंगदैर्ध्य पर उत्सर्जित विकिरण की कुल ऊर्जा उसके तापमान के चतुर्घात के अनुपात मे होती है।

 स्टेफॉन वोल्‍ज़मान सूत्र

स्टेफॉन वोल्‍ज़मान सूत्र

L = तारे की दीप्ति (luminosity)। वास्तविकता मे दीप्ति किसी तारे द्वारा कुल उत्पन्न का माप है। इस नियम को स्टेफॉन वोल्‍ज़मान नियम भी कहते है।

हमारा उद्देश्य इस नियम के पीछे के बुनियादी सिद्धांत को समझना है, इसलिये हम खाली स्लेट से शुरुवात करते है।

एक कृष्णिका या ब्लैकबाडी क्या है ?

एक ऐसी वस्तु जो अपने पृष्ठ पर आपतित सभी तरंगदैध्यो के विकिरणो का पूर्ण:  अवशोषण और पुन: पूर्ण  उत्सर्जन कर देती है उसे कृष्णिका कहते है। भौतिक विज्ञान में कृष्णिका पदार्थ की एक आदर्शीकृत अवस्था है, जो अपने ऊपर पड़ने वाले सभी विद्युत चुम्बकीय विकिरण अवशोषित कर लेता है। कृष्णिका एक विशेष और सतत वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में विकिरण को अवशोषित और गर्म होने पर फिर से उत्सर्जित करते हैं। सामान्यत: प्रकाश का एक अच्छा अवशोषक प्रकाश का एक अच्छा उत्सर्जक भी होता है इसलिये एक आदर्श अवशोषक को एक आदर्श विकिरण उत्सर्जक भी होना चाहीये। लेकिन साथ मे एक आदर्शअवशोषक द्वारा प्रकाश का परावर्तन भी नही होगा इसलिये वह काला दिखाई देगा, जिससे उन्हे कृष्णिका(ब्लैक बाडी) कहते है।

लेकिन सूर्य को कृष्णिका (ब्लैक बाडी) क्यों कहते है ? सूर्य की कोई ठोस सतह नही है। इसलिये सूर्य पर जो भी विकिरण आपतीत होता है पूरी तरह से समाप्त होने तक बिखरते(scattered) और अवशोषित होते रहता है। यह प्रक्रिया सूर्य को एक आदर्श अवशोषक बनाती है। लेकिन सूर्य एक आदर्श विकिरक(emitter) नही है। यह उसके वर्णक्रम से स्पष्ट है।

संतरे रंग की रेखा आदर्श कृष्णिका को दर्शाती है, जबकि लाल रेखा सूर्य के वर्णक्रम को दर्शाती है। सूर्य के वर्णक्रम मे आदर्श कृष्णिका के वर्णक्रम से कई विचलन है। सूर्य को एक आदर्श कृष्णिका के समीप माना जाता है।

सूर्य का तापमान

इस नियम का प्रतिपादन जोसेफ़ स्टीफ़न(Josef Stefan) ने 1879 मे किया था। उनसे पहले एक अन्य वैज्ञानिक जे सोरेट (J. Soret) ने एक खूबसूरत प्रयोग किया था जिसमे उन्होने एक पतली प्लेट को 2000K तापमान तक गर्म किया था। उसके बाद उन्होने इस प्लेट को इतनी दूरी पर रखा कि उसका सम्मुख कोण और सूर्य का सम्मूख कोण (subtended angle)समान था। इस प्रयोग से उन्होने पाया कि सूर्य से उत्सर्जित इस पतली प्लेट से विकिरित ऊर्जा के घनत्व(energy flux density) से 29 गुणा अधिक है। स्टीफ़न ने इन आंकड़ो का प्रयोग किया और उसके आगे गये। उन्होने एक और कारक को जोड़ा। उन्होने अनुमान लगाया कि सूर्य से उत्सर्जित ऊर्जा का एक तिहाई भाग वातावरण द्वारा अवशोषण कर लिया जाता है। इसलिये सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा का घनत्व पतली प्लेट से 29 गुणा अधिक नही, बल्कि 29×3/2 गुणा अधिक है अर्थात 43.5 गुणा अधिक है।

अब उन्होने इस मूल्य को अपने सूत्र(उपरोक्त) मे डाला। अर्थात सूर्य द्वारा विकिरित ऊर्जा पतली प्लेट द्वारा विकिरित ऊर्जा से 43.5 गुणा अधिक है। इसका अर्थ यह है कि सूर्य का तापमान पतली प्लेट के तापमान के 43.5 गुणा का चतुर्थमूल होगा। यह सरल गणित है, उपरोक्त सूत्र मे मूल्य रखीये। अब (43.5)1/4 =2.57 अर्थात सूर्य का तापमान पतली प्लेट के तापमान का 2.57 गुणा होगा। 2000K x 2.57 =5700K। यह एक अप्रत्याशित परिणाम था। यह सूर्य के तापमान से केवल 1.3% ही दूर था, जोकि 5778K है। स्टीफ़न ने माना था कि पृथ्वी का वातावरण सूर्य की ऊर्जा का एक तिहाई अवशोषित कर लेता है, यह अनुमान भी सही पाया गया। सूर्य की सतह के तापमान की गणना का यह पहला प्रयास था और मानवता के इतिहास मे यह एक मील का पत्थर था।

स्टीफ़न के नियम का खगोलभौतिकी मे महत्व

अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि स्टीफ़न का नियम खगोलभौतिकी मे महत्वपूर्ण क्यो है। आखीर हमने इसके प्रयोग से सूर्य का तापमान ज्ञात किया था। लेकिन इसकी सीमा सूर्य के तापमान तक ही नही है, इसके द्वारा अन्य तारों के तापमान और आकार की गणना की जा सकती है।

लेखक का संदेश

अब हम धीमे धीमे खगोलभौतिकी मे गहरा गोता लगाने जा रहे है। इस लेख का उद्देश्य किसी तारे की दीप्ती और उसके प्रभावी तापमान के मध्य के संबध की जानकारी देना था। अगले कुछ लेखों मे हम तारों का अध्ययन करेंगे। तारकीय खगोलभौतिकी(Stellar Astrophysics) एक महत्वपूर्ण तथा बड़े पैमाने पर अध्ययन किया जानेवाला विषय है। इस विषय मे करीयर बनाने के लिये भौतिकी मे मजबूत पकड़ चाहीये। इस लेख मे हमने केवल सतह को छुआ है। हमे आशा है कि आप इस लेख शृंखला का आनंद ले रहे है।

मूल लेख : THE STEFAN’S LAW AND ITS IMPORTANCE IN ASTROPHYSICS.

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.



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Saturday, 27 April 2019

ब्लैक होल का चित्र मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक क्यों है?

लेखक : डॉ मेहेर वान

ब्लैक होल की प्रथम तस्वीर - अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 10 अप्रैल २०१९ को ब्लैकहोल की पहली तस्वीर जारी की। आकाशगंगा एम87 में 53.5 मिलियन प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद इस विशालकाय ब्लैक होल की तस्वीर जारी की गई है। वैज्ञानिकों ने ब्रसल्ज, शंघाई, तोक्यो, वॉशिंगटन, सैंटियागो और ताइपे में एकसाथ प्रेस वार्ता की और जिस दौरान इस तस्वीर को जारी किया गया।

ब्लैक होल की प्रथम तस्वीर – अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 10 अप्रैल २०१९ को ब्लैकहोल की पहली तस्वीर जारी की। आकाशगंगा एम87 में 53.5 मिलियन प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद इस विशालकाय ब्लैक होल की तस्वीर जारी की गई है। वैज्ञानिकों ने ब्रसल्ज, शंघाई, तोक्यो, वॉशिंगटन, सैंटियागो और ताइपे में एकसाथ प्रेस वार्ता की और जिस दौरान इस तस्वीर को जारी किया गया।

10 अप्रैल 2019 को जब “इवेंट होराइजन टेलेस्कोप” की टीम ने पहली बार ब्लैक होल का सच्चा चित्र प्रस्तुत किया तो पूरी दुनियाँ वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि पर जोश ख़ुशी से झूम उठी। जिन्हें यह मालूम था कि कुछ ही समय में ब्लैक होल की सच्ची छवि दुनियाँ के सामने पेश की जाने वाली है वह बड़ी बेसब्री से वैज्ञानिकों की प्रेस कोंफ्रेंस का इंतज़ार कर रहे थे। ब्लैक होल की यह छवि कई कारणों से महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण थी। इस प्रयोग में आइन्स्टीन की “जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” दांव पर लगी थी, साथ ही वह वैज्ञानिक ज्ञान भी दांव पर लगा था जो पिछले कई दशकों में ब्लैक होल से बारे में अर्जित किया गया था। ब्लैक होल की यह छवि जनता के सामने लाने से पहले वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक यह सुनिश्चित किया था कि उनके प्रयोगों और प्रक्रिया में कोई कमी तो नहीं रह गई। इस प्रक्रिया में पूरी दुनियां के वैज्ञानिक कई दशकों से लगे हुए थे। अतः जब वैज्ञानिक अपने प्रयोग और प्रक्रिया की सत्यता और त्रुटिहीनता के बारे सुनिश्चित हो गए तब यह छवि छः स्थानों पर प्रेस कोंफ्रेंस करके पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत की गई, ताकि प्रक्रिया में शामिल सभी वैज्ञानिकों और देशों को सफलता का पूरा क्रेडिट मिले। पूरी दुनियां की मीडिया ने इस घटना को प्रमुख खबर बनाया, क्योंकि यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

लेकिन भारतीय मीडिया वैज्ञानिकों की इस महान उपलब्धि को समझ नहीं पाया। हाल ही में एक खबर सत्याग्रह/स्क्रोल  (दिनांक- 21 अप्रैल, 2019) की वेबसाईट पर (विज्ञान कहता है कि ब्लैक होल का कोई फोटो नहीं लिया जा सकता, तो फिर यह क्या है?)–  पर प्रकाशित की गई जिसमें ब्लैक होल की छवि वाली घटना को इस प्रकार पेश किया गया जैसे कि यह कोई वैज्ञानिक घोटाला हुआ हो। यह न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि निंदनीय है और भारतीय मीडिया की छवि ख़राब करने वाला है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आँखें बंद करके ‘रात हो गई-रात हो गई’ चिल्लाने से सूरज की रौशनी ख़त्म नहीं हो जाती, लेकिन बेवकूफी ज़रूर जगजाहिर होती है।

यह मानव इतिहास की महानतम घटना क्यों है?

सन 1784 में अंग्रेज खगोलविद ‘जॉन मिशेल’ ने एक ऐसे तारे की परिकल्पना की जो कि इतना भारी और अधिक घनत्व वाला था कि अगर प्रकाश भी उसके करीब जाए तो वह इस तारे के चंगुल से बाहर नहीं आ सकता। यहाँ प्रकाश का उदाहरण इसलिए दिया जाता है कि प्रकाश का स्थायित्व में द्रव्यमान शून्य और गतिमान अवस्था में अत्यधिक सूक्ष्म होता है। प्रकाश से हल्की वस्तु की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके बाद आइन्स्टीन ने 1915 में “जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” की स्थापना की जिसका इस्तेमाल आज खगोलशास्त्र से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक के तमाम विषयों को समझने में और उनका विश्लेषण करने में होता है। अनगिनत प्रयोगों और गणनाओं में आइन्स्टीन की “जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” अब तक सही और सटीक साबित होती रही है। “जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” आने के कुछ हो महीनों बाद वैज्ञानिक कार्ल स्वार्जचाइल्ड ने आइन्स्टीन के समीकरणों को हल करके कुछ नए निष्कर्ष निकाले। इन्हीं निष्कर्षों में ब्लैक होल के केंद्र से एक ऐसी दूरी का मान निकलता है जिसके अन्दर आइन्स्टीन के समीकरण काम नहीं करते। इसे वैज्ञानिक भाषा में सिंगुलारटी कहते हैं। बाद में इस दूरी को ‘स्वार्जचाइल्ड त्रिज्या’ कहा गया और इससे जो वृत्त बना उसे “इवेंट होराइजन” कहा गया। ऐसी गणनाएं की गईं कि ब्लैक होल ‘स्वार्जचाइल्ड त्रिज्या’ के तीन गुना दूरी से पदार्थ को और ‘स्वार्जचाइल्ड त्रिज्या’ की डेढ़ गुना दूरी से प्रकाश को अपनी और खींचकर निगल जाता है। इसके बाद पिछली सदी में सैद्धांतिक स्तर पर ब्लैक होल के बारे में बहुत साड़ी गणनाए की गईं जिनका मूल आधार आइन्स्टीन के समीकरण थे। चूँकि आइन्स्टीन से वह समीकरण खगोलविज्ञान और अन्तरिक्ष विज्ञान से लेकर विज्ञान की अन्य शाखों में इस्तेमाल हो रहे थे और सटीक साबित हो रहे थे इसलिए वैज्ञानिकों में उत्सुकता थी कि अगर उन्हें ‘इवेंट होराइजन’ नहीं दिखा तो आइन्स्टीन की “जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” असफल हो जायेगी और पूरी भौतिकी में भूचाल आएगा। यह सब अब तक गणनाओं के स्तर पर ही था, इसलिए यहाँ एक सधे हुए सटीक प्रयोग की आवश्यकता थी जिसमें कुछ ठोस प्रमाण मिलें।

इस समस्या से निबटने के लिए विश्व भर के वैज्ञानिकों ने एक संगठन बनाया और एक साथ काम करने का निर्णय लिया।

इस वैज्ञानिक समस्या का विशालकाय होना

ब्लैक होल की छवि लेना की वैज्ञानिक समस्या कोई साधारण समस्या नहीं थी। इसमें कई ऊंचे स्तर की रुकावटें थीं, जिन्हें बिन्दुवार समझना चाहिए-

  1. ब्लैक होल की प्रकृति:

    वैज्ञानिक “इवेंट होराजन” देखना चाह रहे थे। इवेंट होराइजन वह जगह है जहां तक ब्लैक होल के आसपास प्रकाश पहुँच सकता है और ब्लैक होल द्वारा खींच नहीं लिया जाता। इस प्रकार यह प्रकाश ब्लैक होल को बाहर से एक तरह से ऐसे ढँक लेता है जैसे ब्लैक होल ने प्रकाश के कपडे पहन लिए हों। हालांकि ब्लैक होल को नहीं देखा जा सकता मगर इसके चारों और फैले प्रकाश की उन किरणों को देखा जा सकता है जो बस इवेंट होराइजन को छूकर निकल जाती हैं। अतः यह तय था कि ब्लैक होल को देखना संभव नहीं है मगर इवेंट होराइजन में प्रकाश से लिपटे हुए ब्लैक होल को देखना संभव है। इवेंट होराइजन के साथ ब्लैक होल की फोटो लेने का काम आसान नहीं था। इवेंट होराइजन में लिपटी प्रकाश किरणों को भी अपने टेलेस्कोप्स में समेट पाना आसान नहीं होता जिसे हम आगे समझेंगे।

  2.  ब्लैक होल की आकाश में स्थिति:

    सबसे पहले तो यह तय कर पाना आसान नहीं है कि ब्लैक होल कहाँ है? चूँकि यह प्रकाश को दबोच लेता है और हम किसी भी चीज को तब देख पाते हैं जब वह वस्तु प्रकाश को या तो उत्सर्जित करती है या परावर्तित करती है। ब्लैक होल की स्थिति जानने में ही वैज्ञानिकों को कई दशक लगे। अनेकों विशालकाय टेलेस्कोपों की सहायता से अनगिनत वैज्ञानिक पूरे आकाश की निगरानी रखते हैं। कई वर्षों तक एक गैलेक्सी में कई तारों का अध्ययन करने के बाद उन्हें पता चला कि वे तमाम तारे किसी ख़ास केंद्र बिंदु के चारों और चक्कर लगा रहे हैं जो कि चमकीला नहीं है। यह गैलेक्सी M87 थी। इसके तारे विशालकाय हैं। इतने भारी तारे खुद से कई गुना भारी पिंड के चारों और ही चक्कर लगा सकते हैं और वैज्ञानिकों ने गणना की कि यह ब्लैक होल होना चाहिए। इस तरह लम्बी और थकाऊ गणनाओं के बाद ब्लैक होल की संभव स्थिति पता चली।

  3. पृथ्वी से दूरी:

    गणनाओं और प्रयोगों के आधार पर यह पाया गया कि यह ब्लैक होल पृथ्वी से 5.5 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर है। इस बात का मतलब यह है कि यह ब्लैक होल M87 गैलेक्सी में धरती से इतना दूर है कि प्रकाश को इससे धरती तक आने में 5.5 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। इसका एक मतलब यह भी है हमने जिस प्रकाश के साथ इसकी छवि खींची है वह प्रकाश इस ब्लैकहोल से 5.5 करोड़ साल पहले चला था। मतलब जो छवि हमारे पास है वह इस ब्लैक होल की 5.5 करोड़ साल पुरानी फोटो है। यह तो हम सब जानते हैं कि दूर होते जाने पर वस्तुएं छोटी दिखाई देने लगती हैं। इसी प्रकार से यह ब्लैक होल भी पृथ्वी से बहुत दूर होने के कारण बहुत छोटा दिखाई दे रहा था। वैज्ञानिकों ने गणना की कि धरती से यह इतना छोटा दिखाई देता कि इसे देखने के लिए घरती के आकार के बराबर के दूरदर्शी की ज़रुरत पड़ती। धरती के आकार के बराबर का दूरदर्शी बना पाना मानव के हाथ से बाहर की बला है। वैज्ञानिक कई सालों तक यह सोचकर परेशान रहे की कि कैसे इस कठिनाई से पार पाया जाए। फिर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह बात सही है कि हम पृथ्वी के आकार का दूरदर्शी नहीं बना सकते लेकिन पूरी पृथ्वी पर जगह जगह लगे टेलेस्कोपों को एकजुट करके पृथ्वी के आकार का एक आभासी टेलेस्कोप बनाया जा सकता है। खगोल विज्ञान में यह तकनीक नयी नहीं है। भारत में ही गैलेक्सियों को देखने के लिए लगा GMRT यानी जाइंट मीटरवेव रेडियो टेलेस्कोप पूना के पास लगभग 25 किमी में फैला है, जिसमे छोटे छोटे कई टेलेस्कोप लगे हैं और उन सब टेलेस्कोपों को मिलाकर एक विशालकाय 25 किमी लम्बा टेलेस्कोप बनता है जो अन्तरिक्ष में दूरदूर तक फैले छोटे छोटे दिखने वाले पिंडों की फोटो खींचने में मदद करता है। इसमें कई टेलेस्कोपों से ली गई छवियों को एकसाथ मिलकर एक फोटो बनाई जाती है। यह एक पुरानी और पूरी तरह से स्थापित तकनीक है। हालांकि धरती जितने आभासी टेलेस्कोप के लिए कुछ अन्य तकनीकी कठिनाइयां थी जिन्हें दूर किया गया।

  4. टेलेस्कोप का डिजाइन:

    दुनिया के तमाम देशों के वैज्ञानिकों ने मिलकर दुनिया भर में फैले कई टेलेस्कोपों का एक समूह बनाया और उन्हें एक साथ सिंक्रोनाइज़ किया। एक और समस्या यह थी कि पृथ्वी तेज रफ़्तार से अपनी अक्ष पर घूमती है इसलिए छवियों में इस घूर्णन का प्रभाव भी ख़त्म करना था। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कुछ दशक तक गणनाएं कीं ताकि प्रयोगों से त्रुटियों को हटाया जा सके। ख़ास समयों पर दुनियां भर के कई टेलेस्कोपों ने उस ख़ास बिंदु की फ़ोटोज़ लीं जहाँ ब्लैक होल होने की गणनाएं हुई थी। इस तरह कई हज़ार टेराबाईट का डेटा उत्पन्न हुआ। अब इस भारीभरकम डेटा को एक साथ मिलाकर देखने की बारी थी। इस डेटा को मिलाने का काम मैसच्यूसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की कंप्यूटर साइंस की पीएचडी की छात्रा केटी बौमन ने किया। इसके लिए उन्हें एक अल्गोरिदम बनानी पड़ी। इस प्रक्रिया में वैज्ञानिकों में बहुत ख़ास ख्याल रखा कि वह कुछ ऐसी चीज़ न देख लें जो वह देखना चाह रहे थे बल्कि वह देखें जो कि वहां उपस्थित था। लम्बे संघर्ष के बाद जब वैज्ञानिक इस बात को लेकर तय हो गए कि सारे टेलेस्कोपों की मदद से ब्लैक होल रिंग ही बन सकती है तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।

 

इसके अलावा तमाम तकनीकी और वैगानिक चुनैतिया वैज्ञानिको के समक्ष थीं जिन्हें आम जनता को समझाना बहुत मुश्किल है।

इस फोटो में एक प्रकाशिक अंगूठीनुमा आकार में काला केंद्र छुपा हुआ है। यह ठीक वैसे ही है जिसकी गणनाये वैज्ञानिक एक सदी से भी अधिक समय से कर रहे थे। इस छवि में साफ़ देखा जा सकता है कि प्रकाशिक इवेंट होराइजन में अंधकारमय ब्लैक होल छुपा हुआ है। हालांकि इस प्रक्रिया में तमाम बड़ी वैज्ञानिक रुकावटें थीं और ब्लैक होल की छवि उतारना असंभव माना जाता रहा लेकिन वैज्ञानिकों ने चतुराई से यह कर दिखाया। दुनिया भरके विद्वान इसे मानव जाति की सर्वकालिक सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिन रहे हैं। विज्ञान का सर्वकालिक काम असंभव लगने वाली बात को संभव बनाना ही तो है। और चुनौती जितनी बड़ी हो जीत उतनी ही बड़ी मानी जाती है। अंततः: यह ब्लैक होल की पहली छवि है समय आने पर बेहतर छवियाँ भी हम मानव खींच पायेंगे ऐसा विश्वास है।

 

लेखक का परिचय

डाक्टर मेहर वान IIT खड़गपुर के एडवांशड टेक्नालाजी सेंटर मे कार्यरत है।

वेबसाईट : https://meherwan.com/

 



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